स्त्री देह भी एक सामान्य देह है, जैसे पुरुष की| न जाने क्यों स्त्रियों की देह को कुछ अजूबा-सा मान लिया गया| जहां पुरुषों को अपनी जैविक संरचना पर गर्व की अनुभूति हुई, वहीं स्त्री को शर्म की|
पुरुष अपने खुद को स्त्री से उच्च मानने लगा| स्त्रियाँ बचपन से ही अपनी देह को छुपाने का उपक्रम करने लगीं, वहीं पुरुष बेहद धृष्टता से उसे उजागर करने का| स्त्री की शर्म और संकोच पर पुरुष ने अपने गर्व का शिकंजा कसा, उसकी शर्म को तार-तार करना सबसे बड़ा हथियार बना लिया| इसी के चलते स्त्री की अपनी देह उसके लिए पहली मुश्किल बनी| उसकी सारी समस्याएँ उसकी देह को लेकर शुरू हुई| उसके जन्म के साथ ही घरों में उदासी का आलम छाने लगा|
स्त्री को देह के इर्द-गिर्द समेत देना समाज की पहली साज़िश है| पहले उस पर शर्म के, हया के बंधन, फिर शारीरिक अक्षमता का बहाना करके उसकी सुरक्षा का ठेका अपने नाम करने की साजिश|
पिता, भाई, पति, पुत्र सब स्त्रियों के रक्षक बनें| रक्षक भी पुरुष और शिकारी भी पुरुष यानी एक पुरुष दूसरे पुरुष से बचाने के लिए आगे आया, वरना स्त्रियों से तो कोई खतरा था ही नहीं| वह खतरा बाद में पैदा हुआ जिसे पितृसत्ता ने ही पैदा किया,फिर एक पुरुष को जब दूसरे पुरुष से बदला लेना हुआ, आक्रोश व्यक्त करना हुआ तो उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनीं वो स्त्रियाँ जो उस पुरुष के अधीन थीं| यहां भी स्त्री देह ही निशाने पर थी|
स्त्री देह तो इस दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है| ऐसा लगता है कि यह न हो तो कोई दिक्कत ही न हो| सारे फरमान उसकी देह को लेकर जारी किए जाते हैं, सारे नियम उसकी देह के लिए बनते हैं, सारी नैतिकताएं, संस्कृतियाँ, सभ्यताएं वह अपनी देह के भीतर पाल रही है, बड़े आश्चर्य की बात यह है कि जिस स्त्री की देह को लेकर इतनी साजिशें चल रही हैं, उसी देह में रहने वाले दिमाग को एकदम नकार दिया गया| उसे पनपने ही नहीं दिया गया| उसका दिमाग चला तो उसे चाँद-तारों की शायरी में उलझाया गया| उसके होंठ, उसकी आँखें, उसकी चाल, उसका रंग, उसके बाल-इन चीजं पर इतना फोकस किया गया कि वह बस पावं में पाजेब और आँखों में काजल लगाने में ही मशगूल रही है।
लड़कियों का अच्छा या बुरा होना उनकी सुंदरता और शालीनता (जिसका एक मात्र अर्थ ख़ामोशी से सब कुछ श लेना होता है) पर ही निर्भर करता था और करता है| कोई नहीं कहता कि उसे समझदार बहू चाहिए, कहीं किसी शादी के विज्ञापन में यह नहीं लिखा होता है कि लड़की का गुणवान होना ज़रूरी है| हर जगह सुंदर, शिक्षित, शालीन लड़की ही चाहिए| शिक्षा के दायरे कुछ ऐसे रचे गए कि शिक्षित स्त्रियाँ भी असल में शिक्षित नहीं हो पाई| आज भी अधिकतर जो सोचती हैं, वह वे सोचना नहीं चाहतीं, वैसा उन्हें सोचने को कहा जाता है यानी हाइजैक्ड थिंकिंग|
मेरी लिखी बातों को हर कोई समझ नही सकता,क्योंकि मैं अहसास लिखती हूँ,और लोग अल्फ़ाज पढ़ते हैं..! अनुश्री__________________________________________A6
Thursday, January 4, 2018
स्त्री देह इस दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है।
Friday, December 22, 2017
"औरत होने का दर्द "
औरत होने का दर्द कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !
