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Friday, January 18, 2019

स्त्री क्या है और वह क्या चाहती है ?



इस फोटो को देखकर कामुकता जाग्रत होगी
(जैसी जिसकी सोच है लेख पुरा पडें) उसके आधार पर इस फोटो को देखा जायेगा, आपके नजरिये में बदलाव जरूर आयेगा......................
स्त्री समस्त ब्रम्हाण्ड है
स्त्री से ही ये संसार है। स्त्री सृजन है
स्त्री जननी है। स्त्री सुख है
स्त्री आनंद है। स्री सहयोग है
स्त्री साथी है। स्त्री ज्ञान है
स्त्री अध्यात्म है। स्त्री उजाला है, रोशनी है
स्त्री उम्मीद है। स्त्री पवित्र है
स्त्री संगम है। स्त्री साथ है
स्त्री अहसास है। स्त्री आशा है
स्त्री जीवन है। स्त्री धूप में छाँव है
स्त्री थकान में राहत है। स्त्री प्रेम है
स्त्री पूजा है। स्त्री माँ है
स्त्री बहन है। स्त्री प्रेमिका है
स्त्री पत्नी है। स्त्री त्याग है
स्त्री इज्जत है। स्त्री सम्मान है
स्त्री शान है। स्त्री बलिदान है
फिर क्यों जल रही है स्त्री,
फिर क्यों मारी जा रही है स्त्री,
फिर क्यों घुट रही है स्त्री,
फिर क्यों शर्मसार हो रही है स्त्री,
फिर क्यों सरे बाजार लुट रही है स्त्री,
फिर क्यों नोचि जा रही है स्त्री,
फिर क्यों दहेज़ की सूली चढाई जा रही है स्त्री,
फिर क्यों ????????????😢😢😢😢😢
(इसके मुख्य कुछ कारण है अशिक्षा असामान्यता धर्म दिखावा खोखले रिती रीवाज
संस्कार, नजरिया, सोच, मानसिकता, झूठी शान)
अगर हमारे समाज में इनमे सुधार हो जाये, तो स्त्री खुदबखुद सुरक्षित हो जायेगी !!!!! आखिर वो भी जीना चाहती है।

स्त्री क्या चाहती है 

बेईज्जत करने वाले सब,
कोई इज्जत करने वाला होता 😢
वासना मिटाने वाले सब,
कोई प्रेम करने वाला होता 😢
नोचने वाले सब,
कोई सहजने वाला होता 😢
दुपट्टा उतारने वाले सब,
कोई डालने वाला होता 😢
मारने वाले सब 
कोई बचाने वाला होता 😢
मिटाने वाले सब,
कोई बनाने वाला होता 😢
दुःख देने वाले सब,
कोई मुस्कान देने वाला होता 😢
खुद को समझने वाले सब
कोई स्त्री को भी समझने वाला होता 😢
दहेज माँगनेवाले सब
कोई दुल्हन को ही दहेज़ समझने वाला होता 😢
(काश की ऐसा और ये सब होता, तो कोई संजली, निर्भया, सोनी, आसिफा, गुड़िया, रानी, बिटिया (अनगिनत स्त्रियां) 😭😭😭😭😭 न जलती न मरती सब होती) पर अफसोस, 😭😭😭😭😭😭😭😭😭💔
विनम्र निवेदन है, की अपनी सोच बदले, आखिर कब तक स्त्री ऐसे ही मरती रहेगी, और ये सब होता रहेगा 😭😭😭😭💔😭💔😭💔💔😭
(अपने बच्चों पर ध्यान दें, और उन्हें अच्छे संस्कार दें, उन्हें नैतिकता सिखाये, क्यों की भेड़िये, हैवान हमारे समाज के ही होते हैं , आज इस आधुनिकता के परिवेश में माँ पिता बच्चों को समय नही देते, या न दें पाते हैं , ये जो कुछ भी हमारे समाज में हो रहा हैं, उसका कारण कहीं न कहीं हम सब है, संस्कार है,
कब तक हम किसी सरकार को दोष देते रहेंगे, सरकार हमे संस्कार देने नही आयेगी, सरकार अपराध रोक सकती है, मुल्जिमो को सजा दे सकती है, न की हमारे नजरिये को बदल सकती है, न ही संस्कार दे सकती है, ये हमे खुद ही करना होगा,
अपने परिवार बच्चो को समय दे, अच्छे संस्कार दे, रोज की दिनचर्या जाने, बात करे,)
नारी के पेट से जन्म लिऐ फिर नारी का आपमान किया किस सूअर की पहचान है 
जो सूअर नारी का विरोध करते कभी शबरी माला मन्दिर में, उन सूअरों को एक बार भी याद नही रहता की वो सूअर जिस मॉ से पैदा हुये वो एक नारी है 
नारी ना होती तो तू ना होता हम ना होते ये मन्दिर ना होता ये देश ना होता।
नारी मान सम्मान है आभिमान है।
नारी से कोई ताकतवर नही होता नारी को कभी कमजोर ना समझो, कुत्तो नारी खुद मर्द को जन्म देती है लेकिन देश का आभिमान बनाये रखी है ।।।
।।नारी से पहचान है हमारी तुम्हारी ।
इस देश की ।।

Friday, October 26, 2018

" कीचड़ "😢😢😢😢😢कहानी पढ़ने के बाद रूह काँप जाएगी..!!


उसे नारी देह बहुत पसंद थी, वह भी बिना कपड़ों के हर दिन उसे खेलने के लिए एक नया गोश्त चाहिए था, आज भी वह गोश्त की दुकान की सीढ़ियां चढ़ रहा था।
रोज की तरह कई जिस्म देखे फिर एक सबसे कम उम्र
की देह उसे पसंद आई। उम्र उसकी कम थी पर हाव भाव से और इशारों से वह काफी समझदार लग रही थी वह उसे लेकर कमरे की तरफ चल दिया, पेमेंट पहले ही कर दी थी। कमरा भी ऐशो-आराम वाला था क्योंकि उसके पास पैसों की कमी नहीं थी।
वह लड़की से बोला - "तुम्हें आज पहली बार देख रहा हूं.."
"हां साहब कल ही मेरा सेठ मुझे यहां लाया है, अब देर मत करो साहब दिन में 10 कस्टमरों का कोटा पूरा करना है"
यह कहकर उसने अपने शरीर से दीवार बन रहे कपड़ों को अलग कर दिया वह किसी भूखे कुत्ते की तरह झपट पड़ा जैसे उसकी आत्मा वासना के गंदे सागर में मिलने के लिए बेताब थी, थोड़ी देर में उसने अपनी मृगतृष्णा शांत कर ली थी।
जब उसकी आंखों से वासना का खुमार कम हुआ तो कमरे में भी नजर दौड़ाई पलंग के बराबर टेबल पर एक फोटो देखते ही उसके पैरों से जमीन खिसक गई, वह जड़ा सा उस फोटो को देखता रह गया।
उस फोटो में उसकी बेटी और उस घर में काम करने वाली आयी की फोटो था जो 10 साल पहले उसकी बेटी को घर से उठा कर भाग गई थी।
घरवालों ने बहुत दिन तक उसे ढूंढ रहा था लेकिन वह नहीं मिली थी, उसने टूटते हुए थरथराते शब्दों में पूछा -
"ये... ये... यह फोटो किसकी है"
"मेरी और मेरी मां की है साहब जो अब इस दुनिया में नहीं है इसलिए मैं उसकी फोटो साथ रखती हूं..."
"क क क्या तुम्हें याद है पहले तुम कहां रहती थी ?"
"नहीं साहब होश संभाला तो यही कलकत्ते में हूं यह फोटो तो बहुत पुरानी है पर तुम क्यों पूछ रहे हो साहब..."
"ना ना नहीं कुछ नहीं"
उसकी आवाज गले में अटक गई थी वासना का नशा फर्श पर गिरकर चित्कार कर रहा था वह कपड़े पहनने के बाद भी अपने आप को नंगा महसूस कर रहा था।
आज उसे दुनिया की हर लड़की जिसे वह अपना खिलौना बना चुका था उसमे आज उसकी अपनी बेटी भी खड़ी दिख रही थी, सैलाब उत्तर जाने के बाद अब वहां सिर्फ कीचड़ ही कीचड़ थी।
अब कुछ नहीं हो सकता था वासना की तलवार रिश्तो का गला काट चुकी थी। वह अपना क्रत्य किसी को बता नहीं सकता था अब वह भारी कदमों से वही सीढ़ियां उतर रहा था जिन पर वह उड़ कर गया था।..........
मजबुरी का फायेदा उठाने से अच्छा हैं मजबुर व्यक्ति का
साथ देना ....!!
😢😢😢

