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Tuesday, October 2, 2018

Adultery Law: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साइड इफेक्ट आने लगे है

ऐसी बहुत सी महिलाएं हैं जो व्यभिचारी पति से तलाक नहीं लेना चाहतीं. तलाक भी वही ले सकती हैं जो सक्षम हैं, पढ़ी-लिखी हैं, आत्मनिर्भर हैं या फिर मायके वालों का पूरा सपोर्ट है. लेकिन जिनके पास ऐसा कुछ भी नहीं वो क्या करें?

जिस दिन सुप्रीम कोर्ट ने एडल्टरी लॉ पर फैसला सुनाया, ये बात उसी दिन पक्की हो गई थी कि आने वाला समय जो दिखाने वाला है उसके लिए हम सबको तैयार रहना चाहिए. हमारी या आपकी जिंदगियों पर सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला असल भले ही नहीं डालता हो लेकिन Adultery Law को खत्म करके उन लोगों की आंखों में चमक जरूर आ गई थी जो विवाहेतर संबंधों में लिप्त थे.
इस फैसले के साइड इफेक्ट तो होंगे पर इतनी जल्दी सामने आएंगे ये सोचा नहीं था. चेन्नई में एक 24 साल की महिला ने आत्महत्या कर ली. वजह ये कि जब महिला को पति के किसी दूसरी औरत के साथ संबंधों का पता चला तो उसने पति को उससे दूरी बनाने के लिए कहा और धमकाया भी कि वो पुलिस में शिकायत करेगी. लेकिन पति जिसे अब कोई डर नहीं था उसने कहा कि चूंकि सुप्रीमकोर्ट ने कहा है कि व्यभिचार अपराध नहीं है इसलिए तुम मुझे किसी और महिला के साथ संबंध रखने के लिए रोक नहीं सकतीं. महिला क्या करती, उसने फांसी लगा ली. अपने सुसाइड नोट में उसने आत्महत्या का कारण भी यही लिखा है. इन दोनों ने दो साल पहले परिवार के खिलाफ जाकर लव मैरिज की थी, एक बच्चा भी है. लेकिन पत्नी को टीबी हो गई जिसकी वजह से पति उससे दूर रहने लगा था. पति सिक्योरिटी गार्ड है. अब चूंकि सुसाइड नोट में कारण एडलटरी है, इसलिए पति पर आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा चलेगा.
adultery lawपत्नी जब अपने पति को रोक नहीं सकी तो आत्महत्या कर ली
पर अवैध संबंध अगर वैध करार दिए गए तो क्या इसका मतलब ये हुआ कि ये संबंध गर्व की बात है? इस फैसले से अवैध संबंधों की वजह से अब तक समाज से डर रहे लोग निडर हो गए, और इसीलिए खुलकर अपने संबंध स्वीकार करने लगे. लेकिन हमारा समाज इस लायक ही नहीं कि उसे भारी भरकम चीजें कानून के दायरे में रहकर समझाई जाएं. समाज के कुछ लोगों ने इस फैसले को अपना हक समझ लिया और विवाहेतर संबंधों को इस तरह लेने लगे जैसे वो संबंध सही हों.
सुप्रीम कोर्ट ने उन महिलाओं के हित में ये फैसला दिया था जो अपने व्यभिचारी पति के खिलाफ शिकायत नहीं कर सकती थीं. और इस बात को आधार बनाकर तलाक नहीं ले सकती थीं. लेकिन एडलटरी को असंवैधानिक कहने वाले सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से कुछ महिलाओं का तो अहित ही हुआ.
चेन्नई के इस मामले में वो महिला जो परिवार के खिलाफ जाकर शादी करती है. उसके एक बच्चा भी है, बीमारी की वजह से पति भी किसी दूसरी औरत के पास चला गया. ऐसी महिलाओं के पास सिवाए आत्महत्या के और चारा ही क्या बचता है. वो वापस मायके नहीं जा सकती, पति पर निर्भर है, पति को तलाक नहीं दे सकती, बच्चे को छोड़कर बाहर नौकरी नहीं कर सकती. ऐसी बहुत सी महिलाएं हैं जो तलाक नहीं लेना चाहतीं. तलाक भी वही ले सकती हैं जो सक्षम हैं, पढ़ी-लिखी हैं, आत्मनिर्भर हैं या फिर जिन्हें मायके वालों का पूरा सपोर्ट है. लेकिन जिनके पास ऐसा कुछ भी नहीं वो क्या करें?
कानून कहता है कि हिंदू धर्म में दो शादियां करना अवैध है, लेकिन पति कितने भी संबंध रख सकता है- वो वैध है. ये किस तरह का कानून है? मतलब पति अगर व्यभिचारी है तो पत्नी या तो पति को तलाक दे दे, या फिर खुद किसी के साथ संबंध बना ले या फिर आत्महत्या कर ले. यही बात अब पतियों पर भी लागू होती है.  
चेन्नई की ये घटना सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का वो परिणाम था, जो अच्छा नहीं था. और न जाने कितने मामले हम आने वाले समय में देखें. लेकिन एक बात तो है कि अब दो लोगों के बीच जन्मों का बंधन जिसे शादी कहा जाता है, उसकी कीमत और भी कम हो जाएगी. जाहिर है जब तलाक के मामले बढ़ेंगे तो शादियों की अहमियत खुद ब खुद घट जाएगी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर समाज खुद सोचे कि अवैध संबंधों को वैध करार देने से व्यभिचार नैतिक रूप से स्वीकार्य नहीं हो जाता. जिस बात पर शर्म आती थी उसे कम से कम बेशर्मी न बनाया जाए.

Saturday, May 12, 2018

ईश्वर की मर्जी.........पूरी कहानी जरूर पढ़ें,



लड़कियों के स्कूल में आने वाली नई टीचर ख़ूबसूरत और शैक्षणिक तौर पर भी मज़बूत थी लेकिन उसने अभी तक शादी नहीं की थी..