कभी माँ, कभी बीवी बनकर बलि की देवी बनती है
नौ महीने गर्भ के बीज को पल- पल खून से सींचती है
नव कोपल के फूटने के लम्बे इन्तजार को झेलती है
कौन आगे बढकर प्यार से माथे का पसीना पौंछता है ?
नवजीव के खिलने के असहनीय दर्द को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !
माँ बनकर अपने जिगर के टुकड़े को हर दिन बढ़ते देखती है
कभी प्यार से तो, कभी डांट से पुचकारती है
खुद भूखा रहकर भी हर एक का पेट भरती है
कभी रात का बचा भात तो ,कभी दिन की बची रोटी रात में खाती है
इस बलिदान को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !
कभी पति, कभी बच्चों की दूरी को कम करते पिस जाती है
बच्चें लायक हो तो पिता का सीना गर्व से फूलता है
परीक्षा में कम निकले तो हर कोई माता को कोसता है
हम सफ़र के माथे की हर शिकन को तुरंत भांप लेती है
इस ममता को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !
कभी बेटी, कभी बहन बनकर सब सह जाती है
कभी बाप , कभी भाई के गुस्से में भी मुस्कुराती है
मायके में बचपन के आँगन का हर कर्ज चुकाती है
अपने हर गम, हर दुःख में भी सबका गम भुलाती है
इस दुलार को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !
कभी प्रेमिका बनकर, कभी दोस्ती के नाम पर छली जाती है
खुद गुस्सा होकर भी अपने प्रेमी को हर पल मनाती है
प्रेमी के मन की हर बात बिन कहे समझ जाती है
अपना हर आंसू उससे छुपा लेती है
कभी उसकी याद में तो, कभी बेरुखी में तड़पती है
इस जलन को कौन समझता है ? ,
हर कोई बस परखता है !
कभी बहू बनकर दहेज़ के नाम पर ताने सह जाती है
बेटी पैदा करने पर गुनाहगार ठहराई जाती है
कभी प्रसव तो , कभी गर्भ -पात की पीड़ा झेल जाती है
अपने ही अरमानों की अर्थी अपने कांधो पर उठाती है
इस संवेदना को कौन समझता है ? ,
हर कोई बस परखता है !
नोट - औरतो का सम्मान करे जैसे खुद के घर की बहूत बेटियों का सम्मान करते है वैसे ही दूसरो के घर वालो की बहू बेटियों का सम्मान करे
Tuesday, November 21, 2017
महिलाओं का सम्पत्ति का अधिकार
●ब्रिटिश राज और उससे आजादी के बाद समय-समय पर कानून बनाए गए हैं, जो महिलाओं को निजी संपत्ति का अधिकार तो देते हैं, लेकिन समाज में पुरुष प्रधान सोच के कारण कानून पंगु बना रहा।
●महिलाओं को निजी संपत्ति में हिस्सा देने की बहस काफी पुरानी है। हमारे देश में स्वतंत्रता संग्राम के साथ ही यह बहस तेज हो गई थी। ब्रिटिश राज और उससे आजादी के बाद समय-समय पर कानून बनाए गए हैं, जो महिलाओं को निजी संपत्ति का अधिकार तो देते हैं, लेकिन समाज में पुरुष प्रधान सोच के कारण कानून पंगु बना रहा।
● वर्तमान समय में फैक्टरी, कार्यालय, खेत या घर- हर जगह महिलाएं समान रूप से श्रम कर रही हैं।
●इसके बावजूद सामाजिक तौर पर निजी संपत्ति के बंटवारे के समय उनकी अनदेखी की जाती है। इस बारे में कानून महज दिखावा साबित होते हैं।
●पूंजीवाद महिलाओं को समानता का हक तो देता है, लेकिन घर की चौहद्दी के अंदर। वह महिलाओं को श्रम के तौर पर बाजार और फैक्टरी तक लाता है, लेकिन उनके श्रम को सामाजिक श्रम का हिस्सा मानने से हिचकता है।
●इसीलिए पूरी दुनिया में मानव श्रम की गणना की जाती है तो महिलाओं की अनदेखी की जाती है। इनमें महिलाओं द्वारा घरेलू काम या बच्चों की परवरिश के लिए किए जाने वाले श्रम की गणना नहीं होती है।