Tuesday, October 9, 2018

अबॉर्शन से जुड़ी वे जानकारियां जो हर महिला को जाननी चाहिए

पिछले कुछ समय से #MyBodyMyChoice अर्थात मेरा शरीर और मेरी पसंद कैंपेन के तहत कुछ संगठनों द्वारा यह मांग की जा रही है कि एक महिला को उसके शरीर पर पूरा अधिकार है इसलिए उसे अपने गर्भ निर्धारण और गर्भपात दोनों का अधिकार मिलना चाहिए।
मैं इस मांग और इस अवधारणा से सहमत हूं लेकिन ‘पसंद’ या ‘अधिकार’ की बात तो तब हो ना, जब सभी महिलाओं को इसके बारे में जानकारी हो या फिर उन्हें इस बारे में अपनी राय रखने की पूरी छूट दी जाये या फिर कभी उनसे इस बारे में राय लेने के बारे में सोचा जाये।
हालात तो यह है कि आज भी भारत के कई घरों में महिलाओं को अपनी बेहद निजी ज़रूरतों से संबंधित चीज़ों को खुद से खरीदने तक का अधिकार नहीं है, तो गर्भपात का अधिकार तो बहुत दूर की बात है।
मेरे ऑफिस की एक सहयोगी से पता चला कि उनके पड़ोस में रहनेवाली एक लड़की को अपनी मर्ज़ी से अपने अंत:वस्त्र खरीदने की भी इजाज़त नहीं है। उसका पति उसे सभी चीज़ें लाकर देता है, फिर चाहे उसे वो पसंद आए या ना आए, उसे वही पहनना होता है।
यह सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ और अटपटा भी लगा क्योंकि यह मेरी कल्पना से परे था लेकिन यह हकीकत है। अब ऐसी स्थिति में आप ही सोचिए कि जिस समाज में महिलाओं को अपनी पसंद से कपड़े खरीदने का भी हक नहीं हो, वहां गर्भपात कराने का अधिकार क्या खाक मिलेगा।
गर्भपात का अर्थ है, भ्रूण को पूर्ण विकसित होने से पूर्व ही उसे गर्भाशय से निकालकर बाहर करना। ऐसा करने से गर्भावस्था की समाप्ति हो जाती है। गर्भपात को अंग्रेजी में Abortion कहा जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अपनी रिपोर्ट में दुनियाभर में कराये जा रहे गर्भपात को तीन श्रेणियों में बांटा है। सुरक्षित गर्भपात, कम सुरक्षित गर्भपात और बहुत कम सुरक्षित गर्भपात।
आंकड़ों के मुताबिक-
1. पूरी दुनिया में 2010 से 2014 के बीच 55% सुरक्षित गर्भपात हुए थे।
2. लगभग 31% गर्भपात ऐसे होते हैं जो कम सुरक्षित गर्भपात की श्रेणी में आते हैं।
3. 2010 से 2014 के बीच प्रत्येक वर्ष दुनियाभर में 45% असुरक्षित गर्भपात हुए।
4. 97% असुरक्षित गर्भपात एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरीकी देशों में होते हैं।
5. भारत जैसे विकासशील देशों में 50% तक असुरक्षित गर्भपात होते हैं।
6. भारत में असुरक्षित गर्भपात के कारण हर दिन लगभग 13 महिलाओं की मृत्यु होती है।
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाईजेशन के अनुसार भारत में होने वाले दो तिहाई गर्भपात अवैध और असुरक्षित तरीकों से या तो घर में किये जाते हैं या फिर गैर-कानूनी रूप से चल रहे दवाखानों में गैर-पेशेवर लोगों द्वारा इसे अंजाम दिया जाता है। ये हालात उस देश में हैं जहां गर्भपात ना सिर्फ वैध है बल्कि आसानी से मुहैया भी करवाया जा सकता है।
संवैधानिक दृष्टि से वर्ष 1971 में पारित मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट (Medical Termination of Pregnancy Act-‘MTP act’) के अनुसार निम्न परिस्थतियों में एक महिला को अपनी मर्ज़ी से गर्भपात कराने का अधिकार दिया गया है-
1. अगर गर्भ के कारण महिला की जान खतरे में हो।
2. यदि गर्भ की वजह से महिला को गंभीर मानसिक और शारीरिक परेशानी होने की संभावना हो।
3. यदि गर्भ में पल रहे बच्चे के किसी अंग के डैमेज होने का शक हो।
4. अगर महिला मानसिक या शारीरिक तौर पर गर्भधारण के लिए सक्षम ना हो।
5. अगर किसी महिला के साथ हुए बलात्कार की वजह से वह गर्भवती हुई हो।
6. अगर किसी महिला की मर्ज़ी के खिलाफ उसका अबॉर्शन कराया जाता है, तो ऐसे में दोषी व्यक्तियों को सज़ा का प्रावधान है।
इसके अलावा, गर्भपात जहां पर किया जा रहा है, उस संस्थान का एमटीपी एक्ट के तहत सीएमओ ऑफिस में रजिस्टर्ड होना ज़रूरी है। जो डॉक्टर अबॉर्शन कर रहे हों, उनके पास एमबीबीएस डिग्री के अलावा डीओजी या एमडी डिग्री भी होनी चाहिए। गर्भपात कराने वाली लड़की के नाबालिग होने की स्थिति में उसके माता-पिता से कानूनी सलाह-मशविरा किया जाना अनिवार्य है।

