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Thursday, October 11, 2018

स्त्री होना..




सुनो,
अगर कहुँ मैं
कि तुम ग़ुलाब सी सही लेकिन
एक अंगार भी हो
कुछ ज़्यादा तो नहीं होगा न
कि जानती हो हक़ अपने
कि मुक़ाबला करना आता है तुम्हें
कि हर बात पर कान नहीं रखतीं
कि अड़ जाती हो जो सही है
कि प्रेम में प्रेयसी हो जाना
और जीवन-युद्ध में चंडी रूप
कि चाँद सी शीतलता और
सूरज सा दहकता तेज भी हो
कि प्रेम में समर्पण और
ज़िम्मेदारियों में संपूर्ण हो
कि महकती तो हो गुलाब सी
और हाथ में अनदेखा नश्तर भी साथ है
कि एकदम शुद्ध हँसी और
उतनी ही शुद्ध जीवन-यात्रा भी
कि पुरुष हो नहीं सकता
वो जो तुम हो; चाहकर भी
कि तुम प्रेम हो, समर्पण हो
ज़िद हो और पिघलती भी हो
कि स्त्री ही तो हो
तुम सा कोई और 
हो भी तो नहीं सकता
समझता हूँ अब 
एक पुरूष होकर भी
कि कितना भी कहुँ
कुछ ज़्यादा होगा भी नहीं
कि शब्द कम ही पड़ेंगे
कलम मौन ही रहेगी
कि स्त्री होना तो
ईश्वर को भी सुलभ नहीं. 


Sunday, July 17, 2016

कन्यादान हुआ जब पूरा, आया समय विदाई का ।।

हँसी ख़ुशी सब काम हुआ था, सारी रस्म अदाई का ।
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बेटी के उस कातर स्वर ने, बाबुल को झकझोर दिया।।
पूछ रही थी पापा तुमने, क्या सचमुच में छोड़ दिया।।
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अपने आँगन की फुलवारी, मुझको सदा कहा तुमने।।
मेरे रोने को पल भर भी, बिल्कुल नहीं सहा तुमने।।
क्या इस आँगन के कोने में, मेरा कुछ स्थान नहीं।।
अब मेरे रोने का पापा, तुमको बिल्कुल ध्यान नहीं।।
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देखो अन्तिम बार देहरी, लोग मुझे पुजवाते हैं।।
आकर के पापा क्यों इनको, आप नहीं धमकाते हैं।।
नहीं रोकते चाचा ताऊ, भैया से भी आस नहीं।।
ऐसी भी क्या निष्ठुरता है, कोई आता पास नहीं।।
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बेटी की बातों को सुन के, पिता नहीं रह सका खड़ा।।
उमड़ पड़े आँखों से आँसू, बदहवास सा दौड़ पड़ा।।
कातर बछिया सी वह बेटी, लिपट पिता से रोती थी।।
जैसे यादों के अक्षर वह, अश्रु बिंदु से धोती थी।।
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माँ को लगा गोद से कोई, मानो सब कुछ छीन चला।।
फूल सभी घर की फुलवारी से कोई ज्यों बीन चला।।
छोटा भाई भी कोने में, बैठा बैठा सुबक रहा।।
उसको कौन करेगा चुप अब, वह कोने में दुबक रहा।।
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बेटी के जाने पर घर ने, जाने क्या क्या खोया है।।
कभी न रोने वाला बाप, फूट फूट कर रोया है....