Friday, February 9, 2018

आज भी कई महिलाएं साड़ी को जांघों में दबाकर रोकती हैं पीरियड्स का खून

सैनेटरी नैपकिन पर टैक्स का लगातार विरोध देखने को मिल रहा है। कुछ समय पहले सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर ‘लहू का लगान’ नाम से एक कैंपन भी चला। कारण साफ है, जहां हमारी सरकार को सैनेटरी नैपकीन की सस्ती उपलब्धता के लिए योजना बनाने की ज़रूरत है, वहां ठीक इसके उलट हमारी सरकार आम लोगों को उसकी पहुंच से दूर करने की साजिश रचती हुई दिख रही।

बहरहाल, आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं पीरिड्स के दौरान कपड़े का इस्तेमाल करती हैं। इसके दो कारण है, पहला सैनेटरी नैपकिन खरीदने की असमर्थता, दूसरा जानकारी की कमी।

बिहार सरकार के पूर्व प्रोजेक्ट “महिला सामख्या” की राज्य कार्यक्रम निदेशक रह चुकी कीर्ति का कहना है कि बिहार के कई ग्रामीण इलाकों में जब किशोरी लड़कियों और महिलाओं को सैनेटरी नैपकीन दिखाया गया तो उनका जवाब था कि यह तो डस्टर है। उन्होंने उसके पहले कभी सैनेटरी नैपकीन देखा तक नहीं था। कीर्ति का कहना है कि महिलाओं में पीरियड्स को लेकर जागरूकता की भारी कमी है, जिसका खामियाज़ा उन्हें इंफेक्शन के रूप में सहना पड़ता है।

लेकिन, इससे भी ज़्यादा चौंकाने वाली बात तो ये है कि कई इलाकों में महिलाएं पीरियड्स के दौरान कपड़े तक का इस्तेमाल नहीं करती। कीर्ति बताती हैं कि शुरुआत में हमने देखा कि औरतें बिलकुल भी जागरूक नहीं है। कई जगहों पर तो कपड़े तक का इस्तेमाल नहीं किया जाता। माहवारी के दौरान महिलाएं घर से निकलती तक नहीं, पहने हुए कपड़े में जब खून लग जाता तो उसे धो देती हैं और वापस से वही कपड़ा पहन लेती हैं। कुछ जगहों में महिलाएं साड़ी के प्लेट को दोनों जांघों के बीच में दबा लेती हैं।

सैनेटरी नैपकिन की जानकारी की कमी और लोगों तक उसकी पहुंच नहीं होने की वजह से कई ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में लड़कियों की हाजिरी में भी कमी देखी जाती है। पीरियड्स में लड़कियां स्कूल ही जाना छोड़ देती हैं।

आज कई निजी संस्थाएं इस ओर जागरूकता के लिए काम कर रही हैं। यहां तक की कुछ सरकार भी इस दिशा में काम करती हुई दिख रही। बिहार सरकार की ही बात करें तो महिलाओं के लिए चलाए गए पूर्व प्रोजेक्ट “महिला सामख्या” के तहत महिलाओं को सैनेटरी नैपकिन बनाने की ट्रेनिंग दी गई। इससे महिलाओं को दो फायदा हुआ। पहला महिलाओं को रोज़़गार मिला साथ ही महिलाएं कपड़े की जगह सैनेटरी नैपकिन इस्तेमाल करने लगीं।

छत्तीसगढ़ में एक सुचिता योजना के तहत इन दिनों किशोरी लड़कियों को वेंडिंग मशीन से सैनेटरी नैपकिन उपलब्ध करवाया जा रहा। मशीन में पैसे डालते ही एक नैपकिन बाहर आ जाता है। यहां इस्तेमाल किए गए नैपकिन को बर्न करने की भी सुविधा है। इस मशीन के लगने से वहां के स्कूलों में लड़कियों के अटेंडेंस में भी वृद्धि हुई है।

महावारी के दौरान साफ सफाई पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी होता है। डॉक्टर्स की मानें तो हमें हर 6 से 7 घंटे में पैड या कपड़े बदलने चाहिए, वरना इंफेक्शन का खतरा बना रहता है। महिला हो या पुरुष उनके प्राइवेट पार्ट्स की सफाई बहुत ज़रूरी है। महिलाओं में प्राइवेट पार्ट्स में इन्फेक्शन से कई बीमारियों का खतरा बना रहता है। बार्थोलिन सिस्ट, यूरिन इन्फेक्शन जैसी कई भयावह बीमारियां झेलनी पड़ सकती हैं। बात जब पीरियड्स के दिनों की हो तो इन्फेक्शन का खतरा और भी बढ़ जाता है।

ग्रामीण ही नहीं बल्कि शहरी इलाकों में भी देखा जाता है कि महिलाएं एक ही कपड़ो का कई बार इस्तेमाल करती हैं। वो यूज कपड़ो को धोकर वापस से इस्तेमाल करती हैं। सबसे ज़्यादा चिंता की बात तो यह है कि उन कपड़ो को सही से सुखाया नहीं जाता।

जाहिर सी बात है, जिस समाज में महिलाओं के अंडरगार्मेंट्स को खुले में सुखाने की इजाजत ना हो वहां पीरियड्स के कपड़ो को खुले में सुखाना तो एक बड़ा अपराध ही माना जाएगा। धूप ना लगने पर कपड़े के किटाणु उसमें ही रह जाते हैं। यहाँ तक कि उन कपड़ों को धोने तक के लिए भी प्राइवेसी नहीं मिलती। कई बार तो महिलाएं गीले कपड़ो का ही इस्तेमाल कर लेती हैं।

सेक्शुअल हेल्थ पर काम करते समय गुड़गांव के मुल्लाहेड़ा गांव की कुछ औरतों से बात करने पर पता चला कि उनके पास पीरियड्स के कपड़े धूप में सुखाने का कोई विकल्प ही नहीं है। उन औरतों का कहना था कि हम चाह कर भी पीरियड्स के कपड़ो को धूप में सुखा नहीं सकते और पैड खरीदने के लिए हमारे पास पैसे नहीं है।