सब लड़कियां उसके इर्द-गिर्द जमा हो गईं और मज़ाक़ करने लगीं कि मैडम आपने अभी तक शादी क्यों नहीं की..?

मैडम ने दास्तान कुछ यूं शुरू की_एक महिला की पांच बेटियां थीं, पति ने उसको धमकी दी कि अगर इस बार भी बेटी हुई तो उस बेटी को बाहर किसी सड़क या चौक पर फेंक आऊंगा,

ईश्वर की मर्जी वो ही जाने कि छटी बार भी बेटी पैदा हुई और पति ने बेटी को उठाया और रात के अंधेरे में शहर के बीचों-बीच चौक पर रख आया, मां पूरी रात उस नन्ही सी जान के लिए दुआ करती रही और बेटी को ईश्वर के सुपुर्द कर दिया।

दूसरे दिन सुबह पिता जब चौक से गुज़रा तो देखा कि कोई बच्ची को ले नहीं गया बाप बेटी को वापस घर लाया लेकिन दूसरी रात फिर बेटी को चौक पर रख आया लेकिन रोज यही होता रहा हर बार पिता बाहर रख आया और जब कोई लेना जाता तो मजबूरन वापस उठा लाता,

यहां तक कि उसका पिता थक गया और ईश्वर की मर्जी पर राज़ी हो गया। फिर ईश्वर ने कुछ ऐसा किया कि एक साल बाद मां फिर पेट से हो गई ...और इसबार उनको बेटा हुआ, लेकिन कुछ ही दिन बाद बेटियों में से एक की मौत हो गई यहां तक कि माँ पांच बार पेट से हुई और पांच बेटे हुए लेकिन हर बार उसकी बेटियों में से एक इस दुनियां से चली जाती ।

सिर्फ एक ही बेटी ज़िंदा बची ...और वो वही बेटी थी जिससे बाप जान छुड़ाना चाह रहा था, मां भी इस दुनियां से चली गई ..!

इधर पांच बेटे और एक बेटी सब बड़े हो गए टीचर ने कहा पता है वो बेटी जो ज़िंदा रही कौन है.? "वो मैं हूं" और मैंने अभी तक शादी इसलिए नहीं की कि मेरे पिता इतने बूढ़े हो गए हैं कि अपने हाथ से खाना भी नहीं खा सकते और कोई दूसरा नहीं जो उनकी सेवा करें। 
बस मैं ही उनकी खिदमत किया करती हूं और वो पांच बेटे कभी कभी आकर पिता का हालचाल पूछ जाते हैं ।
पिता हमेशा शर्मिंदगी के साथ रो रो कर मुझ से कहा करते हैं, मेरी प्यारी बेटी जो कुछ मैंने बचपन में तेरे साथ किया उस पर मुझे माफ करना, 
मैंने कहीं बेटी की बाप से मुहब्बत के बारे मैं एक प्यारा सा किस्सा पढा था कि ...एक पिता बेटे के साथ फुटबॉल खेल रहा था। और बेटे की हौसला बढ़ाने के लिए जान बूझ कर हार रहा था। दूर बैठी बेटी बाप की हार बर्दाश्त ना कर सकी और बाप के साथ लिपट के रोते हुए बोली बाबा आप मेरे साथ खेलें, ताकि मैं आपकी जीत के लिए हार सकूँ ।

सच ही कहा जाता है कि बेटी तो बाप के लिए रहमत होती है..!!!

Friday, December 22, 2017

"औरत होने का दर्द "


औरत होने का दर्द कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !
कभी माँ, कभी बीवी बनकर बलि की देवी बनती है
नौ महीने गर्भ के बीज को पल- पल खून से सींचती है
नव कोपल के फूटने के लम्बे इन्तजार को झेलती है
कौन आगे बढकर प्यार से माथे का पसीना पौंछता है ?
नवजीव के खिलने के असहनीय दर्द को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !
माँ बनकर अपने जिगर के टुकड़े को हर दिन बढ़ते देखती है
कभी प्यार से तो, कभी डांट से पुचकारती है
खुद भूखा रहकर भी हर एक का पेट भरती है
कभी रात का बचा भात तो ,कभी दिन की बची रोटी रात में खाती है
इस बलिदान को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !
कभी पति, कभी बच्चों की दूरी को कम करते पिस जाती है
बच्चें लायक हो तो पिता का सीना गर्व से फूलता है
परीक्षा में कम निकले तो हर कोई माता को कोसता है
हम सफ़र के माथे की हर शिकन को तुरंत भांप लेती है
इस ममता को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !
कभी बेटी, कभी बहन बनकर सब सह जाती है
कभी बाप , कभी भाई के गुस्से में भी मुस्कुराती है
मायके में बचपन के आँगन का हर कर्ज चुकाती है
अपने हर गम, हर दुःख में भी सबका गम भुलाती है
इस दुलार को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !
कभी प्रेमिका बनकर, कभी दोस्ती के नाम पर छली जाती है
खुद गुस्सा होकर भी अपने प्रेमी को हर पल मनाती है
प्रेमी के मन की हर बात बिन कहे समझ जाती है
अपना हर आंसू उससे छुपा लेती है
कभी उसकी याद में तो, कभी बेरुखी में तड़पती है
इस जलन को कौन समझता है ? ,
हर कोई बस परखता है !
कभी बहू बनकर दहेज़ के नाम पर ताने सह जाती है
बेटी पैदा करने पर गुनाहगार ठहराई जाती है
कभी प्रसव तो , कभी गर्भ -पात की पीड़ा झेल जाती है
अपने ही अरमानों की अर्थी अपने कांधो पर उठाती है
इस संवेदना को कौन समझता है ? ,
हर कोई बस परखता है !

