Saturday, June 18, 2016

बलत्कार और बलत्कारी

स्त्रियों के छोटे और उत्तेजक कपड़े पुरुषवर्ग को उकसाने का कार्य करते हैं और बलात्कारी के बचाव में ये एक मजबूत दलील है लेकिन इस दलील का कोई आधार नज़र नहीँ है, जब किसी नवजात या छोटी बच्चियों के साथ ऐसा होता हो.वैसे भी विकृतता मन और मस्तिष्क में होतीं है कि, ज्यादातर अपनी बहन,बेटियां कुछ भी पहने गंदा ख़याल नहीँ आता जबकि कोई परायी स्त्री पूरे कपडों में भी हो तो मन डोल जाता है.
असल में इन्हें अपनी कुंठित इच्छाओं की पूर्ति के लिये महज एक स्त्रीदेह की ज़रूरत होतीं है चाहे वह किसी भी आयुवर्ग की हो, तभी तो ऐसी बच्चियां जिनके अंग विकसित भी न हुए हों और जो 'बलात्कार' शब्द का मतलब भी नहीँ जानती हैं उनका शिकार करने से भी ऐसे लोग बाज नहीँ आते हैं.
कई बार ये कहा जाता है कि जिन्हें सेक्स का मौका नहीँ मिलता है या जो इस मामले में अतृप्त रहते हैं वे ही ऐसे घृणित क़दम उठाते हैं. ये बात भी सत्य प्रतीत नहीँ होतीं है क्योंकि ज्यादातर बलात्कारियों के परिवार और उनका सफल वैवाहिक जीवन पाया गया है. सेक्स आनंद की चीज़ है, शारीरिक जरुरत की चीज है लेकिन जब ये दोतरफा हो तब. एक की मर्जी के बगैर दुसरे का उसके शरीर को रौँदने और कुचलने से बड़ा घृणित कुकर्म और कुछ भी नहीँ हो सकता है.
बलात्कार का मनोविज्ञान क्या है अर्थात बलात्कार से ठीक पहले, उसे करते समय और उसके बाद एक बलात्कारी की क्या सोच होतीं है, उसके दिमाग में क्या चल रहा होता है, सभी अपनी-2 बुद्धि और ज्ञान के हिसाब से इसपर अनुमान ही लगाने की कोशिश करते हैं कि, क्या हुआ होगा, किन परिस्थितियों में हुआ होगा, किस तरह हुआ होगा.........वगैरह-2.
खैर इसका सटीक मनोवैज्ञानिक कारण तो फिलहाल शोध का विषय है लेकिन अभी तक की प्राप्त जानकारियों के हिसाब से इसके पीछे दो कारण सशक्त रुप से उभरकर सामने आते हैं.....पहला ये कि,किसी स्त्री के शरीर को रौँदकर उसका विकृत आनंद लेना और दूसरा, किसी बात का बदला लेने के लिये स्त्री के देह को कुचलना. बलात्कार या तो एकल अर्थात एक आदमी के द्वारा किया जाता है या फ़िर सामूहिक रुप से मतलब एक से अधिक पुरुषों के द्वारा.....
सामूहिक बलात्कार का चलन हाल के वर्षों में बहुत ज्यादा बढ़ गया है. इसकी वजह यही नज़र आती है कि ज्यादा लोगों के रहने से इनका आत्मबल मज़बूत रहता है, स्त्री पर कब्जा पाना आसान होता है, दुष्कर्म के दौरान अगर वह मर जाये तो उसकी लाश को ठिकाने लगाने तथा सबूत मिटाने में आसानी होतीं है.
बहरहाल इस अपराध की रोकथाम के सारे उपाय व्यर्थ प्रतीत हो रहे हैं क्योंकि हरएक स्त्री को चौबीसों घंटे की सुरक्षा दे पाना हर समय काल में असंभव है, और रहेगा.. जब तक अपेक्षित मानसिक और वैचारिक सुधार नहीँ होगा, तब तक इस दिशा में कोई सफलता नहीँ मिलेगी......

Friday, June 17, 2016

आई लव यू...लॉट्स

बहुत प्यार करता हूँ मैं उससे..
उससे जुड़ा हर सपना सच करना चाहता हूँ मैं..
दुख का दरिया पार करके दूर आसमान में एक बसेरा बनाना चाहता हूँ मैं...
जहाँ कोई नहीं सिर्फ और सिर्फ हम दोनों होंगे...
वहाँ हमारे हर सपने सच होंगे.''