किसी आपदा के समय शायद ही किसी का ध्यान इस ओर जाता होगा कि जो महिलाएं पीरियड्स में हैं उन्हें कपड़े या नैपकिन कैसे मिल रहे होंगे। बीबीसी की पत्रकार सीटू तिवारी बताती हैं कि एक वर्कशाप में जब मुझसे यह पूछा गया कि बाढ़ की स्थिति में वह क्या कवर करेंगी तो उनका जवाब था कि मैं उस वक्त पीरियड हुई महिलाओं की स्टोरी कवर करूंगी। उन महिलाओं को पैड या कपड़ा मिल रहा है या नहीं, अगर कपड़ा इस्तेमाल कर रही तो उसे सुखाने का कैसा इंतज़ाम है, वे अपनी साफ-सफाई का कितना ख्याल रख पा रही है।

पीरियड्स पर बात करना और इस दिशा में जागरूकता किस कदर ज़रूरी है इस बात का अंदाज़ा शायद इन बातों से लगाया जा सकता है। सरकार अगर इस दिशा में कुछ योजनाएं लाए तो बड़े स्तर पर महिलाओं को इंफेक्शन से बचाया जा सकता है।

Posted by Iti Sharan in #IAmNotDown

‘सर्वाइवर लिखें विक्टिम नहीं’, ऐसे ही 8 नियम जो यौन हिंसा पर लिखते समय याद रखने चाहिए

हममें से जो भी इसे पढ़ रहे हैं, वो एक चीज़ तो मानेंगे कि अब विचार करने का वक्त आ गया है कि यौन हिंसा पर कैसे बात की जानी चाहिए।

एक राइटर के तौर पर यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि यौन हिंसा की घटनाओं पर हम समाज का ध्यान खीचे। लेकिन ऐसा करते हुए हमें अक्सर इसका ध्यान नहीं रहता कि हमारे लिखने का तरीका भी कई बार परेशानियों को घटाने के बजाए और बढ़ा देता है।

टेक्सस असोसिएशन अगेन्स्ट सेक्शुअल असॉल्ट (TAASA) के लिए तैयार किए गए अपने एक प्रेज़ेंटेशन में टोनिया कनिंघम और हाले कोचरन ने लिखा है “भाषा उत्पीड़न का सबसे बड़ा पोषक है।” मतलब यह कि किसी घटना पर किस तरह से लिखा और पढ़ा जा रहा है उससे भी प्रभावित वर्ग का उत्पीड़न होता है। इसी समस्या को सुलझाने के लिए हमने उन चीज़ों की एक लिस्ट बनाई है जिन्हें इस मुद्दे पर लिखते वक्त ध्यान में रखा जाना चाहिए।

1. पीड़ित नहीं, सर्वाइवर।

किसी इंसान के साथ पीड़ित शब्द जोड़कर हम उसकी पूरी पहचान को एक घटना तक सीमित कर देते हैं। ऐसा करके हम उन्हें हिम्मत देने के बजाए असहाय बना रहे होते हैं। और इन सबका नतीजा होता है एक सदमा, मानसिक स्वास्थ्य पर असर, आत्मविश्वास में कमी और कानून व्यवस्था से भरोसा उठना। तो अागे से पीड़ित शब्द को सर्वाइवर से बदल दें।

2. हमेशा एक्टिव वॉय्स का इस्तेमाल करें।

“उस लड़की पर हमला किया गया।”

अमेरिकी विचारक जैकसन काट्ज़ ने इसकी व्याख्या की है कि उपर दिए गए उदाहरण की तरह पैसिव वॉय्स में लिखते हुए हमेशा सिर्फ एक इंसान की पहचान ही ज़ाहिर की जाती है, जिसे महज़ बेचारे और पीड़ित की तरह पेश किया जाता है और कहीं से भी हमलावर या किसी घटना को अंजाम देने वालों का कोई ज़िक्र नहीं होता। इससे बचने के लिए ऐसे वाक्यों का प्रयोग किया जा सकता है जिसमें हमलावर का भी ज़िक्र हो। “जैसे उस लड़की पर उस लड़के ने हमला किया।”

इसी तरह TAASA के प्रेज़ेंटेशन में यह बात कही गई है कि ‘उस लड़के ने जबरन उस लड़की के चेहरे को छुआ’ लिखना ‘उस लड़के ने उस लड़की को किस किया’ लिखने से काफी बेहतर और प्रभाव डालने वाला है। इस तरह से लिखना हमलावर के हिंसक चरित्र को भी दर्शाता है।

पैसिव वॉय्स का इस्तेमाल करने से ऐसा लगता है कि अपराध में सर्वाइवर ने भी साथ दिया है, मतलब ताली एक हाथ से नहीं बजती वाली थ्योरी। लेकिन जैसा कि हम सभी जानते हैं कि यौन हिंसा वाले अपराधों में ऐसा बिल्कुल नहीं होता।

3. ‘ये तो होना ही था’

आपकी रिपोर्ट में कहीं से भी ऐसा नहीं लिखा होना चाहिए कि सर्वाइवर के साथ ऐसा होना तो तय ही था या उसने जानबूझकर मुसीबत मोल ली। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वक्त क्या था, सर्वाइवर ने कैसे कपड़े पहने थे, क्या खाया या पीया गया था या सर्वाइवर की सेक्शुअल हिस्ट्री क्या है। भारत में 90%  ऐसे अपराध को सर्वाइवर के जान पहचान वाले ही अंजाम देते हैं, लेकिन ध्यान रखिए कि उनके रिश्ते की घनिष्ठता से कोई फर्क नहीं पड़ता। जो बात मायने रखती है वो यह है कि वो घटना सर्वाइवर की सहमती से हुई या नहीं।

4. सर्वाइवर की पहचान की सुरक्षा

कभी भी सर्वाइवर के नाम, पता या वर्तमान पते का ज़िक्र ना करें। Do not reveal the survivor’s name, address, or current whereabouts. सुज़ेट जॉर्डन ने खुलकर अपने अनुभव साझा किए थे, लेकिन इसका चुनाव उनके हाथ में है, हमारे या आपके नहीं। आपकी रिपोर्ट में जिन लोगों के बारे में लिखा जा रहा है उनकी सुरक्षा और निजता का पूरा सम्मान होना चाहिए।

5. ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’