नोट - औरतो का सम्मान करे जैसे खुद के घर की बहूत बेटियों का सम्मान करते है वैसे ही दूसरो के घर वालो की बहू बेटियों का सम्मान करे


Saturday, September 30, 2017

वेश्यालय की मिट्टी से क्यों बनाई जाती है देवी प्रतिमा, जानिए इसकी पौराणिक मान्यता और महत्व

वेश्या का नाम लेना भी जहां सभ्य समाज में अच्छा नहीं माना जाता वहीं आपको जानकर हैरानी होगी कि नवरात्र में मां दुर्गा की प्रतिमा के निर्माण के लिए वेश्यालय की मिट्टी लायी जाती है। इस मिट्टी को मिलाकर देवी की प्रतिमा का निर्माण किया जाता है। इस बात का जिक्र कुछेक फिल्मों में भी किया गया है।र्वपर शायद आपको इसके पीछे की मान्यता और वजह ना पता हो तो ..इसलिए आज हम आपकों इसका उद्देश्य और महत्व बताने जा रहे हैं।

वेश्यालय की मिट्टी प्रयोग करने के पीछे की मान्यता

शारदातिलकम, महामंत्र महार्णव, मंत्रमहोदधि जैसे ग्रंथ और कुछ पारम्परिक मान्यताएं इसकी पुष्टि करते हैं। बांग्ला मान्यताओं के अनुसार गोबर, गोमूत्र, लकड़ी व जूट के ढांचे, धान के छिलके, सिंदूर, विशेष वनस्पतियां, पवित्र नदियों की मिट्टी और जल के साथ निषिद्धो पाली के रज के समावेश से निर्मित शक्ति की प्रतिमा और यंत्रों की विधि पूर्वक उपासना को लौकिक और पारलौकिक उत्थान की ऊर्जा से सराबोर माना गया है।दरअसल ‘निषिद्धो पाली’ वेश्याओं के घर या क्षेत्र को कहा जाता है।
कोलकाता का कुमरटली इलाके में भारत की सर्वाधिक देवी प्रतिमा का निर्माण होता है। वहां निषिद्धो पाली के रज के रूप में सोनागाछी की मिट्टी का इस्तेमाल होता है। सोनागाछी का इलाका कोलकाता में देह व्यापार का गढ़ माना जाता है। तन्त्रशास्त्र में निषिद्धो पाली के रज के सूत्र काम और कामना से जुड़े हैं।

सामाजिक सुधार और सकारात्मक बदलाव का प्रतिक स्वरूप है ये लोकप्रथा

दैवीय प्रतिमा में निषिद्धो पाली की मिट्टी के प्रयोग की परंपरा स्वयं में सामाजिक सुधार के सूत्र भी सहेजे दिखाई देती हैं। यह परंपरा पुरुषों की भूल की सजा भुगतती स्त्री के उत्थान और सम्मान की प्रक्रिया का हिस्सा भी प्रतीत होती है। तंत्र यानी प्राचीन विज्ञान। तन का आनंद या दैहिक सुख तांत्रिय उपासना के मुख्य उद्देश्य हैं। आध्यात्म में कामचक्र को ही कामना का आधार माना जाता है। यदि काम से जुड़े विकारों को दुरुस्त कर लिया जाए और ऊर्जा प्रबंधन ठीक कर लिया जाए तो भौतिक कामनाओं की पूर्ति का मार्ग सहज हो जाता है। आध्यात्म के इन सूत्रों को जानकर व्यक्ति चाहे तो अपनी ऊर्जा कामचक्र पर खर्च कर यौन आनन्द प्राप्त करले, चाहे तो उसी चक्र को सक्रिय कर अपनी समस्त कामनाओं की पूर्ति करलें। ।

Friday, August 18, 2017

दिल छू लेगी ये कविता एक बार जरूर पढें...........



कन्यादान हुआ जब पूरा,आया समय विदाई का ।।
हँसी ख़ुशी सब काम हुआ था,सारी रस्म अदाई का ।.
बेटी के उस कातर स्वर ने,बाबुल को झकझोर दिया ।।
पूछ रही थी पापा तुमने,क्या सचमुच में छोड़ दिया ।।
अपने आँगन की फुलवारी,मुझको सदा कहा तुमने ।।
मेरे रोने को पल भर भी ,बिल्कुल नहीं सहा तुमने ।।
क्या इस आँगन के कोने में,मेरा कुछ स्थान नहीं ।।
अब मेरे रोने का पापा,तुमको बिल्कुल ध्यान नहीं ।।
देखो अन्तिम बार देहरी,लोग मुझे पुजवाते हैं ।।
आकर के पापा क्यों इनको,आप नहीं धमकाते हैं।।
नहीं रोकते चाचा ताऊ,भैया से भी आस नहीं।।
ऐसी भी क्या निष्ठुरता है,कोई आता पास नहीं।।
बेटी की बातों को सुन के ,पिता नहीं रह सका खड़ा।।
उमड़ पड़े आँखों से आँसू,बदहवास सा दौड़ पड़ा ।।
कातर बछिया सी वह बेटी,लिपट पिता से रोती थी ।।
जैसे यादों के अक्षर वह,अश्रु बिंदु से धोती थी ।।
माँ को लगा गोद से कोई,मानो सब कुछ छीन चला।।
फूल सभी घर की फुलवारीसे कोई ज्यों बीन चला।।
छोटा भाई भी कोने में,बैठा बैठा सुबक रहा ।।
उसको कौन करेगा चुप अब,वह कोने में दुबक रहा।।
बेटी के जाने पर, घर ने जाने क्या क्या खोया है।।
कभी न रोने वाला बापू,फूट फूट कर रोया है.!!

Saturday, June 11, 2016

माँ बेटा का हिसाब-किताब

एक बार जरुर पढ़े….! (अच्छी लगे तो शेयर करें)

एक बेटा पढ़-लिख कर बहुत बड़ा आदमी बन गया .
पिता के स्वर्गवास के बाद माँ ने
हर तरह का काम करके उसे इस काबिल बना दिया था.