●वर्तमान व्यवस्था भी किसी न किसी रूप में विभिन्न प्रचार माध्यमों से इस गैरबराबरी को बनाए रखना चाहती है।
●महिलाओं को जब संपत्ति में हिस्सा देने की बारी आई तो नीति-निर्माताओं ने महिला संपत्ति की उल्टी-सीधी व्याख्या करनी शुरू कर दी।
●कभी विवाहित महिला द्वारा बचाए गए पैसे-जेवर आदि को स्त्री की निजी संपत्ति के रूप में माना गया, कभी शादी के बाद पति की संपत्ति को महिला की निजी संपत्ति मान लिया गया। लेकिन वक्त बदलने के साथ ही महिलाएं समान अधिकार को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक होने लगी हैं, जिस कारण संपत्ति अधिकार कानून के व्यावहारिक पक्ष पर बहस तेज हुई है।
●प्राचीन काल से मध्यकाल तक की सांस्कृतिक अवस्थाओं में महिलाओं की स्थिति ऐसी बनी कि वे संपत्ति और दूसरे अधिकारों के मामले में लगातार हाशिये पर चली गर्इं। लेकिन आधुनिक भारत में महिला अधिकार आंदोलनों का भारतीय समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा।
● आजादी की लड़ाई के दौरान सभी प्रभावशाली नेताओं ने महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिए जाने की वकालत की। उस समय के नेताओं ने महसूस किया कि आर्थिक आजादी महिलाओं को संपत्ति में हक देने की लड़ाई से पूरी तरह से घुली-मिली है।
●सैद्धांतिक तौर पर प्रकृति भी महिलाओं और पुरुषों में कोई भेद नहीं करती है और न ही प्रारंभिक समाज में ऐसा था। लेकिन विभिन्न सामाजिक संरचना, भौगौलिक, राजनीतिक और आर्थिक कारणों से विश्व के अलग-अलग देशों में महिलाओं की सामाजिक स्थिति में काफी अंतर है।
● कहीं महिलाओं को ज्यादा अधिकार हैं, तो कहीं कम। आज भी जनजातीय समाजों में महिलाओं को बराबरी के अधिकार हैं जो उनको संपत्ति रखने का भी अधिकार देते हैं।
●जबकि हमारे देश में व्यावहारिक रूप से महिलाओं को पुरुषों से कम अधिकार मिले हैं। इसमें भी संपत्ति रखने के मामले में महिलाओं की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है।
●हालत यह है कि अभी तक महिलाओं और पुरुषों की संपत्ति के अधिकार को लेकर कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। अगर हम बंगाल, गुजरात, बिहार या उत्तर प्रदेश में महिलाओं की संख्या और संपत्ति में उनके हिस्से की जानकारी प्राप्त करना चाहें तो भूसे में सूई ढूंढ़ने जैसा होगा।
●अनेक संगठन महिलाओं के हक की आवाज तो उठाते हैं, लेकिन उनके आंदोलन और मुद्दे आपस में एक दूसरे से अलग-अलग हैं।
●संयुक्त राष्ट्र की शाखा यूएन-वूमेन ने ‘नेशनल फाउंडेशन आॅफ इंडिया’ और ‘गर्ल्स काउंट’ के साथ मिल कर सोशल मीडिया पर काफी जोर-शोर से यह मुद्दा उठाया है, जिसे समर्थन मिलना शुरू हो गया है।
●भारत जैसे देश में महिलाओं की सामाजिक हैसियत क्या रही है, यह किसी से छिपा नहीं है।
●जन्म लेने से लेकर मृत्यु तक महिलाओं को पुरुषों की दया पर जिंदा रहना पड़ता है। अतार्किक और पितृसत्तात्मक सोच के बोझ तले स्त्रियों की पूरी जिंदगी गुजर जाती है।
●यह तथ्य है कि संपत्ति सहित जमीन और मकान पर महिलाओं का मालिकाना हक होने से उनके साथ भेदभाव कम होते हैं।
●जिन देशों में महिलाएं आर्थिक रूप से ज्यादा सशक्त हैं, वहां भेदभाव में कमी आई है।
● हमारे देश में धर्म सुधार और महिला अधिकार आंदोलनों के कारण अंग्रेजों ने प्रॉपर्टी एक्ट 1937 तैयार किया, जिसमें हिंदू धर्म में विधवा महिलाओं को संपत्ति में अधिकार दिया गया।