दिसंबर 2012 दिल्ली गैंगरेप मामले को बहुत लोगों ने ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मानते हुए मौत की सज़ा को जायज़ ठहराया। ध्यान रहे, यौन हिंसा की किसी भी घटना में इस तरह की हायरैरकी बनाने से बचें। याद रहे कि सभी तरह की यौन हिंसा की घटनाएं एक समान निंदनीय है और सभी मामलो में तुरंत न्याय होना चाहिए।

6. लोगों के बयान लिखते हुए सावधानी बरतें

घटना का निष्पक्ष नज़रिया बताने के लिए चश्मदीदों, परिवारजनों, पुलिस वालों और अन्य लोगों के बयानों के ज़रिए स्टोरी में बहुत सारे एंगल को जगह देना अच्छी बात है, लेकिन TAASA के प्रेंज़ेंटेशन के हिसाब से ये बहुत संभलकर और  शिष्टाचार से करना चाहिए।

“वो हमेशा लड़के लेकर आती थी।” ”उसने बहुत छोटे और भड़काऊ कपड़े पहने थे।” ” वो अक्सर शराब पीती थी।” “वो अपराधी के साथ रिलेशनशिप में थी।” ऐसे बयान या ऐसी बातें चरित्र हनन और विक्टिम ब्लेमिंग के अलावा और कुछ नहीं है। हमें अक्सर रिपोर्टिंग के दौरान ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं। फरवरी 2017 में एक नागालैंड की महिला के ऊपर रिपोर्ट करते हुए टाइम्स ऑफ इंडिया ने बहुत बड़ी चूक की थी।

7. रिपोर्ट लिखते हुए जेंडर का रखे खयाल

यौन हिंसा किसे कहते हैं? इस सवाल का जवाब ढूंढने में कानून और मीडिया का रोल एक दूसरे के पूरक का ही रहा है।उदाहरण के तौर पर IPC की धारा 375 व्याख्या करती है कि एक पुरुष को किन-किन आधारों पर बलात्कार का दोषी माना जा सकता है। और 6 अलग अलग आधार दिए गए हैं और हर जगह लिखा गया है कि पुरुष कब-कब बलात्कारी कहलाता है। यौन हिंसा पर जेंडर न्यूट्रल कानूनोंके अभाव में मीडिया भी सिर्फ और सिर्फ इसी आइडिया के साथ काम करता है कि पुरुष दोषी हैं और महिलाएं पीड़ित। हो सकता है कि यह अधिकतर मामलों में सही हो लेकिन सभी मामलों में सही हो ऐसा नहीं है। स्त्री और बाल कल्याण मंत्रालय की 2007 की एक रिपोर्ट के अनुसार52.94% (प्रयास और सेव द चिल्ड्रेन संस्था के द्वारा किया गया सर्वे) नाबालिग पुरुषों का यौन हिंसा का निजी अनुभव रहा है।

वक्त आ चुका है कि अब इस सोच को तोड़ा जाए और लिखते हुए ट्रांस, गे पुरुष या खुद को पुरुष की तरह पहचानने वाले लोगों को बराबर का महत्व दिया जाए। शायद यही एक बड़ी वजह है कि ट्रांस लोगों के साथ होने वाली हिंसा या समान लिंग में होने वाली हिंसा की घटनाएं इतनी कम रिपोर्ट की जाती हैं।

8. ‘पुरुषों का भी होता है बलात्कार’

पुरुषों के साथ होने वाली हिंसा पर रिपोर्ट करें। लेकिन ‘भी होता’ है लिखना बंद करिए। अक्सर ऐसे मुहावरे का इस्तेमाल महिलाओं के दमन को गलत बताने के लिए किया जाता है। ये कहना कि “पुरुषों के साथ भी इतना ही बुरा होता है” पूरी तरह से पितृसत्ता और पुरुषों को मिलने वाली सहूलियतों को नज़रअंदाज़ करने जैसा है।

अगली बारी जब आप लिखने बैठें तो इन 8 प्वाइंट्स को याद रखें। और ऐसा करने से आपकी रिपोर्ट संवेदनशील और भेदभाव रहित बनेगी। तो आज से खयाल रखें कि हमारे लेख बस पुराने स्टिरियोटाइप्स को बढ़ावा देने या यौन हिंसा के सर्वाइवर्स को कमज़ोर करने के लिए ना हो।

Tuesday, February 6, 2018

मेरे सैनेटरी पैड की दास्तान

सुबह-सुबह दिमाग में आया कि पीरियड्स को लेकर थोड़ी बात की जाए जिसे लेकर मैंने कोशिश भी की और जैसा कि आपने सोशल मीडिया पर देखा ही होगा, पैड के साथ मैंने अपनी एक फोटो भी डाली। उस वक्त मैं सोच रही थी कि एक पैड अगर अपनी बात रख पाता तो क्या कहता? फिर मेरे दिमाग मे आया कि पैड भी तो खून रोकने के काम आता है और पट्टियां भी, तो हम इन दोनों में भेदभाव क्यों कर रहे हैं?

एक लड़का हाथ में चोट लगने की वजह से रुई की पट्टी लगाए घूम रहा था, उस पर खून के कुछ धब्बे भी दिखाई दे रहे थे। उसके ही साथ चल रही एक लड़की काले-नीले कपड़े पहने बार-बार पीछे मुड़कर देख रही थी कि कहीं खून का कोई धब्बा न नज़र आ जाए। पट्टी गर्व से इतरा रही था और पैड घुटन से, शर्म से छुपा जा रहा था।

सामने मंदिर आया तो पैड रुक गया। पट्टी ने पूछा, “क्या हुआ?” पैड ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “सिर्फ कुछ ही खून अंदर जा सकते हैं!”