शादी के बाद पत्नी को माँ से शिकायत रहने लगी के
वो उन के स्टेटस मे फिट नहीं है.
लोगों को बताने मे उन्हें संकोच होता है कि
ये अनपढ़ उनकी सास-माँ है…!

बात बढ़ने पर बेटे ने… एक दिन माँ से कहा..
” माँ ”_ मै चाहता हूँ कि मै अब इस काबिल हो गयाहूँ कि कोई
भी क़र्ज़ अदा कर सकता हूँ मै और तुम दोनों सुखी रहें
इसलिए आज तुम मुझ पर किये गए अब तक के सारे
खर्च सूद और व्याज के साथ मिला कर बता दो .
मै वो अदा कर दूंगा…!
फिर हम अलग-अलग सुखी रहेंगे.
माँ ने सोच कर उत्तर दिया…
“बेटा”_ हिसाब ज़रा लम्बा है…. सोच कर बताना पडेगा मुझे.
थोडा वक्त चाहिए.
बेटे ने कहा माँ कोई ज़ल्दी नहीं है. दो-चार दिनों मे बता देना.
रात हुई, सब सो गए,
माँ ने एक लोटे मे पानी लिया और बेटे के कमरे मे आई.
बेटा जहाँ सो रहा था उसके एक ओर पानी डाल दिया.
बेटे ने करवट ले ली.
माँ ने दूसरी ओर भी पानी डाल दिया.
बेटे ने जिस ओर भी करवट ली माँ उसी ओर पानी डालती रही.
तब परेशान होकर बेटा उठ कर खीज कर.
बोला कि माँ ये क्या है ?
मेरे पूरे बिस्तर को पानी-पानी क्यूँ कर डाला..?
माँ बोली….
बेटा…. तुने मुझसे पूरी ज़िन्दगी का हिसाब बनानें को कहा था.
मै अभी ये हिसाब लगा रही थी कि मैंने कितनी रातें तेरे बचपन मे
तेरे बिस्तर गीला कर देने से जागते हुए काटीं हैं.
ये तो पहली रात है ओर तू अभी से घबरा गया ..?
मैंने अभी हिसाब तो शुरू भी नहीं किया है जिसे तू अदा कर पाए…!
माँ कि इस बात ने बेटे के ह्रदय को झगझोड़ के रख दिया.
फिर वो रात उसने सोचने मे ही गुज़ार दी. उसे ये अहसास हो गया था कि माँ का
क़र्ज़ आजीवन नहीं उतरा जा सकता.
माँ अगर शीतल छाया है. पिता बरगद है जिसके नीचे बेटा उन्मुक्त भाव से जीवन बिताता है.
माता अगर अपनी संतान के लिए हर दुःख उठाने को तैयार रहती है. तो पिता सारे जीवन उन्हें पीता ही रहता है.
हम तो बस उनके किये गए कार्यों को आगे बढ़ाकर अपने हित मे काम कर रहे हैं.
आखिर हमें भी तो अपने बच्चों से वही चाहिए ना ……..!

इसलिए लड़के आत्महत्या नहीं करते, लड़कियां कर लेती हैं

प्रत्यूशा की मौत के बहाने : मरने वाली लड़की ही क्यों?

मैंने किसानों की आत्महत्या पर नहीं लिखा, डेल्टा मेघवाल की मौत पर भी नहीं लिखा लेकिन प्रत्यूशा बनर्जी की मौत पर लिख रहा हूं। कारण इसी में है फिर भी ना समझ में आए तो उसपर फिर कभी बात कर लेंगे। फिलहाल प्रत्यूशा और उसके जैसी अभिनेत्रियों की मौत के कारणों को समझने की कोशिश करते हैं। जो छोटे शहरों से निकलकर बड़ा काम करती है। शोहरत और पैसा कमाती हैं, सब ठीक-ठाक चल रहा होता है और अचानक पता चलता है कि उसकी मौत हो गई (आत्महत्या कर ली, हत्या हो गई या शीना बोरा की तरह) या गायब हो गई। कारण हर तरह के हैं, होते हैं लेकिन प्रेम संबंध, पति, प्रेमी, आशिक, ब्वायफ्रेंड की भूमिका भी सामने आती है और कुछ मामले खुलते हैं, कुछ नहीं खुलते हैं। मरने वाली बदनाम जरूरी होती है या कर दी जाती है। मीडिया ट्रायल की अलग समस्या है। जो तुरंत बंद होना चाहिए पर वह हमारे हाथ में नहीं है।

ऐसा लगभग हर क्षेत्र में होता है पर फिल्म और टीवी की दुनिया और उसपर मीडिया की नजर, अभिनेत्री और उसके ब्वायफ्रेंड की लोकप्रियता आदि के मद्देनजर टीआरपी की संभावना ज्यादा रहती है तो फिल्म और टीवी की दुनिया के मामले कुछ ज्यादा ही चर्चित हो जाते हैं। हर बार, मोटे तौर पर अटकल। बात यही होती है प्यार में सताए जाने पर या असफल रहने पर लड़की ने खुदकुशी कर ली और प्रेमी या मित्र को खलनायक बना दिया जाता है। मैं नहीं कह रहा कि ऐसा नहीं होता है पर इसके साथ यह कहना कि शादी से पहले किसी लड़की का लड़के के साथ रहना (लिव इन या वैसे ही मिलना-जुलना, दोस्ती प्रेम जो कह लीजिए) आज की स्थितियों में बुनियादी तौर पर गलत नहीं है।