●यह आधे-अधूरे ढंग से तैयार किया गया। इस कानून के अनुसार अगर पति ने अपनी कोई वसीयत नहीं तैयार की है तो पुत्र को विरासत में मिली संपत्ति की आधी हकदार विधवा भी होती थी।
●1933 में कर्नाटक सरकार ने हिंदू कानून में महिला को संपत्ति में अधिकार के अधिनियम को भी जोड़ा। हालांकि महिलाओं को संपत्ति के कुछ सीमित अधिकार ही दिए गए, लेकिन यह पहली बार कानूनी तौर पर महिलाओं को संपत्ति में अधिकार देने की लिखित व्याख्या करता है।
● इस कानून के तहत वह संपत्ति को बेच, वसीयत या दान नहीं कर सकती थी। लेकिन वह स्त्री धन के तौर पर जुटाई गई संपत्ति को बेच सकती थी। इसमें भी जेवर, कीमती परिधान, प्राप्त उपहार आदि शामिल थे।
●आजादी के बाद 1956 में हिंदू सेक्सेशन एक्ट की धारा-14 महिलाओं को संपत्ति में पूरा अधिकार देती है। चल और अचल संपत्ति पर भी।
●हिंदू उत्तराधिकार कानून 2005 में हुए बदलाव से अब बेटियों को भी संपत्ति में बेटों के बराबर संपत्ति का हकदार बना दिया गया है।
● इस नियम के तहत अब माता-पिता की संपत्ति की रजिस्ट्री, बेचना, पट्टे पर देना या ट्रांसफर करना बेटी के हस्ताक्षर के बिना संभव नहीं है।
●इस मामले में या तो बेटी संपत्ति में से अपना हिस्सा लेती है या फिर यह घोषित करती है कि वह अपना हिस्सा अपने भाई को देना चाहती है। तभी संपत्ति की रजिस्ट्री या खरीद-बिक्री संभव हो सकती है।
● बेटी चाहे अविवाहित हो या विवाहित दोनों को ही समान रूप से अपने पिता की जमीन-जायदाद का हिस्सा लेने का हक प्रदान किया गया है।
●चूंकि देश में महिलाओं के संपत्ति अधिकार को लेकर बहुत कम चर्चा हुई है, जिस कारण से शोध और सर्वे का कार्य भी नाममात्र का ही है।
●2013 में दिसंबर में इंटरनेशनल लैंड कोलिशन, रूरल डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट और यूएन वूमेन ने हिंदू सेक्सेशन सुधार अधिनियम 2005 को लागू करने के बाद की स्थिति पर अपनी रिपोर्ट पेश की।
● इसमें आंध्र प्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश जैसे कृषि आधारित राज्यों में ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन हस्तांतरण को लेकर अध्ययन किया गया।
●ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी जमीन संपत्ति का सबसे बड़ा माध्यम है।
गांवों में परिवार या व्यक्ति की हैसियत जमीन के आधार पर ही आंकी जाती है। रिपोर्ट बताती है कि पुरुष प्रधान समाज में कानून को लागू करने वाला हर वर्ग इससे अनजान है।
● महिलाएं खुद भी पुरुष प्रधान सोच से ग्रस्त हैं। वे जमीन अपने बेटों को तो देती हैं, लेकिन बेटियों को देने से हिचकती हैं। दरअसल, महिलाओं का मानना होेता है कि बेटी पराए घर चली जाएगी, ऐसे में संपत्ति बंट जाने से सामाजिक संबंध भी छिन्न-भिन्न हो जाएंगे।
●यहां तक कि प्रशासनिक और न्यायपालिका में भी हर स्तर पर महिला को संपत्ति का अधिकार देने के कानून या नियम के मामले में उदासीनता बरती जाती है। इस रिपोर्ट को भारत सरकार को सौंप दिया गया, ताकि वह महिला संपत्ति कानून को प्रभावी तरीके से लागू करने की कार्ययोजना बना सके।
★इसमें निष्कर्ष निकाला गया कि संपत्ति में अपना हक लेने के लिए महिलाओं को अपनी मानसिकता बदलनी होगी। साथ ही महिला अधिकार के सवालों को संपत्ति अधिकार के मुद्दे से जोड़ना होगा।
Thursday, November 16, 2017
मैं तुम्हें भ्रूण से इंसान बनाती हूँ !!