जहां पट्टी सबके सामने इतरा कर अपने घाव दिखा रही थी, वहीं पैड चुप था। खून से लथपथ और दर्द से लैस पैड, समाज में स्वीकार्य न होने के कारण मूक रहा। पैड को बुरा लगता था कि एक लड़की दुकान पर उसे खरीदने आती और उसे काली कोठरी जैसे प्लास्टिक में भर के भेजा जाता और वहीं पट्टी मुस्कुराती हुई स्वतंत्र झूमती निकल जाती।

पट्टी जब घर जाती तो लोग उसकी सेवा में लग जाते, उस दिन किसी और रोज़ से ज़्यादा खयाल रखा जाता, पर जाने क्यों पैड को ये आज़ादी नहीं थी। घर में पैड न किचन में जाता, ना ही पिताजी के बिस्तर पर बैठता। पट्टी को भरपूर खाने को मिलता और पैड को अचार और नमक छूने की आज़ादी न होती।

गांव में तो ये पैड रुई का भी नहीं होता है। पुराने फटे कपड़ों को तह करके पीरियड्स में काम में लाया जाता है। सबके पास व्हिस्पर अल्ट्रा खरीदने को पैसे थोडें न हैं। पट्टी 10 रु. की मिल जाती है और पैड 80 रु. का। पट्टी बड़ी ही फेमस है, उसे सब जानते हैं, उसे सबने देखा है। लेकिन पैड किसी खूफिया एजेंट की तरह है जिसे न किसी ने आते देखा और न जाते। 5 दिन उस लड़की ने खून बहाया और पैड ने उसे रोका, लेकिन उसके साथ चलते दोस्तों को कोई खबर नहीं, घर में भाई को पता नहीं।

पट्टी तो कभी-कभी ही काम आती है लेकिन पैड हर महीने 12 बार। आश्चर्यचकित होती हूं कि फिर भी पैड का ज़िक्र नहीं, किसी को उसकी फिक्र नहीं।


सरकार ने पैड को लक्ज़री आइटम में डाल दिया, पैड हंसा था खुद को देखकर। वो ज़रूरत है हर 11 से 45 साल की उम्र वाली महिला की। हंसता है पैड कि कैसा समाज है जिसको लड़की के स्कर्ट पर खून का धब्बा भी नहीं देखना है और उसको रोकने के लिए पैड की व्यवस्था भी नहीं करनी है। पैड खुद को महंगा और शर्मसार महसूस करता है लेकिन पट्टी को मतलब नहीं कि पैड क्या झेल रहा है। आधी पट्टियों ने तो पैड देखा भी नहीं है।

Posted by Shivangi Choubey  in HindiMenstruationSociety

   

Thursday, January 4, 2018

स्त्री देह इस दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है।

स्त्री देह भी एक सामान्य देह है, जैसे पुरुष की| न जाने क्यों स्त्रियों की देह को कुछ अजूबा-सा मान लिया गया| जहां पुरुषों को अपनी जैविक संरचना पर गर्व की अनुभूति हुई, वहीं स्त्री को शर्म की|
पुरुष अपने खुद को स्त्री से उच्च मानने लगा| स्त्रियाँ बचपन से ही अपनी देह को छुपाने का उपक्रम करने लगीं, वहीं पुरुष बेहद धृष्टता से उसे उजागर करने का| स्त्री की शर्म और संकोच पर पुरुष ने अपने गर्व का शिकंजा कसा, उसकी शर्म को तार-तार करना सबसे बड़ा हथियार बना लिया| इसी के चलते स्त्री की अपनी देह उसके लिए पहली मुश्किल बनी| उसकी सारी समस्याएँ उसकी देह को लेकर शुरू हुई| उसके जन्म के साथ ही घरों में उदासी का आलम छाने लगा|
स्त्री को देह के इर्द-गिर्द समेत देना समाज की पहली साज़िश है| पहले उस पर शर्म के, हया के बंधन, फिर शारीरिक अक्षमता का बहाना करके उसकी सुरक्षा का ठेका अपने नाम करने की साजिश|
पिता, भाई, पति, पुत्र सब स्त्रियों के रक्षक बनें| रक्षक भी पुरुष और शिकारी भी पुरुष यानी एक पुरुष दूसरे पुरुष से बचाने के लिए आगे आया, वरना स्त्रियों से तो कोई खतरा था ही नहीं| वह खतरा बाद में पैदा हुआ जिसे पितृसत्ता ने ही पैदा किया,फिर एक पुरुष को जब दूसरे पुरुष से बदला लेना हुआ, आक्रोश व्यक्त करना हुआ तो उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनीं वो स्त्रियाँ जो उस पुरुष के अधीन थीं| यहां भी स्त्री देह ही निशाने पर थी|
स्त्री देह तो इस दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है| ऐसा लगता है कि यह न हो तो कोई दिक्कत ही न हो| सारे फरमान उसकी देह को लेकर जारी किए जाते हैं, सारे नियम उसकी देह के लिए बनते हैं, सारी नैतिकताएं, संस्कृतियाँ, सभ्यताएं वह अपनी देह के भीतर पाल रही है, बड़े आश्चर्य की बात यह है कि जिस स्त्री की देह को लेकर इतनी साजिशें चल रही हैं, उसी देह में रहने वाले दिमाग को एकदम नकार दिया गया| उसे पनपने ही नहीं दिया गया| उसका दिमाग चला तो उसे चाँद-तारों की शायरी में उलझाया गया| उसके होंठ, उसकी आँखें, उसकी चाल, उसका रंग, उसके बाल-इन चीजं पर इतना फोकस किया गया कि वह बस पावं में पाजेब और आँखों में काजल लगाने में ही मशगूल रही है।
लड़कियों का अच्छा या बुरा होना उनकी सुंदरता और शालीनता (जिसका एक मात्र अर्थ ख़ामोशी से सब कुछ श लेना होता है) पर ही निर्भर करता था और करता है| कोई नहीं कहता कि उसे समझदार बहू चाहिए, कहीं किसी शादी के विज्ञापन में यह नहीं लिखा होता है कि लड़की का गुणवान होना ज़रूरी है| हर जगह सुंदर, शिक्षित, शालीन लड़की ही चाहिए| शिक्षा के दायरे कुछ ऐसे रचे गए कि शिक्षित स्त्रियाँ भी असल में शिक्षित नहीं हो पाई| आज भी अधिकतर जो सोचती हैं, वह वे सोचना नहीं चाहतीं, वैसा उन्हें सोचने को कहा जाता है यानी हाइजैक्ड थिंकिंग|

Friday, December 22, 2017

"औरत होने का दर्द "