वो हमेशा इस तरह की ही बातें करता रहता था और मेरा उससे कहना था कि इस प्रकार की बातें सिर्फ फिल्मों में अच्छी लगती हैं लेकिन आज उसकी हर बातें मेरे लिए एक मीठी यादें बनकर रह गई हैं।

प्यार के लिए उसने जो भी करना था वह सब कुछ किया लेकिन शायद उसके नसीब में वो सुख था ही नहीं जिसका सपना वह हर दिन देखा करता था। आज वह इस दुनिया की भीड़ में कहीं गुम हो गया है उसका कोई पता नहीं। हम चाह के भी उसे ढूँढ नहीं पा रहे हैं। मेरा दोस्त मेरा सब कुछ था वह। हमेशा खुश रहने वाला, अपनी मनमानी करने वाला, थोड़ा गुस्सेवाला और एक नंबर का जिद्दी होने के बावजूद वह मुझे सबसे प्यारा था।

मैंने उसकी बदौलत ही तो प्यार को इतनी नजदीक से जाना वरना मेरा और प्यार का दूर-दूर तक कोई रिश्ता-नाता नहीं था। मेरा आदर्श, मेरा टीचर और मेरा पक्का दोस्त आज मालूम नहीं कहाँ खो गया है। कहीं वह मुझे और इस दुनिया को छोड़कर तो नहीं चला गया?

नहीं...नहीं..ऐसा कभी नहीं हो सकता वो कायर नहीं था वही तो हमें हमेशा कहता रहता था कि 'जीवन के हर दिन को हमें जी भर के जी लेना चाहिए क्योंकि जिंदगी इंसान को सिर्फ एक बार ही मिलती है।'' आप इसे शाहरूख की फिल्म का डायलॉग ही समझो लेकिन जब भी वह यह बात बोलता था मैं कुछ सोचने पर मजबूर हो जाती थी।

जब भी प्यार के नाम पर मुझे डर लगता वह मेरी हिम्मत बढ़ाता था। वह कहता था कि अगर आप किसी से सच्चा प्यार करते हो तो आपको किसी से डरने की भला क्या जरूरत है।

कोई कहता है जीवन में इंसान को सिर्फ और सिर्फ एक बार ही सच्चा प्यार होता है और दूसरा प्यार उसके लिए सिर्फ समझौता होता है। लेकिन मुझे इस इंसान में यह बात देखने को नहीं मिली।

ळपहले प्यार ने तो उसे धोखा दे दिया था लेकिन दूसरे प्यार ने भी अपने परिवार के सामने लाचार होकर ना चाहते हुए भी उसका साथ छोड़ दिया। वह हमेशा कहता था 'जिसको हमने प्यार किया उसने किसी और के लिए हमें छोड़ा और जो हमसे प्यार करती थी उसने अपने परिवार के लिए हमसे नाता तोड़ा'।

फिर भी उसने कभी किसी को दोष नहीं दिया कभी किसी को भला-बुरा नहीं कहा बस आखिर तक सबको एक ही बात कहता चला गया कि 'हमेशा खुश रहना...बस हमेशा खुश रहना'।

मैंने सुना है कि अगर कोई आपको सच्चे दिल से प्यार करता हो और आप उसे धोखा देकर या किसी परिस्थिति में लाचार कर छोड़ देते हो तो आपको बद्दुकआ लगती है। लेकिन उसके प्यार को कोई बद्दुथआ नहीं लगी शायद उसने कभी अपने प्यार का बुरा चाहा ही नहीं होगा।

पहले प्यार के बारे में तो मैं कुछ बता नहीं सकती लेकिन दूसरे प्यार के बार में दुनिया के सामने में पूरे विश्वास के साथ कह सकती हूँ क्योंकि....आज उसका दूसरा प्यार बहुत खुश है आज उस लड़की की शादी हो चुकी है घर में उसको समझने वाला पति और प्यारे बच्चे हैं।

उसने अपने बेटे का नाम उस लड़के के नाम पर रखा है और बेटी का नाम उस लड़के को जो पसंद था वही रखा है। मैं यह सब कुछ इसलिए बता सकती हूँ क्योंकि मैं ही तो उसका दूसरा प्यार हूँ।

आज मैं उसे बहुत याद कर रही हूँ उससे जुडी हर बात आज भी मुझे उसके पास जाने पर मजबूर कर रही है। आखिर मैं उसको क्यों बता नहीं पाई कि मैं उसे कितना प्यार करती थी। मैं हिम्मत जोड़ नहीं पाई आखिर क्यों?