'सुंदर, घरेलू और सुशील' दूल्हा क्यों नहीं ढूंढते?

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क्या करोगी जॉब करके, किसी चीज़ की कमी है क्या?
मामा के घर गया था। बातों बातों में नौकरीपेशा लड़कियों का मुद्दा उठा। मामी ने कुछ शिकायती लहज़े में, कुछ तारीफ़ के लहजे में बताया कि मामा हमेशा कहते हैं -अगर लड़कियों को आगे जाकर करियर नहीं बनाना, नौकरी नहीं करनी तो टेक्निकल कोर्स में हाथ नहीं डालना चाहिए। वैसे भी अच्छे टेक्निकल इंस्टीट्यूट्स में सीट्स की मारा मारी होती है। ऐसे में ऐसी डिग्री ले के घर बैठना सिर्फ अपनी ही नहीं, उस एक ज़िन्दगी से भी खिलवाड़ है जो उस जगह को आपसे अधिक डिज़र्व करता था और उस का बेहतर इस्तेमाल कर पाता।
ज़्यादातर लड़कियां हायर एजुकेशन में करियर बनाने जाती हैं या जा रही हैं, इसमें मुझे शक है। आज भी लड़कियों को अपनी पसंद के कॉलेज चुनने का हक नहीं है। हज़ार बहाने बनाये जाते हैं। अकेले कैसे रहोगी, कहाँ रहोगी, अंजान शहर है, कितना अनसेफ है, सब लोग क्या कहेंगे, कुछ ऊपर नीचे हो गया तो। पढ़कर करना भी क्या है, नौकरी तो करोगी नहीं। इन सबसे लड़ झगड़ कर लड़की अगर पढ़ भी लेती है तो सुनाया जाता है – अब एक अच्छा सा लड़का खोज कर तुझे उसके हवाले करूँ और मोह माया से मुक्त हो जाऊं।
इसके बाद वही सब, बच्चे पैदा करना, घर परिवार, सास-ससुर, रिश्तेदार। करियर की बात पर पति सीधा कहते है – क्या करोगी जॉब कर के, कोई कमी है क्या? ये बात इतनी धौंस के साथ कही जाती है कि ज़्यादातर लड़कियां कह नहीं पाती कि हाँ, कमी है, अपनी काबिलियत को इस्तेमाल करने की। एमबीए, एमसीए, बीटेक करने के बाद दिन रात दूध गर्म करने और दाल में नमक बराबर रखने की फ्रस्ट्रेशन कम करने की ज़रूरत है। झाड़ू की सींक हेयर पिन न बन जाये इस डर को दूर करने की ज़रूरत है। कहना चाहती है कि मैं भी तुम्हारे जितनी पढ़ी लिखी हूँ, तुमसे ज़्यादा नहीं तो कम भी नहीं, लेकिन मैं घर के काम कर रही हूँ, और तुम धौंस से दुनिया चला रहे हो। लेकिन दब जाती है आवाज़। क्योंकि पापा-मम्मी ने कहा था, अब तो वही घर तेरा है।
आजकल लड़कियां टेक्निकल कोर्स में भेजी तो जा रही हैं, लेकिन ज़्यादातर इसलिए कि पढ़ी लिखी लड़की को कमाऊ लड़का मिलेगा और दहेज़ कम लगेगा। दहेज़ तय करते वक़्त बेहद सॉलिड तर्क दिया जाता है, अरे लड़की एमसीए है। भगवान न करे कभी बुरा वक़्त आये, लेकिन आड़े वक़्त में घर में मदद करेगी। बड़ा मज़ेदार लगता है जब बाप अपनी बेटी को खुद इस तरह के तर्क देकर सभ्य तरीके से बेचता है। अपने प्रोडक्ट की खूबियां गिना कर।