लड़कियों को नहीं पढ़ाने, अपने पैरों पर खड़े होने योग्य नहीं बनाने की बुराइयां है। सबने देखा है, सब जानते हैं। अब जब आप उन्हें स्वतंत्र बना रहे हैं, अपने पैरों पर खड़े होने लायक बना रहे हैं तो उससे जुड़ी बुराइयां जो हैं सामने आएंगी। आ रही हैं। उनसे निपटना होगा। उनसे उसी हिसाब से लड़ना होगा। उसके लिए वैसे ही उपाय करने होंगे। ये नहीं चलेगा कि लड़की गर्भवती हो गई इसलिए आत्महत्या करना जायज है या लिव इन में रहती थी इसलिए उसे गर्भवती बनाने वाला ही दोषी है या नहीं दोषी है - इस पर बात होनी चाहिए, खुलकर होनी चाहिए वरना लड़कियों को घरों में बंद रखिए, 16-18 साल में शादी कर दीजिए, जैसी किस्मत होगी वैसा जीवन जीएंगी। और पति मर जाता था तो लोग सती भी बना ही देते थे। उसे भी जायज और सही मान लीजिए।

जाहिर है अब यह सब नहीं होने वाला। तो परिवार से दूर, महानगरों में अकले रहने वाली लड़कियों की जरूरतों के बारे में सोचिए। उसे अकेले रहने योग्य बनाइए। ऐसी लड़कियों के लिए किसी पुरुष साथी की अनिवार्यता है। अगर आप इसे अनिवार्य न मानें तो यह एक सुविधा की तरह तो है ही। और ना सभी लड़के एक जैसे होते हैं और ना सभी लड़कियां एक जैसी हो सकती हैं। इसलिए अलग मामलों में घटना, परिस्थिति और पात्रों के अनुसार बात होनी चाहिए। जनरलाइज नहीं किया जाना चाहिए। अगर ऐसे मामलों में आप लड़कों को दोषी मानते हैं तो शीना बोरा के मामले को याद कीजिए। उसके तो प्रेमी के कारण ही हत्या का राज खुला वरना मारने वाले तो वो हैं (संभवतः) जिनपर किसी को शक ही नहीं था।

मरने वाली लड़की ही क्यों?

इसका जो कारण मुझे समझ में आता है वह यही है कि अपने यहां लड़कियों को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाने की अवधारणा ही नहीं है। लड़कियां आम तौर पर पिता के करीब होती हैं और पिता से जिन विषयों पर बात होती है उसकी सीमा है। ऐसे में जब वे फंसती हैं तो उनकी परेशानी शेयर करने वाला कोई नहीं होता। खासतौर से जब मामला ब्वायफ्रेंड का हो। मां ऐसे मामलों में उतनी ही कमजोर होती है जितनी खुद लड़की। मैं तो कहूंगा कि लड़की मजबूत भी हो तो मां उसे कमजोर कर दे। दूसरी ओर, लड़के प्राकृतिक तौर पर भावनात्मक रूप से मजबूत होते हैं। मित्रों से समस्याएं आराम से साझा कर लेते हैं जबकि लड़कियां बातें चाहें जितनी करें समस्याएं साझा नहीं करतीं। लड़कियों को मजबूत बनाया जाना चाहिए ताकि वे भावनात्मक संकट झेल सकें। और यह काम पिताओं का ही है।

लड़किया कमजोर होती हैं, जल्दी टूट जाती हैं या उन्हें मार देना अपेक्षाकृत आसान होता है। मां-बाप मुद्दा नहीं बनाता कि हमारी बदनामी होगी। जिस दिन लड़की का पिता कहेगा कि हां, मेरी बेटी उसके साथ बिना ब्याहे रहती थी। लेकिन इसका मतलब  यह नहीं है कि वो हमारी बेटी की हत्या कर दे या आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर दे - उस दिन सब कुछ बदल जाएगा। औऱ वो दिन दूर नहीं है। पहले तो आत्महत्या के मामले उतने नहीं हैं जितने लिव इन रिलेशनशिप के हैं। लड़कियां अगर लिव इन में रहती है तो इसके कारण हैं। हम उन कारणों पर न जाकर सिर्फ लड़कियों से अपेक्षा करें कि वे ऐसा न करें और लड़कियों की उन जरूरतों को पूरी करने वाले पुरुषों को चरित्रहीन करार दें - तो समस्या हल नहीं होने वाली है। आखिर हर बार लड़की ही आत्महत्या क्यों करती है? क्यों नहीं कोई लड़की कहती है कि इसने शादी करने का झांसा देकर मेरे साथ अमुक मनमानी की और अब चाहता है कि मैं आत्महत्या कर लूं।

दरअसल समाज में यौन संबंध बनाना लड़की के लिए ही बुरा माना जाता है और इस कथित शर्म को झेलने की हिम्मत लड़कियों में भी नहीं होती है। इसीलिए वे आत्महत्या करने को मजबूर होती हैं। अपवाद छोड़ दें तो क्या लिव इन में रह चुकी लड़की के आशिक की मौत के बाद कोई लड़की से शादी कर लेगा और लड़के का कुछ बिगड़ेगा? यहां मैं यह भी कहूं कि लिव इन में रहना, यौन संबंध बनाना और गर्भवती हो जाना अलग-अलग चीजें हैं। यौन संबंध बनाने के बाद भी गर्भ न रहे इसके ढेरों उपाय हैं फिर भी अगर लड़की गर्भवती हो गई और नहीं चाहती थी तो वह अकेले दोषी है। यौन संबंध बनाना तो सोचा समझा निर्णय हो सकता है पर इससे गर्भ धारण का खतरा है और उससे बचने के उपाय करना मुख्य रूप से लड़की की ही जिम्मेदारी है (अगर वह गर्भवती नहीं होना चाहती है)।

पढ़ी-लिखी अच्छा कमाने वाली लड़की अगर आत्महत्या कर लेती है तो कारण यही समझ में आता है कि लड़कियां कमजोर होती हैं, बेटी विवाहपूर्व गर्भवती हो जाए तो शर्मिन्दा होते हैं कहते हैं कि मर क्यों नहीं गई जो ये दिन देखने पड़े, बेटे पर बलात्कार का आरोप लगे तो उसे बचाने की पूरी कोशिश करते हैं। इसलिए लड़के आत्महत्या नहीं करते लड़कियां कर लेती हैं।