बस मैं उसे इतना ही कहूँगी कि आई लव यू.....आई लव यू......आई लव यू...वह जहाँ भी होगा उसे मेरे यह शब्द जरूर सुनाई देंगे.... आई लव यू...मिस यू... आई लव यू...आई लव यू....लॉट्स।

बी माय वेलन्टाइन : अगर आप किसी को सच्चा प्यार करते हो तो उसी समय दुनिया का डर रखे बगैर उसे बता दो। 'आज' की बात कभी भी 'कल' पर नहीं छोड़नी चाहिए।

क्योंकि......क्योंकि जिसका 'आज' खो जाता है उसे कल कभी भी नहीं मिलता.....

Saturday, June 11, 2016

150 साल तक स्तन खुले रखने को मजबूर थीं औरतें!

तब ब्रिटिश भारत में आए नहीं थे, उसके पहले से ही हमारे देश का एक हिस्सा औरतों के प्रति एक बहुत अमानवीय परंपरा का पालन करता आ रहा था। दक्षिण में त्रावणकोर की औरतों के लिए शरीर का ऊपरी हिस्सा कपड़ों से ढकने की मनाही थी। 150 साल पहले हालत यह थी कि औरतों का अपने ब्रेस्ट ढकना अपराध की श्रेणी में आता था। यह परंपरा 19वीं सदी के मध्य तक चली।

तब केवल नंबूदिरी, ब्राह्मण, क्षत्रिय और नायर वंश की ऊंची जाति की औरतें ही स्तन ढक सकती थीं।

नीची जाति की औरतों को मजबूरन अपना वक्षस्थल खुला रखना पड़ता था।

यहां तक कि ऊंची जाति में भी इस नियम के कई पहलू थे। मसलन, एक क्षत्रिय औरत को एक ब्राह्मण (तुलनात्मक रूप से ऊंची जाति) के सामने अपना वक्षस्थल ढकने की मनाही थी। सजा के डर से विभिन्न जातियों की लगभग सभी औरतें अपना वक्षस्थल खुला ही रखती थीं।

एक बार एक रानी ने अपने महल में एक दलित औरत को देखा, जिसका वक्षस्थल ढका हुआ था, तो रानी ने उस औरत के स्तन कटवाने का आदेश दे दिया।

शाही परिवार ने भी इस सामाजिक बुराई पर कोई ध्यान नहीं दिया। जब भी राजा का कारवां शहर की सड़कों पर निकलता था, तब ऊंची जाति की औरतें वक्षस्थल खुला रखकर उनपर पुष्पवर्षा करती थीं।

19वीं सदी की शुरुआत में परिस्थितियां सुधरने लगीं। काम की तलाश में केरल से लोग श्रीलंका गए और उन्हें अपने सामाजिक अधिकारों के बारे में पता चला। उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार किया, जिससे औरतों को घर में और घर के बाहर अपने शरीर को ढकने की आजादी मिली।

लेकिन, पुरुषों ने इसे अपनी बेइज्जती समझा और इस बदलाव के जवाब में उन्होंने औरतों पर हिंसक हमले करने और उनके कपड़े फाड़ने शुरू कर दिए।

1814 में त्रावणकोर के दीवान ने एक घोषणा-पत्र जारी किया, जिसने औरतों को अपना वक्षस्थल ढकने की अनुमति दी। इसके बावजूद यह लड़ाई जारी रही। लेकिन, कुछ औरतों ने पुरुषों के हमलों के जवाब में पूरे शरीर को ढकना शुरू कर दिया।

आखिर में 26 जुलाई 1859 को ब्रिटिशर्स के आगमन के साथ एक कानून पास किया गया, जिसने इस सामाजिक बुराई पर लगाम कसते हुए औरतों को इस अमानवीय परंपरा से आजादी दिलाई और इस तरह केरल राज्य के आधुनिक सामाजिक ढांचे का मार्ग प्रशस्त हुआ।

माँ बेटा का हिसाब-किताब

एक बार जरुर पढ़े….! (अच्छी लगे तो शेयर करें)

एक बेटा पढ़-लिख कर बहुत बड़ा आदमी बन गया .
पिता के स्वर्गवास के बाद माँ ने
हर तरह का काम करके उसे इस काबिल बना दिया था.

शादी के बाद पत्नी को माँ से शिकायत रहने लगी के
वो उन के स्टेटस मे फिट नहीं है.
लोगों को बताने मे उन्हें संकोच होता है कि
ये अनपढ़ उनकी सास-माँ है…!