औरत होने का दर्द कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !
कभी माँ, कभी बीवी बनकर बलि की देवी बनती है
नौ महीने गर्भ के बीज को पल- पल खून से सींचती है
नव कोपल के फूटने के लम्बे इन्तजार को झेलती है
कौन आगे बढकर प्यार से माथे का पसीना पौंछता है ?
नवजीव के खिलने के असहनीय दर्द को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !
माँ बनकर अपने जिगर के टुकड़े को हर दिन बढ़ते देखती है
कभी प्यार से तो, कभी डांट से पुचकारती है
खुद भूखा रहकर भी हर एक का पेट भरती है
कभी रात का बचा भात तो ,कभी दिन की बची रोटी रात में खाती है
इस बलिदान को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !
कभी पति, कभी बच्चों की दूरी को कम करते पिस जाती है
बच्चें लायक हो तो पिता का सीना गर्व से फूलता है
परीक्षा में कम निकले तो हर कोई माता को कोसता है
हम सफ़र के माथे की हर शिकन को तुरंत भांप लेती है
इस ममता को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !
कभी बेटी, कभी बहन बनकर सब सह जाती है
कभी बाप , कभी भाई के गुस्से में भी मुस्कुराती है
मायके में बचपन के आँगन का हर कर्ज चुकाती है
अपने हर गम, हर दुःख में भी सबका गम भुलाती है
इस दुलार को कौन समझता है ?,
हर कोई बस परखता है !
कभी प्रेमिका बनकर, कभी दोस्ती के नाम पर छली जाती है
खुद गुस्सा होकर भी अपने प्रेमी को हर पल मनाती है
प्रेमी के मन की हर बात बिन कहे समझ जाती है
अपना हर आंसू उससे छुपा लेती है
कभी उसकी याद में तो, कभी बेरुखी में तड़पती है
इस जलन को कौन समझता है ? ,
हर कोई बस परखता है !
कभी बहू बनकर दहेज़ के नाम पर ताने सह जाती है
बेटी पैदा करने पर गुनाहगार ठहराई जाती है
कभी प्रसव तो , कभी गर्भ -पात की पीड़ा झेल जाती है
अपने ही अरमानों की अर्थी अपने कांधो पर उठाती है
इस संवेदना को कौन समझता है ? ,
हर कोई बस परखता है !

नोट - औरतो का सम्मान करे जैसे खुद के घर की बहूत बेटियों का सम्मान करते है वैसे ही दूसरो के घर वालो की बहू बेटियों का सम्मान करे


Tuesday, November 21, 2017

महिलाओं का सम्पत्ति का अधिकार



●ब्रिटिश राज और उससे आजादी के बाद समय-समय पर कानून बनाए गए हैं, जो महिलाओं को निजी संपत्ति का अधिकार तो देते हैं, लेकिन समाज में पुरुष प्रधान सोच के कारण कानून पंगु बना रहा।

●महिलाओं को निजी संपत्ति में हिस्सा देने की बहस काफी पुरानी है। हमारे देश में स्वतंत्रता संग्राम के साथ ही यह बहस तेज हो गई थी। ब्रिटिश राज और उससे आजादी के बाद समय-समय पर कानून बनाए गए हैं, जो महिलाओं को निजी संपत्ति का अधिकार तो देते हैं, लेकिन समाज में पुरुष प्रधान सोच के कारण कानून पंगु बना रहा।
● वर्तमान समय में फैक्टरी, कार्यालय, खेत या घर- हर जगह महिलाएं समान रूप से श्रम कर रही हैं। 
●इसके बावजूद सामाजिक तौर पर निजी संपत्ति के बंटवारे के समय उनकी अनदेखी की जाती है। इस बारे में कानून महज दिखावा साबित होते हैं। 
●पूंजीवाद महिलाओं को समानता का हक तो देता है, लेकिन घर की चौहद्दी के अंदर। वह महिलाओं को श्रम के तौर पर बाजार और फैक्टरी तक लाता है, लेकिन उनके श्रम को सामाजिक श्रम का हिस्सा मानने से हिचकता है। 
●इसीलिए पूरी दुनिया में मानव श्रम की गणना की जाती है तो महिलाओं की अनदेखी की जाती है। इनमें महिलाओं द्वारा घरेलू काम या बच्चों की परवरिश के लिए किए जाने वाले श्रम की गणना नहीं होती है। 
●वर्तमान व्यवस्था भी किसी न किसी रूप में विभिन्न प्रचार माध्यमों से इस गैरबराबरी को बनाए रखना चाहती है।

●महिलाओं को जब संपत्ति में हिस्सा देने की बारी आई तो नीति-निर्माताओं ने महिला संपत्ति की उल्टी-सीधी व्याख्या करनी शुरू कर दी। 
●कभी विवाहित महिला द्वारा बचाए गए पैसे-जेवर आदि को स्त्री की निजी संपत्ति के रूप में माना गया, कभी शादी के बाद पति की संपत्ति को महिला की निजी संपत्ति मान लिया गया। लेकिन वक्त बदलने के साथ ही महिलाएं समान अधिकार को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक होने लगी हैं, जिस कारण संपत्ति अधिकार कानून के व्यावहारिक पक्ष पर बहस तेज हुई है। 
●प्राचीन काल से मध्यकाल तक की सांस्कृतिक अवस्थाओं में महिलाओं की स्थिति ऐसी बनी कि वे संपत्ति और दूसरे अधिकारों के मामले में लगातार हाशिये पर चली गर्इं। लेकिन आधुनिक भारत में महिला अधिकार आंदोलनों का भारतीय समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा।
● आजादी की लड़ाई के दौरान सभी प्रभावशाली नेताओं ने महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिए जाने की वकालत की। उस समय के नेताओं ने महसूस किया कि आर्थिक आजादी महिलाओं को संपत्ति में हक देने की लड़ाई से पूरी तरह से घुली-मिली है। 
●सैद्धांतिक तौर पर प्रकृति भी महिलाओं और पुरुषों में कोई भेद नहीं करती है और न ही प्रारंभिक समाज में ऐसा था। लेकिन विभिन्न सामाजिक संरचना, भौगौलिक, राजनीतिक और आर्थिक कारणों से विश्व के अलग-अलग देशों में महिलाओं की सामाजिक स्थिति में काफी अंतर है।
● कहीं महिलाओं को ज्यादा अधिकार हैं, तो कहीं कम। आज भी जनजातीय समाजों में महिलाओं को बराबरी के अधिकार हैं जो उनको संपत्ति रखने का भी अधिकार देते हैं।