अविवाहित महिलाओं को भी गर्भपात का कानूनी अधिकार-

अविवाहित महिलाओं को गर्भपात का कानूनी अधिकार मिलने के बाद भी उन्हें समाज में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वर्तमान समाज में लिव-इन रिलेशनशिप आम होता जा रहा है, ऐसे में बहुत ज़रूरी है कि कानूनी मान्याताओं के साथ ही सामाजिक रूप में भी इसे अपनाया जाए।
वर्तमान में इस वजह से अक्सर अविवाहित महिलाएं डॉक्टर के पास जाकर गर्भपात कराने से बचती हैं और इधर-उधर से पूछताछ करके या इंटरनेट से अधकचरी जानकारी लेकर खुद अपने हाथों अपना गर्भपात करने का रिस्क उठाती हैं। परिणाम, उनको कई तरह की शारीरिक और मानसिक परेशानियां उठानी पड़ती हैं। यहां तक कि कई बार तो उनकी जान पर बन आती है।
वर्ष 2014 में इस उद्देश्य से प्रस्तावित कानून के मुताबिक सभी महिलाओं को अपनी मर्ज़ी से गर्भपात की इजाज़त दी गयी है। साथ ही, इसमें यह प्रस्ताव भी रखा गया है कि गर्भपात कराते समय उस लड़की अथवा महिला की निजता का ख्याल रखा जाये।
नये नियमों के मुताबिक गर्भपात के लिए प्रशिक्षित डॉक्टरों की संख्या कम ना पड़े इसलिए आयुष के अंदर आने वाले डॉक्टरों को भी गर्भपात कराने की इजाज़त दी जा रही है। इसके अलावा, पूर्व कानून के अनुसार गर्भ के 20 हफ्तों तक गर्भपात कराना भारत में कानूनी तौर पर मान्य है, इस सीमा को 24 हफ्तों तक बढ़ाने की सिफारिश भी की गयी है।

मेरी राय में गर्भपात के संदर्भ में निम्नलिखित मुद्दों को ध्यान में रखा जाना बेहद ज़रूरी है-

हमारे देश में आज भी सबसे ज़्यादा गर्भपात परिवार के भीतर रहने वाली महिलाओं द्वारा करवाया जाता है, कभी पति या परिवार के दबाव में तो कभी जानकारी के अभाव में (अनचाहे गर्भ की स्थिति में) लेकिन अफसोस कि उनके बारे में कभी कहीं कोई चर्चा होती ही नहीं है। इन मामलों में ही कई तरह की स्थितियां बनती हैं।
पहला, मेडिकल साइंस के अनुसार, एक बच्चे के जन्म में बाद किसी महिला का शरीर अगले तीन सालों तक दोबारा से कंसीव करने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं होता है। ऐसे में अगर किसी वजह से उसका गर्भ ठहर जाता है, तो उसे गर्भपात कराने का अधिकार मिलना ही चाहिए।
दूसरा, अगर कोई विवाहित या अविवाहित महिला गभर्वती हो और शारीरिक, आर्थिक रूप से समर्थ होने के बावजूद बच्चा नहीं चाहती हो, तो उसे गर्भपात का अधिकार मिलना चाहिए। यहां भी कारण बताने की अनिवार्यता नहीं होनी चाहिए।
तीसरा, अगर जानकारी या सुरक्षा उपायों के अभाव में कोई महिला (विवाहित/अविवाहित) प्रेग्नेंट होती है और पूरी तरह से सक्षम होने के बावजूद वह उस बच्चे को जन्म देना नहीं चाहती लेकिन पति/पार्टनर बच्चा चाहता हो, तो उसके गर्भपात अधिकार में पति की सहमति का भी ख्याल रखा जाना चाहिए क्योंकि बच्चे पर पिता का भी हक होता है।

“मेरा पति मेरा गर्भपात कराना चाहता है ताकि उसे यौन संबंध बनाने में दिक्कत ना हो”

“मैं सरकारी नौकरी करती हूं और मेरी शादी के दस महीने हो गए हैं। हर लड़की की चाहत होती है कि शादी के बाद एक दिन वो भी माँ बने। शादी से पहले मैं भी ऐसा सपना देखती थी, लेकिन मेरे पति ने सारे अरमानों पर पानी फेर दिया। दरअसल उसे कॉन्डम के साथ मज़ा नहीं आता है और इसलिए मैं अकसर गोलियां खाया करती थी। गोलियों से मेरी तबियत खराब हो जाती थी, इसलिए मैंने गोलियां लेनी बंद कर दी। पांच महीने हो चुके हैं मैं गर्भवती हूं और मेरे पति लगातार मुझे गर्भपात के लिए कहते रहते हैं। लेकिन मुझे यह हत्या लगता है, इसलिए मैंने साफ तौर पर मना कर दिया है।