इससे भी ज़्यादा मज़ेदार लगता है जब ये लड़कियां बड़ी हो जाती हैं, दो चार किशोरवय बच्चों की माँ बन जाती है, प्रौढ़ हो जाती है, थकने लगती हैं। उस वक़्त इन्हें घर में खाली देख कर पति कहता है – तुम खुद को एंगेज क्यों नहीं रखती। इतनी पढ़ी लिखी हो, टैलेंटेड हो। कुछ करो, कोई नौकरी देखो। और पत्नी सोचती है – व्हॉट द एफ़ इज़ दिस, उम्र गुज़र गयी और जब आराम करने का मन होता है तब काम करूँ, वो भी सिर्फ इसलिए कि तुम कहते हो। तुमने कहा तो नहीं किया , अब तुम कहते हो तो कर लूं। हिपोक्रेट लिबरल्स! बस कहती नहीं है-पापा की बात याद आ जाती है।
Wednesday, November 1, 2017
खून का रंग लाल ही होता है...समझ तो आया!
माहवारी न हुई बीमारी हो गई. वह भी छूत की बीमारी. बचपन में सुना था टीबी छूत की बीमारी है. बड़े होते-होते यकीन हो गया कि नहीं ये छूने से नहीं होती और न ही टी.बी. के रोगी के साथ रहने से होती है. फिर एक और बीमारी आई एड्स, हाहाकार मच गया. लेकिन तब तक दिमाग खुद भी चौकन्ना रहने का आदी हो चुका था. सो जानकारी जुटाई, जानकारों से खूब सवाल पूछे और यकीन हो गया कि ये बीमारी हाथ मिलाने से नहीं होती.

अंदर तक सन्न कर देने वाली मैरिटल रेप्स की सच्ची कहानियां
इति शरण:
बात तब की है जब मैं एक सामुदायिक रेडियो “गुडगांव की आवाज़” में सेक्शुअल हेल्थ पर काम कर रही थी। इस दौरान सेक्शुअल हेल्थ से सम्बंधित कई विषयों पर काम करने का मौका मिला, जिसमें मैरिटल रेप (वैवाहिक बलात्कार) के गंभीर विषय से भी हमारा सामना हुआ। महिलाओं से बात करने पर पता चला कि बड़ी संख्या में महिलाएं इस तरह के बलात्कार का शिकार हो रही हैं, जिसके खिलाफ वे आवाज़ भी नहीं उठा पाती।
इस प्रोजेक्ट के सिलसिले में मेरी कई औरतों से बातचीत हुई। मगर एक दिन एक ऐसी महिला ने मुझे अपनी कहानी बताई, जिससे मैं अक्सर मिला करती थी, लेकिन कभी पता ही नहीं चला कि वह भी मैरिटल रेप की शिकार है। उसकी शादी 18 साल की उम्र में ही कर दी गई थी। शादी की पहली रात से ही वह अपने पति की ज़बरदस्ती सहने को मजबूर रही थी। उस महिला ने उस दिन विस्तार से मुझे अपनी कहानी बताई।
“मुझे नहीं पता था कि शादी के बाद क्या होता है। कच्ची उम्र में ही मेरी शादी तो तय कर दी गई, मगर शादी के बाद की चीज़ों के बारे में मुझे कुछ नहीं बताया गया। शादी की पहली रात मेरे पति जैसे मुझपर चढ़ ही गए थे, मेरे लिए सब बहुत डरावना था। मुझे दर्द भी हो रहा था और बहुत शर्म भी आ रही थी। कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि कोई मेरे शरीर के साथ ऐसा कुछ करेगा। मेरे पति तब तक नहीं रुके जब तक उन्हें नींद नहीं आ गई। सुबह होते ही मैंने अपनी माँ को फ़ोन लगाया और रात की बात बताते हुए रोने लगी तो मेरी माँ ने कहा कि पागल है क्या तू, वह तेरे पति हैं, इसे अपना पत्नीधर्म समझ कर निभा ले।”