●जबकि हमारे देश में व्यावहारिक रूप से महिलाओं को पुरुषों से कम अधिकार मिले हैं। इसमें भी संपत्ति रखने के मामले में महिलाओं की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। 
●हालत यह है कि अभी तक महिलाओं और पुरुषों की संपत्ति के अधिकार को लेकर कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। अगर हम बंगाल, गुजरात, बिहार या उत्तर प्रदेश में महिलाओं की संख्या और संपत्ति में उनके हिस्से की जानकारी प्राप्त करना चाहें तो भूसे में सूई ढूंढ़ने जैसा होगा। 
●अनेक संगठन महिलाओं के हक की आवाज तो उठाते हैं, लेकिन उनके आंदोलन और मुद्दे आपस में एक दूसरे से अलग-अलग हैं। 
●संयुक्त राष्ट्र की शाखा यूएन-वूमेन ने ‘नेशनल फाउंडेशन आॅफ इंडिया’ और ‘गर्ल्स काउंट’ के साथ मिल कर सोशल मीडिया पर काफी जोर-शोर से यह मुद्दा उठाया है, जिसे समर्थन मिलना शुरू हो गया है। 
●भारत जैसे देश में महिलाओं की सामाजिक हैसियत क्या रही है, यह किसी से छिपा नहीं है। 
●जन्म लेने से लेकर मृत्यु तक महिलाओं को पुरुषों की दया पर जिंदा रहना पड़ता है। अतार्किक और पितृसत्तात्मक सोच के बोझ तले स्त्रियों की पूरी जिंदगी गुजर जाती है। 
●यह तथ्य है कि संपत्ति सहित जमीन और मकान पर महिलाओं का मालिकाना हक होने से उनके साथ भेदभाव कम होते हैं।

●जिन देशों में महिलाएं आर्थिक रूप से ज्यादा सशक्त हैं, वहां भेदभाव में कमी आई है।
● हमारे देश में धर्म सुधार और महिला अधिकार आंदोलनों के कारण अंग्रेजों ने प्रॉपर्टी एक्ट 1937 तैयार किया, जिसमें हिंदू धर्म में विधवा महिलाओं को संपत्ति में अधिकार दिया गया। 
●यह आधे-अधूरे ढंग से तैयार किया गया। इस कानून के अनुसार अगर पति ने अपनी कोई वसीयत नहीं तैयार की है तो पुत्र को विरासत में मिली संपत्ति की आधी हकदार विधवा भी होती थी। 
●1933 में कर्नाटक सरकार ने हिंदू कानून में महिला को संपत्ति में अधिकार के अधिनियम को भी जोड़ा। हालांकि महिलाओं को संपत्ति के कुछ सीमित अधिकार ही दिए गए, लेकिन यह पहली बार कानूनी तौर पर महिलाओं को संपत्ति में अधिकार देने की लिखित व्याख्या करता है।
● इस कानून के तहत वह संपत्ति को बेच, वसीयत या दान नहीं कर सकती थी। लेकिन वह स्त्री धन के तौर पर जुटाई गई संपत्ति को बेच सकती थी। इसमें भी जेवर, कीमती परिधान, प्राप्त उपहार आदि शामिल थे। 
●आजादी के बाद 1956 में हिंदू सेक्सेशन एक्ट की धारा-14 महिलाओं को संपत्ति में पूरा अधिकार देती है। चल और अचल संपत्ति पर भी।

●हिंदू उत्तराधिकार कानून 2005 में हुए बदलाव से अब बेटियों को भी संपत्ति में बेटों के बराबर संपत्ति का हकदार बना दिया गया है।
● इस नियम के तहत अब माता-पिता की संपत्ति की रजिस्ट्री, बेचना, पट्टे पर देना या ट्रांसफर करना बेटी के हस्ताक्षर के बिना संभव नहीं है। 
●इस मामले में या तो बेटी संपत्ति में से अपना हिस्सा लेती है या फिर यह घोषित करती है कि वह अपना हिस्सा अपने भाई को देना चाहती है। तभी संपत्ति की रजिस्ट्री या खरीद-बिक्री संभव हो सकती है।
● बेटी चाहे अविवाहित हो या विवाहित दोनों को ही समान रूप से अपने पिता की जमीन-जायदाद का हिस्सा लेने का हक प्रदान किया गया है।
●चूंकि देश में महिलाओं के संपत्ति अधिकार को लेकर बहुत कम चर्चा हुई है, जिस कारण से शोध और सर्वे का कार्य भी नाममात्र का ही है। 
●2013 में दिसंबर में इंटरनेशनल लैंड कोलिशन, रूरल डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट और यूएन वूमेन ने हिंदू सेक्सेशन सुधार अधिनियम 2005 को लागू करने के बाद की स्थिति पर अपनी रिपोर्ट पेश की।
● इसमें आंध्र प्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश जैसे कृषि आधारित राज्यों में ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन हस्तांतरण को लेकर अध्ययन किया गया। 
●ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी जमीन संपत्ति का सबसे बड़ा माध्यम है।
गांवों में परिवार या व्यक्ति की हैसियत जमीन के आधार पर ही आंकी जाती है। रिपोर्ट बताती है कि पुरुष प्रधान समाज में कानून को लागू करने वाला हर वर्ग इससे अनजान है।
● महिलाएं खुद भी पुरुष प्रधान सोच से ग्रस्त हैं। वे जमीन अपने बेटों को तो देती हैं, लेकिन बेटियों को देने से हिचकती हैं। दरअसल, महिलाओं का मानना होेता है कि बेटी पराए घर चली जाएगी, ऐसे में संपत्ति बंट जाने से सामाजिक संबंध भी छिन्न-भिन्न हो जाएंगे। 
●यहां तक कि प्रशासनिक और न्यायपालिका में भी हर स्तर पर महिला को संपत्ति का अधिकार देने के कानून या नियम के मामले में उदासीनता बरती जाती है। इस रिपोर्ट को भारत सरकार को सौंप दिया गया, ताकि वह महिला संपत्ति कानून को प्रभावी तरीके से लागू करने की कार्ययोजना बना सके। 
★इसमें निष्कर्ष निकाला गया कि संपत्ति में अपना हक लेने के लिए महिलाओं को अपनी मानसिकता बदलनी होगी। साथ ही महिला अधिकार के सवालों को संपत्ति अधिकार के मुद्दे से जोड़ना होगा।

Thursday, November 16, 2017

मैं तुम्हें भ्रूण से इंसान बनाती हूँ !!