मेरा पति गर्भपात इसलिए करवाना चाहता है ताकि उसे सेक्स करने में कोई परेशानी ना हो। एक तो मैं सुबह से लेकर शाम तक ऑफिस में होती थी और जब घर लौटती थी तब पॉर्न फिल्मों से प्रेरित होकर मेरा पति मेरी जान निकाल देता था।
मैंने कई बार उसे मना किया लेकिन वो सुनने वालों में से कहां था। उसे तो सुबह से लेकर शाम तक बस सेक्स ही चाहिए था। मैंने जब कहा कि मैं गर्भवती हूं तब उसने मुझे बहुत मारा और वो भी पेट पर ताकि मेरा बच्चा मर जाए। क्योंकि उसके लिए हमारा बच्चा तो सेक्स करने में बाधा बन रहा था ना।
अगले दिन जब मुझे काफी ब्लीडिंग हुई तब लगा कि मेरा बच्चा मर चुका होगा। एक दिन फिर जब मैंने मना किया तब उसने चाय बनाने वाली बर्तन से मेरे सर पर तब तक मारा जब तक वो लगभग टूट ना गया और उसका निशाना फिर से मेरे पेट में पल रहा उसका बच्चा था। उसने दो चार लात पेट पर लगा ही दी। मैं तीन महीने में तीन बार अल्ट्रासाउंड करवा चुकी हूं, यह जानने के लिए कि मेरा बच्चा ज़िन्दा है भी या नहीं। यूं तो रोज़ मैं बलात्कार का शिकार होती हूं। इतना डरती हूं कि रात-रात भर जागी रहती हूं, क्या पता वो मुझे सोते हुए कहीं मार ना दें।
लेकिन मां-बाबूजी कहते हैं कि समाज क्या कहेगा, थोड़ा एडजस्ट करो। उन्हें समाज की चिंता है और मुझे उनके मान-सम्मान की। शादी से पहले जब भी मैं कोई रोमांटिक सीन देखती थी तब मुझे अच्छा लगता था, लेकिन आज सेक्स मेरे लिए अत्याचार से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
मेरे सास-ससुर कहते हैं कि मैं औरत हूं और औरतों की ज़िन्दगी ऐसी ही होती है। अगर यह बात सच है तब निःसंदेह मुझे ऐसी ज़िन्दगी नहीं चाहिए। मैं समाज से पूछना चाहती हूं कि क्या मेरे सास की ज़िन्दगी भी ऐसी थी।
वो कहता हैं मैं कोल्ड हूं, मैं ‘टर्न ऑन’ नहीं होती। क्या मैं मशीन हूं जिसे आप जब चाहे बटन दबाकर ‘टर्न ऑन’ कर सकते हैं। मेरा कोई दोस्त नहीं है और खासकर लड़का तो और भी नहीं, क्योंकि मेरे पति को लड़कों से मेरा बात करना पसंद नहीं है। हां, उसकी कोई गर्लफ्रेंड ज़रूर थी जिनसे उसकी आज भी बातचीत होती है। मैं उसके पिछले रिश्ते पर ध्यान नहीं देती क्योंकि मुझे पता है समय के साथ वो खत्म हो जाएगा। अब मैं अपने बच्चे को बचाने में लगी रहती हूं।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि मेरे चोट के निशान के बारे में जब भी ऑफिस की एक महिला साथी पूछती है, तब मैं यहीं कहती हूं कि बाथरूम में गिर गई थी और वो मुस्कुराते हुए कहती हैं कि मैं भी लगभग रोज़ बाथरूम में गिर जाती थी। वो ये कहकर चली जाती है कि जब औरत बाथरूम में गिरने लगे तब समझ लेना उसकी शादी कभी नहीं टूटेगी, जैसे उनकी आज तक नहीं टूटी। मैं यह सुनकर खौफज़दा हो जाती हूं कि क्या समाज का मान रखने के लिए मुझे इसकी आदत लगानी पड़ेगी।
मैं हमेशा सोचती रहती हूं कि आत्महत्या कर लूं, लेकिन गर्भवती होने की वजह से अब तो आत्महत्या भी नहीं कर सकती। पढ़ी लिखी होने के बाद भी अगर मेरे साथ ऐसी चीज़ें हो सकती हैं, फिर उन औरतों का क्या होता होगा जो मेरी तरह नहीं है।
मैं रोज़ मरती हूं लेकिन जीना अब मेरी मजबूरी बन गई है। मृत्यु स्वतंत्रता जैसी लगती है। शादी तोड़ना चाहती हूं, लेकिन क्या यह समाज कभी सोचेगा कि मैं अकेले एक स्वतंत्र महिला के रूप में जीवन जी सकती हूं।
क्या ‘समय’ मेरी आत्मा पर लगे घाव भी भर देगा? वो लातें जो मेरे पेट पर लगी थीं वो असल में पेट नहीं आत्मा पर घाव कर गई थी।मेरे आत्मसम्मान की धज्जियां उड़ गई।
हम सब गर्व करते हैं कि ये महान, वो महान और अंत में कहते हैं कि मेरा भारत महान। जिस महान देश में मेरे जैसी औरतों का ये हाल हो, वैसी महानता किस काम की। मेरा ईश्वर पर से विश्वास उठ गया है क्योंकि मेरा पति परमेश्वर है। भगवानों में श्रेष्ठ! श्रेष्ठ का ही जब हाल ऐसा हो, तब उसके नीचे वाले क्या करते होंगे, सोचकर ही रूह कांप जाती है।
आपके कई लेख यूथ की आवाज़ पर पढ़ने के बाद दिल में एक उम्मीद जगी। आप कुछ कर नहीं सकते, कम-से-कम समझ तो सकते हो। हर कोई मुझे एडजस्ट करने ही कहता है। अब आप बताएं एडजस्मेंट तो ज़िन्दगी से किया जाएगा ना, मृत्यु से कोई कैसे एडजस्ट करे? मैं अपना नाम भी नहीं बता रही क्योंकि मैं पहचान, अस्मिता सब कुछ खो चुकी हूं। मेरा गुमनाम हो जाना ही मेरे अच्छे औरत होने की निशानी है।”

Tuesday, October 2, 2018

पहले बने आदर्श पति और सास फिर मिलेगी आदर्श बह

अगर ससुराल का हर व्यक्ति अपनी भूमिका को आदर्श तरीके से निभाये और आने वाली बहू से स्नेह, सहयोग और सम्मान का व्यवहार करे तो ये लगभग सुनिश्चित है कि बहू भी आदर्श भूमिका निभाने को तैयार रहेगी.
भोपाल का बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय 3 महीने का एक कोर्स शुरू करने जा रहा है, जिसमें लड़कियों को ये सिखाया जाएगा कि कैसे आदर्श बहू बनें. कोर्स की समाप्ति पर सर्टिफिकेट भी मिलेगा. विश्वविद्यालय के उप कुलपति डी सी गुप्ता का कहना है कि सास-बहू के झगड़े को रोकने के इरादे से ये कोर्स शुरू किया जा रहा है. विश्वविद्यालय का यह भी कहना है कि इससे महिला सशक्तिकरण को बल मिलेगा.
आदर्श बहू, भोपाल, मध्य प्रदेशमध्य प्रदेश के भोपाल में एक यूनिवर्सिटी आदर्श बहू बनाने का कोर्स शुरू कर रही है.
दरअसल, भारतीय समाज में विवाह एक ऐसा संस्थान है, जिसके सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पहलू हैं. पश्चिमी समाज की तरह हमारे यहां विवाह दो व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि 2 परिवारों के बीच होता है. शादी होते ही एक लड़की के लिए पत्नी, बहू, भाभी जैसे तमाम रोल तय हो जाते हैं और उससे जुड़ी भूमिकाएं और उम्मीदें भी. अब तो संयुक्त परिवार की परंपरा काफी कम हो गई है लेकिन अभी भी शादी के बाद बहू को पति के अलावा सास-ससुर, देवर और ननद के साथ काफी वक्त बिताना पड़ता है. किसी भी परिवार में सास-बहू के बीच अक्सर विवाद के मामले सामने आते रहते हैं. सास को लगता है कि बहू अपनी जिम्मेदारी को ठीक से नहीं निभा रही तो बहू महसूस करती है कि सास से उसे स्नेह और सहयोग नहीं मिल रहा है, जिससे अक्सर परिवार में तनाव बना रहता है. टीवी पर आने वाले तमाम सीरियल तो इसी विषय पर आधारित होते हैं.
दरअसल सास और बहू दो अलग-अलग पीढियों से आती हैं और अक्सर दोनों एक दूसरे को उनके नजरिये से देखने समझने की शायद कोशिश नहीं करते हैं. लेकिन इस मामले में मैं व्यक्तिगत तौर पर महसूस करता हूं कि सबसे ज्यादा जिम्मेदारी सास या ससुराल पक्ष की होती है. एक लड़की की शादी होकर जब वो अपने ससुराल आती है तो उससे उम्मीद की जाती है कि वो पत्नी, बहू, भाभी जैसी तमाम रिश्तों को बहुत खूबसूरती से और आदर्श तरीके से निभाए. नई दुल्हन के लिए हालात काफी मुश्किल होते हैं. उसके लिए माहौल, घर के लोग, उनका स्वभाव, खान-पान की आदत सब कुछ नया होता है. कई बार जिस माहौल में उसने अपने जीवन के 25-30 साल गुजारे होते हैं वो काफी अलग होता है इसलिये उसे तालमेल बैठाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.
मेरा मानना है कि किसी भी नई दुल्हन को आदर्श बहू बनाने की जिम्मेदारी ससुराल वालों से शुरू होती है. अगर एक अकेली बहू से परिवार के 6-8 लोगों को खुश रखने की उम्मीद की जा सकती है वो भी एक नए माहौल में तो पति और सास सहित परिवार के 6-8 लोग मिलकर एक नई बहू को प्यार और सम्मान देकर खुश क्यों नहीं रख सकते? उम्र में बड़े और जीवन का ज्यादा अनुभव रखने वाले सास और ससुर क्या बहू से आदर्श व्यवहार की उम्मीद रखने से पहले खुद आदर्श सास-ससुर बनने को तैयार हैं. क्या सास ने अपने लड़के की परवरिश इस तरह की है कि वो एक आदर्श पति की भूमिका निभा सके? अगर ससुराल का हर व्यक्ति अपनी भूमिका को आदर्श तरीके से निभाये और आने वाली बहू से स्नेह, सहयोग और सम्मान का व्यवहार करे तो ये लगभग सुनिश्चित है कि बहू भी आदर्श भूमिका निभाने को तैयार रहेगी, और ऐसे किसी कोर्स की जरूरत नहीं होगी, अन्यथा आदर्श बहू के साथ आदर्श सास और आदर्श पति के कोर्स भी चलाने चाहिए.

