कहानिया जो दिल छु जाए ....
प्यार से खुबसुरत अहसास दुनिया में कुछ भी नहीं है.
एक अलग ही सुकून मिलता है
जब जिंदगी में कोई होता है
जो आपको चाहता है,
जिसका दिल आपके लिए ही धड़कता है.
आज कल कहने को तो प्यार भी फ़ास्टफ़ूड
जैसे हो गया है.
बस आँखे मिली और प्यार हो गया.
बहुत से लोगों के लिए तो प्यार का मतलब
सिर्फ शारीरिक आकर्षण ही रह गया है.
लेकिन आज भी सच्चा प्यार होता है,
जब ऐसा प्यार होता है तो
उसके सामने ना ही शारीरिक आकर्षण मायने रखता है
ना ही कुछ और.
बस दिन रात एक ही बात का ख्याल रहता है
कि कैसे अपने साथी के साथ समय बीता सके.
साथी की एक झलक दिन भर खुश रख सकती है.
ऐसा प्यार अगर पूरा हो जाता है तो
उससे खुशनुमा बात पूरी दुनिया में नहीं हो सकती
लेकिन यदि ऐसा प्यार अगर अधुरा रह जाए
या किसी वजह से एक खुबसूरत रिश्ता टूट जाए
तो इस बात से दर्द भरा कुछ नहीं होता.
दिल टूटने के बाद समझ ही नहीं आता कि
कैसे संभाले टूटे दिल को?
वैसे भी अधिकतर प्रेम कहानियों का अंत बुरा ही होता है.
वो कहते है ना कि प्यार हर किसी का पूरा नहीं होता
क्योंकि मेरे दोस्त प्यार का पहला अक्षर ही
अधुरा होता है.
दिल टूटने का अहसास वो अहसास होता है
जिसमे लगता है पूरी दुनिया ही उजड़ गयी है.
कभी कभी तो इस हाल से निकलने में पूरी
उम्र निकल जाती है
तो कभी कभी इंसान इतना टूट जाता है कि
वो अपनी जान तक ले लेता है.
आइये जानते है
कुछ ऐसे तरीके कैसे संभाले टूटे दिल को.
.
आपके आसपास भी आपके दोस्त या आपके
परिवार में ऐसे लोग होंगे जो प्यार में हारे होंगे. बहुत बारह में पता भी नहीं चलता की हमारा
कोई दोस्त जिंदगी के किस मुश्किल दौर से गुजर रहा है.
सामने से देखने पर सब कुछ सही लगता है
लेकिन अंदर ही अंदर वो रोज़ मरता रहता है.
आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में जब रिश्ते
भी नाम के रह गए है
तो लोग बहुत जल्दी अवसाद में आ जाते है.
एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में
सबसे ज्यादा अवसाद ग्रस्त युवा हमारे देश में है.
आज जिस तरह हर रोज़ आत्महत्या की ख़बरें पढने
और देखने को मिलती है उससे पता चलता है
कि आसपास इतनी भीड़ होने के बाद भी कितने
अकेले हो गए है हम.
दिल टूटने या प्यार में धोखा खाने वालों की
हालत सबसे बुरी होती है
क्योंकि अक्सर ऐसे लोग अपने दिल का हाल
बताने में हिचकिचाते है
या फिर इन्हें ये भी लगता है कि कहीं लोग
उनकी भावनाओं का मजाक ना बना दे.
प्यार में असफल हो गए हो तो घबराने की ज़रूरत नहीं है.
यदि अवसाद में आ गए हो तो अवसाद दूर
करने का सबसे अच्छा उपाय है
अपने परिवार के साथ समय बिताना.
परिवार के लोगों के साथ समय बिताने पर अकेलापन दूर होता है,
खुद को सँभालने की ताकत मिलती है.
अवसाद से खुद को बचाने का दूसरा सबसे
आसान उपाय है
पालतू जानवर.
यदि आपने कुत्ता, बिल्ली या कोई
और जानवर पाल रखा है
तो उसकी उपस्थिति में मन खुश रहता है.
जानवरों का प्यार निस्वार्थ होता है
इसलिए वो अवसाद से बाहर निकालने में
बहुत सहायता करता है.
दोस्तों का साथ भी इश्क में मिले दर्द को कम
करने में मदद करता है.
दोस्त चाहे कमीने हो या आपकी भावना का मजाक उड़ायें
लेकिन धीरे धीरे उनकी इन्ही सब बैटन से
आपको लगने लगता है कि कोई इतनी भी
बड़ी बात नहीं हुई की दिल टूटने पर जान दे दी जाए.
प्यार में असफल होने पर एक बात का हमेशा
ध्यान रखें अकेले बिलकुल न रहे.
ज्यादा से ज्यादा वक्त लोगों के साथ बिताएं, ।
खुद को व्यस्त रखें और हाँ नशे से बचें.