सेक्स बंद कमरे में किया जाता है और निहायत ही निजी मामला है। ऐसे मे समलैंगिकता को कानून बनाकर नहीं रोका जा सका। यही स्थिति वेश्यावृत्ति के मामले में है। अगर वेश्यावृत्ति को जायज बनाने की मांग हो सकती है तो सेक्स इतना हौव्वा क्यों है। अवैध ढंग से वेश्यावृत्ति जारी रहने से महिलाएं परेशान हैं और पुरुषों का काम चल रहा है। हमारे यहां औरतों के बारे में ना सोचा जाता है और ना ऐसे विषयों पर बात होती है। इसलिए ऐसे ही चलता रहेगा और महिलाएं पिसती रहेंगी। जबकि वेश्यावृत्ति को कानूनी जामा पहना देने से इस तरह की समस्या दूर हो सकती है। हालांकि यह अलग मुद्दा है।

Monday, May 23, 2016

फ्री सेक्स : औरत के लिए सहमति का हक, आदमी के लिए जबर का हक

फ्री सेक्स का सीधा साधारण अर्थ अपने साथी की सहमति असहमति की इज्जत करना भर है...

लेकिन, ये बात वही समझेगा, जो इस किस्म की सहमति को लेने का आदि रहा हो. या इसे सही समझता हो. भारत जहाँ पिता बेटी से शादी की सहमति तक नहीं लेता, वहाँ पति अपनी बीवी की इच्छा का स्वागत करेगा ही, एक ख्वाब के अलावा कुछ नहीं लगता.

मुख्य बात ये है कि आम तौर पर भारत वैवाहिक संबंधो में सेक्स सहमति लेने का आदी रहा ही नहीं. विवाह संबंधो में सेक्स को भी पति का जायज हक बना दिया गया है.

एक वीडियो देखा, उसमें दिखा रहे हैं कि लड़की मायके वालों वालो को बता रही कि उसका पति उसकी सहमति नहीं लेता. और घर वाले इस मुद्दे पर गंभीर होने की बजाय हँस रहे होते हैं. मामा, ताऊ, मौसा सब कहते हैं कि यह सब विवाह के रोमांस का हिस्सा भर है.

ये मामूली बात नहीं. एक गंभीर बात है. समझ नहीं आता कि विवाह से पूर्व या विवाह के बाद भी घर की औरतों को घूर देने वाले बाहरी तत्वो से लड़ जाने वाले पिता चाचा, मौसा, मामा, जाने कैसे वैवाहिक बलात्कार पर संगीन चुप्पी साध लेते हैं.

इस कंडीशनिंग का ही परिणाम है कि फ्री सेक्स की साधारण सी बात पर भी इतना बवाल हो रहा है. फ्री मीन्स सहमति लेना. लेकिन शायद कूढ मगज समाज के वैवाहिक बलात्कार में इससे बाधा पड़ती हो...

फ्री मतलब सहमति‬, लेकिन इसे तोड़ा-मरोड़ा जा रहा. क्योंकि औरत को जिस दिन सेक्स में सहमति का हक पता चल जायेगा, उसी दिन उसी पल जबर संबंध बनाने के इनके फ्रीडम पर रोक लग जायेगी. इसीलिये जैसे ही औरत फ्री सेक्स (बिना दबाव के, सहमति से) की बात करती, वैसे ही औरत को सेक्स स्लेव्स बनाये रखने की इनकी साजिश और तेज हो जाती है.

फ्री को इसीलिये स्वछन्द संबंध बताकर बदनाम किया जा रहा. ताकि, खुद औरत ही इस मुहिम के खिलाफ़ हो जाये. सच कहूँ तो औरत की आजादी के सवाल पर अक्सर औरत को ही औरत से लड़ा देने की ये बहुत पुरानी चाल है. जो समझ चुकी है, वो सतर्क है. जो नहीं समझ पायी, वो अभी भी इनके बहकावे में आकर अनंत शोषण का शिकार बन जाती है. क्योकि, आपकी फ्रीडम से इनकी स्वछन्दता पर रोक लगाती है...

आपके फ्रीडम मतलब आपकी सहमति का हक, उनके फ्रीडम का मतलब उनके जबर का हक ..

खुद सोचे इसका अर्थ क्या है ?

वैवाहिक बलत्कार ! बलत्कार तो बलत्कार ही होता है 😢

जिस देश में कन्या से विवाह की अनुमति नहीं लेने की परंपरा हो, वहाँ पति से यह अपेक्षा रखना कि वह यौन की सहमति पत्नी से लेगा, एक मजाक के सिवा कुछ भी नहीं लगता. शायद दुर्भाग्यपूर्ण सच को मेनका गांधी भी स्वीकार करती रही होंगी, इसीलिये कुछ दिनो पहले उन्होने यह कहा था कि तमाम सान्स्कृतिक मूल्यो और सामाजिक बाध्यता की वजह से इस देश में वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में रखना संभव नहीं है. इस बात की जाने माने समाजशास्त्रियों ने तीखी आलोचना की थी. लेकिन यह आधा आबादी का पुरजोर विरोध ही था, जिसने मेनका गांधी और खुद सरकार को इस सन्दर्भ में यू टर्न लेने के लिये विवश कर दिया. इस मसले से अनेक सवाल पैदा होते हैं. क्या वाकई यह आँकड़ा इतना डरावना है कि अब कानून बनाने की नौबत आ गयी है? क्या वैवाहिक बलात्कार को आपराधिक बना देने से परिवार नामक संस्था टूटन की शिकार नहीं होगी? क्या दहेज एक्ट की तरह इस एक्ट का दुरुपयोग नहीं होगा? और इन सबसे बड़ा सवाल कि परिवार, घर और विवाह को बचाने के नाम पर इस भयावह हकीकत से मुकर जाना एक गंभीर असंवेदनशीलता नहीं होगी?