Adultery Law: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साइड इफेक्ट आने लगे है

ऐसी बहुत सी महिलाएं हैं जो व्यभिचारी पति से तलाक नहीं लेना चाहतीं. तलाक भी वही ले सकती हैं जो सक्षम हैं, पढ़ी-लिखी हैं, आत्मनिर्भर हैं या फिर मायके वालों का पूरा सपोर्ट है. लेकिन जिनके पास ऐसा कुछ भी नहीं वो क्या करें?

जिस दिन सुप्रीम कोर्ट ने एडल्टरी लॉ पर फैसला सुनाया, ये बात उसी दिन पक्की हो गई थी कि आने वाला समय जो दिखाने वाला है उसके लिए हम सबको तैयार रहना चाहिए. हमारी या आपकी जिंदगियों पर सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला असल भले ही नहीं डालता हो लेकिन Adultery Law को खत्म करके उन लोगों की आंखों में चमक जरूर आ गई थी जो विवाहेतर संबंधों में लिप्त थे.
इस फैसले के साइड इफेक्ट तो होंगे पर इतनी जल्दी सामने आएंगे ये सोचा नहीं था. चेन्नई में एक 24 साल की महिला ने आत्महत्या कर ली. वजह ये कि जब महिला को पति के किसी दूसरी औरत के साथ संबंधों का पता चला तो उसने पति को उससे दूरी बनाने के लिए कहा और धमकाया भी कि वो पुलिस में शिकायत करेगी. लेकिन पति जिसे अब कोई डर नहीं था उसने कहा कि चूंकि सुप्रीमकोर्ट ने कहा है कि व्यभिचार अपराध नहीं है इसलिए तुम मुझे किसी और महिला के साथ संबंध रखने के लिए रोक नहीं सकतीं. महिला क्या करती, उसने फांसी लगा ली. अपने सुसाइड नोट में उसने आत्महत्या का कारण भी यही लिखा है. इन दोनों ने दो साल पहले परिवार के खिलाफ जाकर लव मैरिज की थी, एक बच्चा भी है. लेकिन पत्नी को टीबी हो गई जिसकी वजह से पति उससे दूर रहने लगा था. पति सिक्योरिटी गार्ड है. अब चूंकि सुसाइड नोट में कारण एडलटरी है, इसलिए पति पर आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा चलेगा.
adultery lawपत्नी जब अपने पति को रोक नहीं सकी तो आत्महत्या कर ली
पर अवैध संबंध अगर वैध करार दिए गए तो क्या इसका मतलब ये हुआ कि ये संबंध गर्व की बात है? इस फैसले से अवैध संबंधों की वजह से अब तक समाज से डर रहे लोग निडर हो गए, और इसीलिए खुलकर अपने संबंध स्वीकार करने लगे. लेकिन हमारा समाज इस लायक ही नहीं कि उसे भारी भरकम चीजें कानून के दायरे में रहकर समझाई जाएं. समाज के कुछ लोगों ने इस फैसले को अपना हक समझ लिया और विवाहेतर संबंधों को इस तरह लेने लगे जैसे वो संबंध सही हों.
सुप्रीम कोर्ट ने उन महिलाओं के हित में ये फैसला दिया था जो अपने व्यभिचारी पति के खिलाफ शिकायत नहीं कर सकती थीं. और इस बात को आधार बनाकर तलाक नहीं ले सकती थीं. लेकिन एडलटरी को असंवैधानिक कहने वाले सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से कुछ महिलाओं का तो अहित ही हुआ.
चेन्नई के इस मामले में वो महिला जो परिवार के खिलाफ जाकर शादी करती है. उसके एक बच्चा भी है, बीमारी की वजह से पति भी किसी दूसरी औरत के पास चला गया. ऐसी महिलाओं के पास सिवाए आत्महत्या के और चारा ही क्या बचता है. वो वापस मायके नहीं जा सकती, पति पर निर्भर है, पति को तलाक नहीं दे सकती, बच्चे को छोड़कर बाहर नौकरी नहीं कर सकती. ऐसी बहुत सी महिलाएं हैं जो तलाक नहीं लेना चाहतीं. तलाक भी वही ले सकती हैं जो सक्षम हैं, पढ़ी-लिखी हैं, आत्मनिर्भर हैं या फिर जिन्हें मायके वालों का पूरा सपोर्ट है. लेकिन जिनके पास ऐसा कुछ भी नहीं वो क्या करें?
कानून कहता है कि हिंदू धर्म में दो शादियां करना अवैध है, लेकिन पति कितने भी संबंध रख सकता है- वो वैध है. ये किस तरह का कानून है? मतलब पति अगर व्यभिचारी है तो पत्नी या तो पति को तलाक दे दे, या फिर खुद किसी के साथ संबंध बना ले या फिर आत्महत्या कर ले. यही बात अब पतियों पर भी लागू होती है.  
चेन्नई की ये घटना सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का वो परिणाम था, जो अच्छा नहीं था. और न जाने कितने मामले हम आने वाले समय में देखें. लेकिन एक बात तो है कि अब दो लोगों के बीच जन्मों का बंधन जिसे शादी कहा जाता है, उसकी कीमत और भी कम हो जाएगी. जाहिर है जब तलाक के मामले बढ़ेंगे तो शादियों की अहमियत खुद ब खुद घट जाएगी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर समाज खुद सोचे कि अवैध संबंधों को वैध करार देने से व्यभिचार नैतिक रूप से स्वीकार्य नहीं हो जाता. जिस बात पर शर्म आती थी उसे कम से कम बेशर्मी न बनाया जाए.

Saturday, May 12, 2018

ईश्वर की मर्जी.........पूरी कहानी जरूर पढ़ें,



लड़कियों के स्कूल में आने वाली नई टीचर ख़ूबसूरत और शैक्षणिक तौर पर भी मज़बूत थी लेकिन उसने अभी तक शादी नहीं की थी..

सब लड़कियां उसके इर्द-गिर्द जमा हो गईं और मज़ाक़ करने लगीं कि मैडम आपने अभी तक शादी क्यों नहीं की..?