मर्द को औरत का ताकत का अहसास दिलाती यह कविता...💐
किसने लिखी है पता नहीं मुझे लेकिन एक मर्द को दर्द का एहसास कराने वाली इस लेखनी को सलाम है मेरा !!
एक बार पढ़िए इस pic पे इससे बेहतर पोस्ट में कभी नहीं कर सकता.....

आज मेरी माहवारी कादूसरा दिन है।
पैरों में चलने की ताक़त नहीं है,जांघों में जैसे पत्थर की सिल भरी है।
पेट की अंतड़ियांदर्द से खिंची हुई हैं।इस दर्द से उठती रूलाईजबड़ों की सख़्ती में भिंची हुई है।
कल जब मैं उस दुकान में‘व्हीस्पर’ पैड का नाम ले फुसफुसाई थी,सारे लोगों की जमी हुई नजरों के बीच,दुकानदार ने काली थैली में लपेटमुझे ‘वो’ चीज लगभग छिपाते हुए पकड़ाई थी।
आज तो पूरा बदन हीदर्द से ऐंठा जाता है।
ऑफिस में कुर्सी पर देर तलक भीबैठा नहीं जाता है।
क्या करूं कि हर महीने केइस पांच दिवसीय झंझट में,छुट्टी ले के भी तोलेटा नहीं जाता है।
मेरा सहयोगी कनखियों से मुझे देख,बार-बार मुस्कुराता है,बात करता है दूसरों से,पर घुमा-फिरा के मुझे हीनिशाना बनाता है।
मैं अपने काम में दक्ष हूं।पर कल से दर्द की वजह से पस्त हूं।
अचानक मेरा बॉस मुझे केबिन में बुलवाता हैै,कल के अधूरे काम पर डांट पिलाता है।
काम में चुस्ती बरतने का देते हुए सुझाव,मेरे पच्चीस दिनों का लगातारओवरटाइम भूल जाता है।
अचानक उसकी निगाह,मेरे चेहरे के पीलेपन, थकानऔर शरीर की सुस्ती-कमजोरी पर जाती है,और मेरी स्थिति शायद उसेव्हीसपर के देखे किसी ऐड की याद दिलाती है।
अपने स्वर की सख्ती को अस्सी प्रतिशत दबाकर,कहता है, ‘‘काम को कर लेना,दो-चार दिन में दिल लगाकर।’’केबिन के बाहर जाते मेरे मन में तेजी से असहजता की एक लहर उमड़ आई थी।
नहीं, यह चिंता नहीं थी पीछे कुर्ते पर कोई ‘धब्बा’उभर आने की।यहां राहत थी अस्सी रुपये में खरीदे आठ पैड से‘हैव ए हैप्पी पीरियड’ जुटाने की।मैं असहज थी क्योंकि मेरी पीठ पर अब तक, उसकी निगाहें गढ़ी थीं,और कानों में हल्की-सीखिलखिलाहट पड़ी थी‘‘इन औरतों का बराबरी का झंडा नहीं झुकता है जबकि हर महीने अपना शरीर ही नहीं संभलता है।
शुक्र है हम मर्द इनकेये ‘नाज-नखरे’ सह लेते हैंऔर हंसकर इन औरतों कोबराबरी करने के मौके देते हैं।’’ओ पुरुषो!मैं क्या करूंतुम्हारी इस सोच पर,कैसे हैरानी ना जताऊं?और ना ही समझ पाती हूंकि कैसे तुम्हें समझाऊं!मैं आज जो रक्त-मांससेनेटरी नैपकिन या नालियों में बहाती हूं,उसी मांस-लोथड़े से कभी वक्त आने पर,तुम्हारे वजूद के लिए,‘कच्चा माल’ जुटाती हूं।और इसी माहवारी के दर्द सेमैं वो अभ्यास पाती हूं,जब अपनी जान पर खेलतुम्हें दुनिया में लाती हूं।इसलिए अरे ओ मदो!ना हंसो मुझ पर कि जब मैंइस दर्द से छटपटाती हूं,क्योंकि इसी माहवारी की बदौलत मैं तुम्हें‘भ्रूण’ से इंसान बनाती हूं,,,,,,,

'सुंदर, घरेलू और सुशील' दूल्हा क्यों नहीं ढूंढते?

क्या आप खाना बना सकती हैं? आप किस तरह के कपड़े पहनती हैं? मॉडर्न, ट्रेडिशनल या दोनों? शादी के बाद नौकरी करेंगी या नहीं?
ये सवाल मुझसे लड़के के माता-पिता या घरवालों ने नहीं पूछा. ये सवाल पूछती हैं प्यार और शादी कराने का दावा करने वाली मैट्रिमोनियल वेबसाइटें.
पिछले कुछ दिनों से घरवाले मुझे शादी कराने वाली इन वेबसाइटों पर अकाउंट बनाने के लिए मनाने की कोशिश कर रहे थे.
इसे टालने के लिए सभी पैंतरे आज़माने के बाद उकताकर मैंने अकाउंट बनाने के लिए हां कही. सोचा, इसी बहाने बोरिंग ज़िंदगी में थोड़ा रोमांच आएगा.
पहली वेबसाइट पर मुस्कुराते जोड़े नज़र आए. साथ ही बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- 'love is looking for you, be found'. यानी हिंदी के आसान शब्दों में कहें तो प्यार आपको ढूंढ रहा है, उसकी रडार में तो आइए.


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यानी मैं प्यार के रास्ते पर बढ़ रही थी. इसके लिए मुझे अपने धर्म, जाति, गोत्र, उम्र, शक्ल-सूरत, पढ़ाई-लिखाई और नौकरी की जानकारी देनी था.