वैवाहिक-बलात्कार की व्याख्या से पूर्व यह समझना अतिआवश्यक है कि हमारे समाज में विवाह क्या है? विवाह हमारी संस्कृति मे एक संस्कार है. इसे पवित्र संस्था के रूप में बताया जाता है. निस्संदेह इसकी बुनियाद में आपसी प्रेम मौजूद है. जहाँ प्रेम है, वहाँ सहमति अपने आप उपस्थित हो जाता है. लेकिन यह तो हुयी सैद्धांतिक स्थिति. क्या वाकई विवाह की बुनियाद में प्रेम है? क्या वाकई दंपत्ती के बीच आपसी सहमति होती भी है? भारतीय समाज जिसमें कन्या से उसके ही विवाह में उसकी अनुमति लेना पिता आवश्यक नहीं समझता, क्या वाकई में पति सहवास के लिये पत्नी की अनुमति लेता ही होगा?जिस समाज में कन्या पराई अमानत और कन्या दान की चीज मान ली जाती हो, वहाँ पति द्वारा उसके साथ यथेच्छित व्यवहार अपने आप जायज हो जाता होगा. इस सोच ने लड़की के अस्तित्व को जुआ बनाकर रख दिया. आँकङे की बात सुने तो स्थिति भयावह दिखती है. 2013 मे 10000 लोगो पर किये गये यूनाईटेड नेशंस के सर्वे में पाया गया कि उनमे से एक चौथाई लोगो ने कभी ना कभी अपनी पत्नी से रेप किया था. यह सर्वे एशिया पर आधारित था. उनका यह मानना था कि अपनी बीवी से उसकी अनुमति के बिना सहवास करना उनका हक है.नेशनल क्राईम ब्यूरो रिकार्ड्स के अनुसार महिलाओ के खिलाफ हिंसा और वैवाहिक बलात्कार 2013 मे हुए अपराधो में सबसे बड़ा एकल अपराध था. इसके अनुसार रेप के अधिकाश मामले में परिचित ही शामिल रहे. इन परिचितो में पति भी आते हैं. इन आंकड़ो से ये बात साफ़ हो जाती है कि विवाह संस्था की हकीकत क्या है. भारत जहाँ सेक्स एक टैबू है और विवाह एक संस्कार, वहाँ वैवाहिक रेप के आंकङे आंख खोल देते हैं' एक समाज, जहाँ सेक्स पर बोलना पसंद नहीं किया जाता, वहाँ वैवाहिक रेप के ये आंकङे बताते हैं कि लोकलाज के भय से जाने कितने मामले छुपे होंगे.

इतनी भयावह तस्वीर के बावजूद भारत में संस्था की पवित्रता के नाम पर होने वाले रेप को रोकने का कोई कानून नहीं है. विडंबना नहीं तो और क्या है कि इक्कीसवीं सदी में प्रवेश के बावजूद अभी भी हम संस्थागत रूप से कितने पिछङे हुए हैं. अमेरिका समेत यूरोप के अनेक देशो में वैवाहिक बलात्कार को रोकने और दंडित करने के प्रावधान हैं. इस सन्दर्भ में आई पी सी की धारा एक विरोधाभासी पहल करती हुयी दिखायी पड़ती है. आइ पी सी की धारा 375 में रेप की व्याख्या की गयी है और धारा 376 में इस सन्दर्भ में दंड का प्रावधान किया गया है. इसके प्रावधान के अनुसार कोई व्यक्ति अपनी बीवी के साथ सहवास के लिये तब तक किसी भी दशा में अपराधी नहीं है, जब तक कि उसकी आयु सोलह साल से कम ना हो. समझ नहीं आता कि जब भारत में विवाह करने की न्यूनतम वैधानिक आयु 18 वर्ष है, तो' इस धारा को बनाने का औचित्य ही क्या है? इस पूरी समस्या का एक सामाजिक पहलू भी है. यह पहलू कानूनी पहलू से अधिक जटिल है. समस्या ये है कि यदि वैवाहिक बलात्कार को जुर्म की श्रेणी में रख दिया गया, तो क्या परिवार नामक संस्था के टूटन का खतरा पैदा नहीं हो जायेगा? क्या ऐसी दशा में इस एक्ट के दुरूपयोग का खतरा नहीं बढ जायेगा?

ऐसी दशा में इन सम्बंध से पैदा हुए बच्चो का भविश्य अंधकार में नहीं डूब जायेगा? इसीलिये कुछ समाजशास्त्री लोगो का सुझाव है कि इसका समाधान सामाजिक होना चाहिये. समाज एवं परिवार के लोग ऐसे मसलो में संबंधित लोगो पर दबाव बनाये. लेकिन क्या ये दबाव उतना प्रभावी होगा? खासकर उस समाज में जहाँ बेटी अमानत होती है और पति उसका स्वामी. दरअसल इस पूरी समस्या का तार्किक छोर कन्या को दान की चीज मान लेने में निहित है. जब तक ये भावना खत्म नहीं होगी, स्त्री का सम्मान सुनिश्चित नहीं किया जा सकता.