मैडम ने दास्तान कुछ यूं शुरू की_एक महिला की पांच बेटियां थीं, पति ने उसको धमकी दी कि अगर इस बार भी बेटी हुई तो उस बेटी को बाहर किसी सड़क या चौक पर फेंक आऊंगा,

ईश्वर की मर्जी वो ही जाने कि छटी बार भी बेटी पैदा हुई और पति ने बेटी को उठाया और रात के अंधेरे में शहर के बीचों-बीच चौक पर रख आया, मां पूरी रात उस नन्ही सी जान के लिए दुआ करती रही और बेटी को ईश्वर के सुपुर्द कर दिया।

दूसरे दिन सुबह पिता जब चौक से गुज़रा तो देखा कि कोई बच्ची को ले नहीं गया बाप बेटी को वापस घर लाया लेकिन दूसरी रात फिर बेटी को चौक पर रख आया लेकिन रोज यही होता रहा हर बार पिता बाहर रख आया और जब कोई लेना जाता तो मजबूरन वापस उठा लाता,

यहां तक कि उसका पिता थक गया और ईश्वर की मर्जी पर राज़ी हो गया। फिर ईश्वर ने कुछ ऐसा किया कि एक साल बाद मां फिर पेट से हो गई ...और इसबार उनको बेटा हुआ, लेकिन कुछ ही दिन बाद बेटियों में से एक की मौत हो गई यहां तक कि माँ पांच बार पेट से हुई और पांच बेटे हुए लेकिन हर बार उसकी बेटियों में से एक इस दुनियां से चली जाती ।

सिर्फ एक ही बेटी ज़िंदा बची ...और वो वही बेटी थी जिससे बाप जान छुड़ाना चाह रहा था, मां भी इस दुनियां से चली गई ..!

इधर पांच बेटे और एक बेटी सब बड़े हो गए टीचर ने कहा पता है वो बेटी जो ज़िंदा रही कौन है.? "वो मैं हूं" और मैंने अभी तक शादी इसलिए नहीं की कि मेरे पिता इतने बूढ़े हो गए हैं कि अपने हाथ से खाना भी नहीं खा सकते और कोई दूसरा नहीं जो उनकी सेवा करें। 
बस मैं ही उनकी खिदमत किया करती हूं और वो पांच बेटे कभी कभी आकर पिता का हालचाल पूछ जाते हैं ।
पिता हमेशा शर्मिंदगी के साथ रो रो कर मुझ से कहा करते हैं, मेरी प्यारी बेटी जो कुछ मैंने बचपन में तेरे साथ किया उस पर मुझे माफ करना, 
मैंने कहीं बेटी की बाप से मुहब्बत के बारे मैं एक प्यारा सा किस्सा पढा था कि ...एक पिता बेटे के साथ फुटबॉल खेल रहा था। और बेटे की हौसला बढ़ाने के लिए जान बूझ कर हार रहा था। दूर बैठी बेटी बाप की हार बर्दाश्त ना कर सकी और बाप के साथ लिपट के रोते हुए बोली बाबा आप मेरे साथ खेलें, ताकि मैं आपकी जीत के लिए हार सकूँ ।

सच ही कहा जाता है कि बेटी तो बाप के लिए रहमत होती है..!!!

Tuesday, February 6, 2018

मेरे सैनेटरी पैड की दास्तान

सुबह-सुबह दिमाग में आया कि पीरियड्स को लेकर थोड़ी बात की जाए जिसे लेकर मैंने कोशिश भी की और जैसा कि आपने सोशल मीडिया पर देखा ही होगा, पैड के साथ मैंने अपनी एक फोटो भी डाली। उस वक्त मैं सोच रही थी कि एक पैड अगर अपनी बात रख पाता तो क्या कहता? फिर मेरे दिमाग मे आया कि पैड भी तो खून रोकने के काम आता है और पट्टियां भी, तो हम इन दोनों में भेदभाव क्यों कर रहे हैं?

एक लड़का हाथ में चोट लगने की वजह से रुई की पट्टी लगाए घूम रहा था, उस पर खून के कुछ धब्बे भी दिखाई दे रहे थे। उसके ही साथ चल रही एक लड़की काले-नीले कपड़े पहने बार-बार पीछे मुड़कर देख रही थी कि कहीं खून का कोई धब्बा न नज़र आ जाए। पट्टी गर्व से इतरा रही था और पैड घुटन से, शर्म से छुपा जा रहा था।

सामने मंदिर आया तो पैड रुक गया। पट्टी ने पूछा, “क्या हुआ?” पैड ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “सिर्फ कुछ ही खून अंदर जा सकते हैं!”


जहां पट्टी सबके सामने इतरा कर अपने घाव दिखा रही थी, वहीं पैड चुप था। खून से लथपथ और दर्द से लैस पैड, समाज में स्वीकार्य न होने के कारण मूक रहा। पैड को बुरा लगता था कि एक लड़की दुकान पर उसे खरीदने आती और उसे काली कोठरी जैसे प्लास्टिक में भर के भेजा जाता और वहीं पट्टी मुस्कुराती हुई स्वतंत्र झूमती निकल जाती।

पट्टी जब घर जाती तो लोग उसकी सेवा में लग जाते, उस दिन किसी और रोज़ से ज़्यादा खयाल रखा जाता, पर जाने क्यों पैड को ये आज़ादी नहीं थी। घर में पैड न किचन में जाता, ना ही पिताजी के बिस्तर पर बैठता। पट्टी को भरपूर खाने को मिलता और पैड को अचार और नमक छूने की आज़ादी न होती।

गांव में तो ये पैड रुई का भी नहीं होता है। पुराने फटे कपड़ों को तह करके पीरियड्स में काम में लाया जाता है। सबके पास व्हिस्पर अल्ट्रा खरीदने को पैसे थोडें न हैं। पट्टी 10 रु. की मिल जाती है और पैड 80 रु. का। पट्टी बड़ी ही फेमस है, उसे सब जानते हैं, उसे सबने देखा है। लेकिन पैड किसी खूफिया एजेंट की तरह है जिसे न किसी ने आते देखा और न जाते। 5 दिन उस लड़की ने खून बहाया और पैड ने उसे रोका, लेकिन उसके साथ चलते दोस्तों को कोई खबर नहीं, घर में भाई को पता नहीं।

पट्टी तो कभी-कभी ही काम आती है लेकिन पैड हर महीने 12 बार। आश्चर्यचकित होती हूं कि फिर भी पैड का ज़िक्र नहीं, किसी को उसकी फिक्र नहीं।


सरकार ने पैड को लक्ज़री आइटम में डाल दिया, पैड हंसा था खुद को देखकर। वो ज़रूरत है हर 11 से 45 साल की उम्र वाली महिला की। हंसता है पैड कि कैसा समाज है जिसको लड़की के स्कर्ट पर खून का धब्बा भी नहीं देखना है और उसको रोकने के लिए पैड की व्यवस्था भी नहीं करनी है। पैड खुद को महंगा और शर्मसार महसूस करता है लेकिन पट्टी को मतलब नहीं कि पैड क्या झेल रहा है। आधी पट्टियों ने तो पैड देखा भी नहीं है।

Posted by Shivangi Choubey  in HindiMenstruationSociety

   

Saturday, June 11, 2016

टॉपलेस पर हंगामा ? स्तन हमारे शरीर का एक अंग ही तो है

स्तन को सिर्फ पुरुषों की इच्छाओं से जोड़कर ही क्यों देखा जाता है. उनका सुडौल होना ही क्यों जरूरी है.