सवालों की बौछार

खाना वेज खाती हूं या नॉनवेज, दारू-सिगरेट पीती हूं या नहीं, कपड़े मॉडर्न पहनती हूं या ट्रेडिशनल... ऐसी तमाम सवालों के जवाब देने थे.
फिर सवाल आया, क्या आप खाना बना सकती हैं? जवाब में 'नहीं' टिक करके आगे बढ़ी.
अगला सवाल था, शादी के बाद नौकरी करना चाहेंगी?

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इतना सब बताने के बाद ये बताना था कि मैं किस तरह की लड़की हूं, लाइफ़ में मेरा क्या प्लान है...वगैरह-वगैरह.
मैं टाइप करने लगी- मुझे जेंडर मुद्दों में दिलचस्पी है...फिर याद आया ये रेज़्यूमे नहीं है. आख़िरकार जैसे-तैसे अकाउंट बन गया.
अब लड़कों के अकाउंट खंगालने की बारी थी. किसी ने नहीं बताया था कि वो खाना बना सकते हैं या नहीं.
किसी ने नहीं बताया था कि वो शादी के बाद ऑफ़िस का काम करना चाहेंगे या घर का. वो कौन से कपड़े पहनते हैं, इसका भी कोई ज़िक्र नहीं किया था.

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लड़कों से ये सवाल नहीं

थोड़ी और पड़ताल करने पर पता चला कि लड़कों से ये सवाल पूछे ही नहीं गए थे.
बदलते वक़्त के साथ कदम मिलाकर चलने का दावा करने वाली आधुनिक वेबसाइट पर पुरुषों और महिलाओं को अलग-अलग चश्मों से देखा जा रहा था.
इसके बाद शादी अरेंज करने वाली तीन-चार और वेबसाइटों पर नज़र दौड़ाई. सबमें तकरीबन एक से ही सवाल पूछे गए थे.
एक मैट्रिमोनियल साइट पर अगर आप दुल्हन ढूंढते हैं तो तो डिफ़ॉल्ट एज 20-25 साल दिखेगी और अगर दूल्हा ढूंढ रहे हैं तो डिफ़ॉल्ट एज '24-29'.

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यानी लड़की की उम्र लड़के से कम होनी चाहिए, चाहे-अनचाहे इस धारणा को पुख़्ता किया जा रहा है.
दूसरी वेबसाइट पर अगर आप ये बताते हैं कि अकाउंट आपने ख़ुद बनाया है तो आपको कम लोग अप्रोच करेंगे. ऐसा वेबसाइट पर आने वाला नोटिफ़िकेशन कहता है.
मतलब आज भी हम अपने लिए जीवनसाथी ढूंढने वालों को शक़ की निगाह से देखते हैं. अगर किसी को शादी करनी है तो उसे अपने माता-पिता या भाई-बहन से अकाउंट बनाने के लिए कहना चाहिए.

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फ़र्क बस इतना ही नहीं था. लड़के और लड़कियों की तस्वीरों में भी अंतर साफ़ देखा जा सकता है.

सेल्फ़ी में फर्क



लड़के जहां सेल्फ़ी और पूल में नहाने वाली तस्वीरें पोस्ट करते हैं वहीं ज्यादातर लड़कियां टिपिकल दुल्हन वाली भावभंगिमा में नज़र आती हैं.
अख़बारों में छपे 'सुंदर, गोरी, पतली और घरेलू बहू' की मांग करने वाले विज्ञापन खूब देखे थे लेकिन इंटरनेट के ज़माने में मैट्रिमोनियल वेबसाइटों का यह रवैया हैरान करने वाला था.
अख़बारों में शायद ही कभी किसी ने 'सुंदर, घरेलू और सुशील' वर की मांग करने वाला विज्ञापन देखा हो. शायद ही कभी लड़कों को ख़ास तरह के कपड़ों में फ़ोटो भेजने को कहा गया हो.

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ख़ैर, इन्हें तो पुरानी बातें कहकर जानें भी दें मगर इंटरनेट के ज़माने में मैट्रिमोनियल वेबसाइटों के यह रवैये पर सवाल कैसे न उठाएं?
ख़ासकर जब ऑनलाइन मैचमेकिंग इंडस्ट्री का मार्केट हज़ारों करोड़ रुपये का हो.

अरबों का कारोबार

एसोचैम के आंकड़ों के मुताबिक पिछले पांच सालों में मैट्रिमोनियल वेबसाइटों का बाज़ार तेजी से बढ़ा है और अब यह तकरीबन 15,000 करोड़ तक पहुंच गया है.
मैंने वेबसाइटों पर दिए नंबरों पर फ़ोन करने यह जानने की कोशिश की कि लड़कों और लड़कियों से पूछे जाने वाले सवालों में ये अंतर क्यों है.
ज्यादातर जगहों पर फ़ोन उठाने वालों ने व्यस्त होने की बात कहकर सवाल टाल दिए. मेरे भेजे ईमेल्स का भी कोई जवाब नहीं आया.

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काफी देर बाद एक वेबसाइट के ऑफ़िस में आलोक नाम के कस्टमर केयर रिप्रजेंटेटिव ने फ़ोन उठाया.
उन्होंने कहा,"हमें अपने सवाल लोगों की ज़रूरतों के हिसाब से तय करने होते हैं. लगभग सभी लोग ऐसी लड़की चाहते हैं जो नौकरी के साथ-साथ घर भी संभाल सके.''
मेरी एक दोस्त से सैंडल उतारकर खड़े होने को कहा गया था ताकि भावी ससुराल वालों को उसकी लंबाई का सही अंदाज़ा लग सके.
मैचमेकिंग साइटों का तौर-तरीका मुझे इससे ज़्यादा अलग नहीं लगा.

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मैट्रिमोनियल वेबसाइटों पर खूब पढ़े-लिखे और ऊंचे पदों पर काम करने वाले युवा रजिस्टर करते हैं. एनआरआई माता-पिता अपने बच्चों के लिए जीवनसाथी तलाशने यहां आते हैं.
ऐसी स्थिति में भी अगर कोई इस दोहरे रवैये पर आपत्ति नहीं कर रहा है तो निश्चित तौर पर परेशान करने वाली बात है.