उस औरत ने बताया कि धीरे-धीरे वह इसकी आदी हो गई, मासिक धर्म के दिनों में भी उसका पति उसे नहीं छोड़ता था। उसका पूरा बिस्तर खून से सन जाता था और कुछ दिन बाद वह गर्भवती हो गई। उसे मायके भेज दिया गया, वह खुश थी कि उसके साथ ऐसा कुछ नहीं हो रहा था। बच्चा होने के बाद उसका शरीर बहुत कमज़ोर हो गया। इस कारण डॉक्टर ने कुछ दिनों तक उन्हें संबंध बनाने के लिए मना किया हुआ था। मगर उसका पति मानने वालो में से नहीं था यहां तक कि उसे प्रोटेक्शन लेना भी मंजूर नहीं था। नतीजतन एक महीने बाद ही वह फिर से गर्भवती हो गई।
शरीर से कमज़ोर होने के कारण 2 महीने में ही उसका बच्चा गिर गया। अपनी कहानी बताने के बाद उस महिला ने कहा था “अपने पति से मैं भी प्यार करना चाहती थी, मगर कभी कर नहीं पाई।” इस तरह की कहानी हमारे समाज में हर दूसरे घर में मिल जाएंगी, जहां औरतें अपने पति द्वारा ही बलात्कार की शिकार हो रही।
वैसे इसके लिए ज़िम्मेदार अकेले उस एक पुरुष को नहीं ठहराया जा सकता है, बल्कि इसका ज़िम्मेदार हमारा वह समाज है, जहां सेक्स को पुरुषों की मर्दानगी से जोड़कर देखा जाता है। मुझे याद हैं एक औरत ने अपनी कहानी बताते हुए कहा था-
“मैडम मेरे पति बहुत अच्छे हैं। कभी भी मेरी इजाज़त के बिना संबंध नहीं बनाते। यहां तक कि पहली रात भी मेरे मना करने के बाद वह कुछ नहीं बोले। मगर उन्होंने मुझे कहा था कि किसी और को मत बताना कि हमारे बीच कुछ भी नहीं हुआ, वरना लोग मेरी मर्दानगी पर ताना देंगे। इस घटना को हम एक ऐसे उदाहरण के रूप में देख सकते हैं, जब मर्दानगी के नाम पर एक पुरुष को जबरन संबंध बनाने के लिए ज़ोर दिया जाता है।”
इसके परिणामस्वरुप स्त्रियों के मन में यौन संबंध के प्रति नफरत घर कर लेती है। प्यार का यह अनमोल रूप हिंसा में तब्दील हो जाता है। जबकि यौन संबंध पुरुष और स्त्री दोनों की इच्छा और ज़रूरत है। पुरुषों की शारीरिक बनावट ऐसी होती है कि संबंध बनाने से उनकी थकान दूर होती है, जबकि औरतों को इसमें कुछ हद तक थकान महसूस होती है। वैसे भी हमारे समाज में सामान्यतः घर की सारी ज़िम्मेदारी औरतों के सर पर ही थोप दी जाती है, दिन भर के काम से थकने के बाद हर दिन उसका संबंध बनाने का मन नहीं होता।
करीब 50 साल की एक महिला ने अपने पति के बार में बताते हुए कहा था, “वो आज मुझे अगर अपने पास बैठने के लिए बुलाते भी हैं तो उनके पास जाकर बैठने का मन नहीं करता। मन भी कैसे करे, शादी होते ही घर की सारी ज़िम्मेदारी मेरे सर पर थोप दी गई। दिन भर काम करके शरीर बिल्कुल जवाब दे देता था। उम्र भी बहुत कम थी मेरी, मगर काम के बाद जब आराम करने का मन होता तो पति घर आते ही बिस्तर में चलने के लिए बोलते। अगर मना करो तो फिर घर में बवाल कि मेरी इससे थकान दूर होती है और वैसे भी तू तो दिन भर घर में ही रहती है।“अब किस बात की पत्नी जो पति का थकान भी दूर न करे। उस औरत का कहना था कि संबंध बनाना मेरे लिए कोई प्यार नहीं रहा बल्कि सज़ा थी मेरे लिए। उनके लिए तो मैं बस एक ज़रूरत पूरी करने वाली मशीन थी। उसके घर का सारा काम करने वाली और दूसरा संबंध बनाकर उसकी थकान दूर करने वाली औरत।
इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत हम लोग एक रेडियो नाटक भी बनाया करते थे, जिसमें लाइव डॉक्टर के जुड़ने का एक सेशन हुआ करता था। डॉक्टर उस सेशन में अक्सर लोगों को यह सलाह दिया करते थे कि आप पत्नी के पास सिर्फ संबंध बनाने मत जाया करो, बल्कि अपने प्यार का इज़हार दूसरी तरह से भी करने की कोशिश करो। देखना आपकी पत्नी आपसे कितनी खुश रहा करेगी। डॉक्टर से बात करने के लिए हमारे स्टेशन में काफी कॉल आया करते थे। कई पुरुषों का कहना था कि हमें बार-बार अपनी पत्नी के साथ संबंध बनाने का मन होता है। कुछ पुरुषों ने बताया कि जब वो ऑफिस में होते हैं तब भी मन होता है कि जल्दी से घर जाकर पत्नी के साथ यौन संबंध बनाएं। ऐसा नहीं कर पाने पर उन्हें बहुत बेचैनी होती है।
डॉक्टरों का कहना हैं कि यह एक तरह की मानसिक स्थिति भी है, किसी चीज़ की लत लग जाना या उसके बारे में दिन रात सोचने पर हर बार आपका दिमाग उसी ओर जाता है। खासकर युवाओं के साथ ऐसा कई बार होता है। डॉक्टरों का कहना है कि पहले तो उन पुरुषों को अपना ध्यान कहीं और लगाने की कोशिश करनी चाहिये। दूसरा कई बार पुरुषों के उत्तेजित हो जाने पर उनका वीर्य भी निकल आता है, जिसके बाद उन्हें सेक्स करने की ज़रूरत महसूस होती है। अगर उस वक़्त वह पुरुष अपने साथी के साथ नहीं हैं या उसकी साथी की रज़ामंदी नहीं हैं तो वह हस्तमैथुन करके भी अपनी उत्तेजना शांत कर सकता है।
हांलाकि हमारे समाज में हस्तमैथुन को गलत नज़रिये से देखा जाता है। जबकि इसमें कोई बुराई नहीं है। यह एक सामान्य सी बात है। डॉक्टर भी इसे गलत नहीं मानते।
कई लोगों का यह भी मानना होता है कि हस्तमैथुन करने से कमज़ोरी या अन्य कोई बीमारी होती है, मगर यह सब गलत धारणाएं हैं। यह चिंता का विषय तब बनता है जब रोज़मर्रा के काम में रूकावट बनने लगे या तनावमुक्त होने का यही एकमात्र साधन बन जाए।
जबरन संबंध बनाने का खामियाज़ा कई बार खुद पुरुषों को भी सहना पड़ता है। पुरुषों के ज़बरदस्ती करने पर कई बार औरतें संबंध बनाने के नाम से ही नफरत करने लगती है। वे घर के कामों में खुद को इतना व्यस्त कर लेती हैं कि पति की तरफ कभी ध्यान भी नहीं जाता। परिणामस्वरूप जल्द ही दोनों के बीच यौन संबंध बनना बंद हो जाता है और पुरुष चाहकर भी इससे वंचित रह जाते हैं। इसलिए इस प्यार को बरक़रार रखने के लिए यौन संबंध को हिंसा नहीं बल्कि प्यार का रूप देना ज़रूरी है।