श्रीमई
मैं एक मोटी बच्ची थी इसलिए शायद मेरे स्तन मेरी उम्र की लड़कियों से ज्यादा तेजी से विकसित हुए. 11 साल की उम्र में मुझे साधारण कॉटन पेटीकोट से कॉनिकल आकार के ब्रा को अपनाना पड़ा. मेरी मां ने हमेशा इसे पहनने पर जोर दिया. यहां तक कि अभी भी घर पर वह यही करती हैं. वह मुझे कड़े स्वर में कहती थी, 'शेप खराब हो जाएगा.'

क्या शेप? ईमानदारी से कहूं तो मेरे स्तन हमेशा से एक जैसे ही दिखते हैं.

महिला के शरीर के एक हिस्से को बांधने के लिए -ब्रा- मुझे लगता है एक भ्रामक रूप से प्रचारित परिधान है- जिसके लिए अक्सर 'सेक्सी' कहा जाता है.

हमारे स्तन कभी हमारे नहीं रहे हैं, सच-हमेशा पवित्रता, पाप या शर्म का कारण. मेरे स्तनों को हमेशा मेरी मां की इजाजत की जरूरत रही, मेरे पिता और कजिन्स की मौजूदगी में हमेशा ब्रा पहनने की जरूरत रही, जिनके सामने मैं कभी तौलिए में नहीं आ सकती. मेरे स्तनों को पब्लिक ट्रांसपोर्ट में उन पुरुषों से सुरक्षा की जरूरत रहती है जो मुझे अपमानित करना चाहते हैं.  मेरे सभी प्रेमी, जोकि मुझे और मेरी बंगाली जाति के लिए हमेशा तारीफों के पुल बांधते थे, मेर स्तनों के प्रति दीवाने थे. मैं कल्पना करती थी कि मेरा बच्चा कैसा होगा, जब मेरा बच्चा हुआ, मेरे वक्षों से जुड़ा, मेरे स्तनों से दूध पिया, उन्हें ढीला बना दिया और उस पर काटने के निशान छोड़ दिए. क्या स्तनों के बारे में पुरुषों की कल्पना उनकी मां के साथ जुड़ाव से शुरू नहीं होती है?

सभी महिलाओं के स्तन सिर्फ पुरुषों की जरूरत और उनकी इच्छाओं के लिए होते हैं?

शरीर और आत्मा

हर लड़की के नारीत्व की दर्दभरी यात्रा की शुरुआत का प्रतीक, हमारे स्तनों को क्यों सिर्फ शारीरिक नजर से देखा जाता है और जो है?

क्यों हर कोई शरीर के इस एक हिस्से पर दावा करना चाहता है?

मुझे यह बात समझ में नहीं आती जब यहां तक कि एक महिला कहती है, 'तुम्हारे पास बहुत खूबसूरत स्तन हैं. 'या उत्साह से दूसरे के स्तनों को देखकर चिल्लाती हैं, 'वाह, देखो वे कितने सख्त हैं.' ठीक वैसे ही जैसे सिलिकॉन इम्प्लांट्स को हम सिर्फ पोर्न स्टार या एक्ट्रेस के काम की चीज समझते हैं.   क्यों फ्लैट छाती वाली महिलाओं को 'मैनचेस्टर' कहा जाता है? या उन्हें 'शादी के लायक' नहीं माना जाता है? ऐसे देश में जहां हर महिला पतली और गोरी दिखना चाहती है, हम बिना अच्छे स्तनों वाली महिला से पीछा छुड़ाना चाहते हैं.

अच्छी ब्रैंडिंगः

हाल ही में एक स्वीडिश कंपनी रिबेटल ने भारत में अनलिमिटेड कॉल करने की एक स्कीम लॉन्च की. इस स्कीम को प्रमोट करने के लिए उसने न्यूयॉर्क के टाइम्स स्कवॉयर के बीच में पूरे शरीर पर पेंट लगाए चार टॉपलेस महिलाओं को डांस करते हुए दिखाया.

चारों महिलाएं 'छम्मक छल्लो' पर थिरक रही थीं. कंपनी के इस कदम को सेक्सिस्ट करार दिया गया. कंपनी ने अपने बचाव में कहा कि उसकी यह मार्केटिंग रणनीति 'अनलिमिटेड कॉलिंग और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच लिंक' को दिखाती है और उसका यह स्टंट 'खुद को विद्रोही ब्रैंड' के रूप में दिखाना था.

टॉपलेस महिलाएं इतना बड़ा मुद्दा क्यों है? बॉलीवुड हीरोइनों को आइटम नंबर करते हुए कैमरे को उनके सीने पर जूम करने की दीवानगी क्यों है? क्यों हमारा राष्ट्रीय मीडिया 'OMG, दीपिका पादुकोण का क्लीवेज' जैसी चीजें दिखाता है और राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले फिल्ममेकर मधुर भंडारकर अपनी नई फिल्म कैलेंडर गर्ल्स के लिए महिलाओं की बिकनी वाले पोस्टर जारी करते हैं? क्यों हम अपने स्तनों को किसी प्राकृतिक चीज की तरह स्वीकर क्यों नहीं कर सकते?

अतीत में कभी विशेषज्ञ थे

नग्नता भारतीय संस्कृति के लिए शर्म के तौर पर एक नई अवधारणा है. अतीत में इसे कला और संस्कृति में उत्साह के साथ लिया जाता था.

वास्तव में यह कहा जाता है कि भारत में ब्लाउज के प्रचलन में आने से पहले महिलाएं ऊपरी कपड़े नहीं पहनती थीं और इसके लिए वे कभी अपने शरीर को लेकर शर्म भी नहीं करती थीं. कोणार्क और खजुराहो की प्राचीन मूर्तियों पर एक नजर डालिए और आप समझ जाएंगे कि मैं क्या कहना चाहती हूं.

18वीं और 19वीं शताब्दी में केरल में महिलाओं को उनके स्तनों को ढंक कर रखने की मनाही थी. ब्राह्मणों को छोड़कर हिंदू महिलाओं में से कोई भी अपने स्तन ढंकने के बारे में सोचती भी नहीं थीं - उनके लिए तो स्तनों को ढंकना अशालीनता की निशानी थी. नायर और ऊंची जाति की महिलाएं बस एक सफेद मुंडू से अपने स्तनों को ढंकती थीं.

19 वीं सदी तक त्रावणकोर, कोचीन और मालाबार में ब्राह्मणों के सामने किसी भी औरत को उसके शरीर के ऊपरी हिस्से को ढंकने की अनुमति नहीं थी. अय्या वैजुंदर के समर्थन के साथ कुछ समुदायों ने ऊपरी कपड़े पहनने के उनके अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी और इसके प्रतिरोध में उच्च वर्ग ने 1818 में उन लोगों पर हमला भी किया था.