उपरोक्त विश्लेषन से स्पस्ट है कि वैवाहिक बलात्कार एक हकीकत है. एक संस्था को बचाने और उसे बनाये रखने के नाम पर इस त्रासदी को बनाये रखना घोर असंवेदनशीलता होगी. इस सन्दर्भ में साफ़ साफ़ कानूनी पहल की आवश्यकता है. इसके साथ साथ औरतो को पति परमेश्वर की सोच से बाहर निकालने की जरूरत भी है. क्योकि यू एन रिपोर्ट के अनुसारि तीस प्रतिशत औरते ही इसी पति का जायज हक के रूप में उचित समझती हैं. होना ये चाहिये कि ऐसे किसी भी मामले की प्राथमिकी दर्ज होने के बाद ऐसे दंपत्ति की काउंसिलींग हो. उनसे भावुक अपील हो. बीच का रास्ता निकालने और ऐसे पतियों को समझाने की पूरी कोशिश हो. अगर फ़िर भी व्यक्ति में सुधार ना हो तो उसके खिलाफ़ दंडात्मक कार्रवाइ हो. किसी भी सामाजिक संस्था को प्राकृतिक हक छीनने का कोई अधिकार नहीं. किसी सामाजिक संस्था को बचाने के नाम पर किसी की जिन्द्गी नरक बना देना, कोई समाधान नहीं. और संस्था को बचाने का पूरा दारोमदार किसी एक व्यक्ति पर ही क्यों?

Sunday, May 22, 2016

मुक्ति की आकांक्षा

चिड़िया को लाख समझाओ,
कि पिंजरे के बाहर,
धरती बहुत बड़ी है, निर्मम है।
वहाँ हवा में उसको
अपने जिस्म की गंध तक नहीं मिलेगी।

यूँ तो बाहर समुद्र है, नदी है, झरना है
पर पानी के लिए भटकना है,
यहाँ कटोरे में भरा जल गटकना है।
बाहर दाने का टोटा है,
यहाँ चुग्गा मोटा है।
बाहर बहेलिये का डर है,
यहाँ निर्द्वंद कंठ स्वर है।

फिर भी चिड़िया
मुक्ति का गाना गाएगी,
पिंजरे से जितना अंग निकल सकेगा, निकालेगी
हरसूँ जोर लगाएगी,
और पिंजरा टूट जाने या खुल जाने पर,
उड़ जायेगी।

(डॉ. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना)

Monday, May 16, 2016

बहू नही बेटी बनाकर कर ले जा रहे हैं !

विदा होते समय बस एक यही आवाज सुनाई दे रही थी
‪#‎भाई‬ साब आप परेशान ना हो मुक्ति को हम ‪#‎बहू‬ नहीं
बेटी बनाकर ले जा रहे हैं!
धीरे धीरे सुबह हुई और गाडी एक सजे हुए घर क सामने जा रुकी और जोर से आवाज आई!
“जल्दी आओ बहू आ गयी”!!
सजी हुई थाली लिए एक लड़की दरवाजे पर थी!
ये ‪#‎दीदी‬ थी जो स्वागत क लिए दरवाजे पर थी! और पूजा क बाद सबने एक साथ कहा “बहू को कमरे में ले जाओ” मुक्ति को समझ नहीं आया कुछ घंटो पहले तक तो मैं बेटी थी फिर अब कोई बेटी क्यों नही बोल रहा!
बहू के घर से फोन हैं बात करा दो! फ़ोन पर ‪#‎माँ‬ थी “कैसी हो बेटा”
मुक्ति-“ठीक हू माँ- पापा कैसे हैं दीदी कैसी हैं अभी तक
रो रही ह क्या?”
माँ- “सब ठीक हैं तुम्हारा मन लगा?”
मुक्ति-“ हाँ माँ लग गया” माँ से कैसे कहती बिलकुल मन
नहीं लग रहा घर की बहुत याद आ रही हैं फ़ोन रखते हुए माँ ने कहा बेटा देखो बहुत अच्छे लोग हैं बहू नहीं बेटी बनाकर रखेंगे बस तुम कोई गलती मत करना !मुक्ति और उसकी ननद विभा दोनों का जन्मदिन एक ही महीने में आता था!
मुक्ति बहुत खुश थी साथ साथ जन्मदिन मना लेंगे और पहली बार ससुराल में जन्मदिन मनाउंगी!
सुबह होते ही घर से सबका फोन आया मन बहुत खुश था और पति के मुबारकबाद देने से दिन और अच्छा हो गया था!
खैर शाम होते होते सब लोग एक साथ हुए और बस केक कट कर दिया गया और सासु माँ ने एक पचास का नोट दे दिया ! सासु माँ का दिया ये नोट मुक्ति को बहुत
अच्छा लगा ! जन्मदिन न मन पाने का थोडा दुख हुआ पर फिर लगा शायद ससुराल में ऐसे ही जन्मदिन मनता होगा !
अगले हफ्ते विभा दीदी का जन्मदिन आया सुबह से ही
सबके फ़ोन आने शुरू हो गये!
सासु माँ ने कहा मुक्ति आज खाना थोडा अच्छा बनाना विभा का जन्मदिन हैं
“जी माँ जी”
शाम होते ही मोहल्ले भर के लोगो का घर पर खाने क
लिए आगमन हुआ – सबने अच्छे से खाना खाया!
सासु माँ ने विभा को १००० का नोट देते हुए कहा
“बिटिया तुम्हारे कपडे अभी उधार रहे”
मुक्ति इस प्यार को देख कर बस मुस्कुरा ही रही थी की
पड़ोस की काकी ने पूछ लिया “ बहू तुम्हारा जन्मदिन
कब आता हैं”
मुक्ति बड़े प्यार से बोली- “काकी अभी पिछले
हफ्ते ही गया हैं इसलिए हम दोनों ने साथ साथ मना
लिया क्यू विभा दीदी सही कहा ना”
विभा उसकी तरफ देख कर सिर्फ मुस्कुरा दी !
रसोई में खाना बनाते हुए मुक्ति को एक बात आज ही
समझ आई !
“बेटी बनाकर रखेंगे कह देने भर से बहू बेटी नही बन जाती”
और माँ की बात याद आ गई “बस बेटा तुम कोई गलती मत करना”
और आंखे न जाने कब नम हो गयी !!
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Saturday, May 14, 2016

शेरनी

आदमी को औरत की ताक़त का अंदाजा उसी वक़्त लगा लेना चाहिए ...
जब वो उसे लेने पूरी बारात लेकर जाता है और वो शेरनी उधर से अकेली चली आती है...