अवसाद की स्थिति में नशा करने के बाद ही
अधिकतर लोग अपनी जान लेने की या खुद
को नुक्सान पहुँचाने की कोशिश करते है.
दिल टूटने पर बुरा लगता है लेकिन ऐसा होने
पर दुनिया खत्म नहीं होती,याद रखो जान है
तभी तो जहान है.
जिन्दा रहे तो क्या पता जिंदगी दूसरा मौका भी दे दे
मेरी लिखी बातों को हर कोई समझ नही सकता,क्योंकि मैं अहसास लिखती हूँ,और लोग अल्फ़ाज पढ़ते हैं..! अनुश्री__________________________________________A6
Monday, June 19, 2017
.................. टुटा दिल....!!
इस पिता ने अपनी बेटियों को सिखाया पीरियड्स पर खुलकर बात करना
अक्सर हमारे घरों में सिखाया जाता है कि पीरियड्स की बातें पापा के सामने नहीं करना। पापा के साथ बैठे होने पर सेनेटरी नैपकिन का विज्ञापन आते ही हम असहज महसूस करने लगते हैं। घर में किसी भी पुरुष के सामने पैड निकालने में तो ऐसे हिचकिचाते हैं जैसे हम कोई बड़ा पाप कर रहे हो। एक बेटी और पिता के बीच इस मामले में पूरा पर्दा बरता जाता है।
मगर हम आपको मिलवाते हैं पिता-बेटी की एक ऐसी जोड़ी से जो इन मामलों में जरा भी पर्दा नहीं करते। इस पिता-बेटी की जोड़ी में पिता ही अपनी बेटी को पीरियड्स के बारे में सारी जानकारी देता है। उसे समझाता है कि उस दौरान किन बातों का ख्याल रखना चाहिए, पीरियड्स में साफ-सफाई कितनी ज़रूरी है, जैसी कई बातें।
यह पिता हैं गुड़गाव निवासी सत्यवीर। सत्यवीर अपनी बेटियों से इस बारे में खुलकर चर्चा करते हैं। सत्यवीर का मानना है कि महावारी एक सामान्य बात है, इस पर पर्दा करने जैसी कोई बात ही नहीं।
सत्यवीर अपनी बेटियों को एक दोस्त के रूप में देखते हैं। सत्यवीर का मानना है कि इस उम्र में बच्चों को अपने माता-पिता के सहयोग की बहुत ज़रूरत होती है। अगर हम ही खुलकर बातें नहीं करेंगे तो बच्चों को परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। क्यूंकि सत्यवीर की पत्नी अपनी बेटियों से इस विषय पर खुलकर बात नहीं करती इसलिए सत्यवीर ने इसकी पूरी ज़िम्मेदारी खुद उठाने का फैसला किया। सत्यवीर का कहना है कि पत्नी के संकोच के कारण मेरी ज़िम्मेदारी ज़्यादा बढ़ गई कि मैं अपनी बेटियों से इस बारे में खुलकर चर्चा करूं।
एक दिन बेटी के स्कूल से सत्यवीर को फोन आया। उनकी बेटी की तबीयत बिगड़ गई थी। सत्यवीर ने फोन पर ही अपनी बेटी से बात की, बेटी काफी घबराई हुई थी। किसी तरह उसने अपने पापा को बताया कि उसे खून आ रहा है। सत्यवीर ने अपनी बेटी से कहा कि यह बात अपनी टीचर को बताओ। शाम को बेटी के घर वापस आने पर सत्यवीर ने उसे सारी बातें बताई। महावारी क्यों होती है, किस उम्र में होती है, इस दौरान क्या करना चाहिए जैसी तमाम बातें।
आज सत्यवीर की दोनों बेटियां अपनी हर परेशानी पिता से ही साझा करती है। महावारी से संबंधित कोई भी समस्या हो तो वे अपने पिता को बेझिझक बताती है। सत्यवीर बताते हैं कि एक बार मेरी बेटी को खून ज़्यादा गिरने लगा। मेरी बेटी ने तुरंत मुझे इसकी जानकारी दी। बिना देरी किए हुए मैं उसे डॉक्टर के पास ले गया। अगर मेरे और मेरी बेटी के बीच इस विषय पर खुल कर संवाद नहीं होता तो शायद वह मुझे कुछ नहीं बताती और उसकी तबीयत ज़्यादा बिगड़ भी सकती थी। सत्यवीर का मानना है कि इस पर खुलकर चर्चा नहीं करने से औरतों को काफी कुछ झेलना पड़ता है। यह उनके स्वास्थ से जुड़ा विषय है।
सत्यवीर की बेटियां अपने पिता के साथ ही बाज़ार से सेनेटरी नैपकिन की खरीदारी करती है। सत्यवीर का कहना है कि मुझे इसमें शर्म की कोई बात ही नहीं लगती। इसे शर्म में बांधना ही सबसे बड़े शर्म की बात होगी।