1819 में त्रावणकोर की रानी ने घोषणा की. इसके अनुसार नादर महिलाओं को केरल की अन्य गैर-ब्राह्मण जाति की महिलाओं की तरह ऊपरी कपड़े पहनने का अधिकार नहीं था. हालांकि केरल की कुलीन नदान महिलाओं और उनके समकक्षों को अपनी छाती ढंकने का अधिकार था. नादर महिलाओं के खिलाफ राज्य भर में हिंसा शुरू हो गई, 1858 में यह खासकर नेय्यातिंकरा और नेय्यूर में अपने चरम पर पहुंच गई.

16 जुलाई 1859 को मद्रास के गवर्नर के दबाव में त्रावणकोर के राजा ने घोषणा किया, जिसके अनुसार नादर महिलाओं को ऊपरी कपड़े पहनने का अधिकार दिया गया, शर्त यह रखी कि उन्हें उच्च वर्ग की महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले कपड़ों की शैली की नकल नहीं करनी होगी.

आज हम एक और लड़ाई लड़ रहे हैं.

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आप सहमत हो।
लेखक
श्रीमई

ब्रा नहीं पहनी तो डांटा, अब विरोध में छिड़ा है आंदोलन

अमेरिका के मोन्टेना में हाईस्कूल में पढ़ने वाली एक छात्रा को इसलिए डांटा गया क्योंकि उसने कपड़ों के नीचे ब्रा नहीं पहनी थी. इसपर मामले पर छात्राओं का विरोध अब आंदोलन का रूप ले चुका है.
बात अगर स्कूल ड्रेस की हो, तो अक्सर लड़कियों की ड्रेस को लेकर विवाद होते रहते हैं. यहां तो कई स्कूलों ने स्कर्ट पर बैन लगाकर लड़कियों के लिए शलवार सूट अनिवार्य कर दिया है. जिन स्कूलों में स्कर्ट पहनी जाती हैं, वहां स्कर्ट की ऊंचाई को लेकर स्कूलों के अपने अलग नियम और कायदे हैं, जो कोई नियमों को नहीं मानता उन्हें अक्सर डांट भी खानी पड़ती है. लेकिन अमेरिका के मोन्टेना में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसमें ड्रेस कोड उल्लंघन करने के लिए हाई स्कील की एक छात्रा को डांट खानी पड़ी, लेकिन डांट के बाद इस मामले ने एक बहस को जन्म दिया, जिसने अब एक आंदोलन की शक्ल इख्तियार कर ली है.

ड्रेस कोड उल्लंघन, क्या सच में ?

हुआ कुछ यूं, कि मोन्टेना के हाईस्कूल में पढ़ने वाली एक छात्रा केटलिन जूविक(Kaitlyn Juvik), रोज की तरह स्कूल आई लेकिन उस दिन उसने कपड़ों के नीचे ब्रा नहीं पहनी थी. उसने कंधे तक ढलती हुई काले रंग की टी शर्ट पहनी थी जिसपर स्कूल प्रशासन ने उसे बुलाकर, ड्रेस कोड का उल्लंघन करने के नाम पर फटकार लगाई. उससे कहा गया कि ऐसा करके उसने बाकी लोगों को 'अनकंफर्टेबल'(असहज) महसूस करवाया है. उसे कपड़े कवर करने या फिर ब्रा पहनने के लिए कहा गया.

ब्रा नहीं पहनने पर केटलिन को फटकारा गया

इसपर केटलिन का कहना है कि स्कूल का उसके अंतर्वस्त्रों पर टिप्पणी करना गलत है. उसने कहा कि- ' मैंने जो टीशर्ट पहनी थी, न तो उसके आर पार देखा जा सकता था, और न ही वो अशिष्ट थी. ये जानने के लिए कि मैंने अंदर कुछ पहना है या नहीं, देखने वाले को बहुत ध्यान से देखना होगा. मैंने ऐसा कुछ नहीं पहना जिससे ड्रेस कोड का उल्लंघन हुआ हो.'

 ये रहे वो कपड़े जो उस वक्त केटलिन ने पहने थे. उन्होंने फेसबुक पर ये पोस्ट शेयर की, जिसे बाद में डिलीट कर दिया गया

स्कूल के प्रिंसिपल स्टीव थेनिस का कहना है कि 'मुद्दा ये नहीं है कि उसने ब्रा पहनी थी कि नहीं, बल्कि उसके कपड़ों से दूसरों को असहज महसूस हुआ.'

स्कूल के इस रवैये का विरोध करते हुए केटलिन और स्कूल की कई लड़कियां अगले दिन ब्रा पहनकर नहीं आईं. उनका कहना था कि अगर आपके कपड़ों से कुछ नजर नहीं आ रहा, आप ढंके हुए हैं, तो लड़कियों को ब्रा पहनने की क्या जरूरत है. केटलिन का कहना है कि 'ये मेरा शरीर है. और प्राकृतिक रूप से ये ऐसा ही है, और मुझे ये समझ नहीं आता कि इससे दूसरे कैसे असज हो सकते हैं.'

विरोध प्रदर्शन करती हुईं स्कूल की छात्राएं

ये विवाद अब एक आंदोलन का रूप ले चुका था, और इसी कड़ी में No Bra No Problem नाम से एक फेसबुक पेज भी बनाया गया, जिसपर सैकड़ों लोगों ने अपना समर्थन जताया. इतना ही नहीं स्कूल के लड़कों ने भी केटलीन का साथ दिया और इस आंदोलन के समर्थन में बहुत से लड़के टीशर्ट के ऊपर ब्रा पहनकर स्कूल आए.

 स्कूल के छात्र भी केटलिन से सहमत थे, इसीलिए उन्होंने भी इस तरह प्रदर्शन किया

ब्रा पहनने या नहीं पहनने पर बहस क्यों?

स्तन हमारे शरीर कभी अंग हैं और अगर इससे कोई दूसरा असहज होता है, तो वो उसकी दिमागी परेशानी है. महिलाओं को उनके शरीर के कारण ही सेक्सुअलाइज किया जाता है. महिलाओं का शरीर प्राकृतिक रूप से ही ऐसा है. लेकिन चाहे महिला सर से लेकर पांव तक ढकी ही क्यों न हो, फिर भी उसकी फिगर पर लोगों की निगाहें टिकी रहती हैं. इसलिए कपड़े कभी भी सामने वाले को असहज नहीं करते, वो सिर्फ उसकी सोच होती है. (हां कपडे न हों तो असहज होने की बात समझ भी आती है).

लेकिन इस मामले में तो लड़की ने पूरे कपड़े पहने थे फिर भी पुरुष उससे विचलित हो गए, असहज हो गए. वो इतने गौर से उस लड़की के सीने को निहार रहे थे कि उनको ये समझ भी आ गया कि उसने ब्रा पहनी थी या नहीं. तो इस मामले में केटलीन का आंदोलन स्वाभाविक रूप से सही नजर आता है, और सोशल मीडिया पर उन्हें जो प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं, उसने इस बात को वजन जरूर दिया है कि महिलाओं को वही कपड़े पहनने चाहिए जिसमें वो कंफर्टेबल रहें, और अगर ब्रा में वो कंफर्टेबल नहीं, तो बेशक ब्रालैस रहें, आखिर वो उनका अपना शरीर है.