बात बढ़ने पर बेटे ने… एक दिन माँ से कहा..
” माँ ”_ मै चाहता हूँ कि मै अब इस काबिल हो गयाहूँ कि कोई
भी क़र्ज़ अदा कर सकता हूँ मै और तुम दोनों सुखी रहें
इसलिए आज तुम मुझ पर किये गए अब तक के सारे
खर्च सूद और व्याज के साथ मिला कर बता दो .
मै वो अदा कर दूंगा…!
फिर हम अलग-अलग सुखी रहेंगे.
माँ ने सोच कर उत्तर दिया…
“बेटा”_ हिसाब ज़रा लम्बा है…. सोच कर बताना पडेगा मुझे.
थोडा वक्त चाहिए.
बेटे ने कहा माँ कोई ज़ल्दी नहीं है. दो-चार दिनों मे बता देना.
रात हुई, सब सो गए,
माँ ने एक लोटे मे पानी लिया और बेटे के कमरे मे आई.
बेटा जहाँ सो रहा था उसके एक ओर पानी डाल दिया.
बेटे ने करवट ले ली.
माँ ने दूसरी ओर भी पानी डाल दिया.
बेटे ने जिस ओर भी करवट ली माँ उसी ओर पानी डालती रही.
तब परेशान होकर बेटा उठ कर खीज कर.
बोला कि माँ ये क्या है ?
मेरे पूरे बिस्तर को पानी-पानी क्यूँ कर डाला..?
माँ बोली….
बेटा…. तुने मुझसे पूरी ज़िन्दगी का हिसाब बनानें को कहा था.
मै अभी ये हिसाब लगा रही थी कि मैंने कितनी रातें तेरे बचपन मे
तेरे बिस्तर गीला कर देने से जागते हुए काटीं हैं.
ये तो पहली रात है ओर तू अभी से घबरा गया ..?
मैंने अभी हिसाब तो शुरू भी नहीं किया है जिसे तू अदा कर पाए…!
माँ कि इस बात ने बेटे के ह्रदय को झगझोड़ के रख दिया.
फिर वो रात उसने सोचने मे ही गुज़ार दी. उसे ये अहसास हो गया था कि माँ का
क़र्ज़ आजीवन नहीं उतरा जा सकता.
माँ अगर शीतल छाया है. पिता बरगद है जिसके नीचे बेटा उन्मुक्त भाव से जीवन बिताता है.
माता अगर अपनी संतान के लिए हर दुःख उठाने को तैयार रहती है. तो पिता सारे जीवन उन्हें पीता ही रहता है.
हम तो बस उनके किये गए कार्यों को आगे बढ़ाकर अपने हित मे काम कर रहे हैं.
आखिर हमें भी तो अपने बच्चों से वही चाहिए ना ……..!

भारत में भी होता है मुस्लिम महिलाओं का खतना, उठी आवाज़

भारत में मुसलमानों के एक छोटे से समुदाय बोहरा में महिलाओं का खतना यानी उनके जननांग के बाहरी हिस्से क्लिटोरिस को रेज़र ब्लेड से काट देने का चलन मौजूद है, लेकिन इसके ख़िलाफ़ अब आवाज़ें उठनी शुरू हो गई हैं.

महिलाओं या बच्चियों का खतना धार्मिक कारणों से होता है और वो भी सुन्न किए बिना. अंग्रेजी में इसे एफ़जीएम यानी फीमेल जेनाइटल म्यूटिलेशन कहते हैं.

इस क्रूर परंपरा पर दुनिया के बहुत से देशों में प्रतिबंध है. अब कुछ बोहरा महिलाओं ने इस परंपरा पर रोक लगाने की मांग की है.

इस दर्द से गुजर चुकीं मासूमा रानाल्वी बताती हैं कि जब वो सात साल की थीं, तब उनकी दादी उन्हें आइसक्रीम और टॉफ़ियां दिलाने का वायदा कर बाहर ले गईं.

वह बताती हैं, “मैं बहुत उत्साहित थी और उनके साथ ख़ुशी-ख़ुशी गई. वह मुझे एक जर्जर पुरानी इमारत में ले गईं. मैं सोच रही थी कि यहां कैसा आइसक्रीम पार्लर होगा. वह मुझे एक कमरे में ले गईं, एक दरी पर लिटाया और मेरी पैंट उतार दी.”

एक महिला ख़तना के दौरान अपनी बच्ची को पड़े हुए. यह तस्वीर इंडोनेशिया की है जिसे 10 फ़रवरी, 2013 को खींचा गया था.
“उन्होंने मेरे हाथ पकड़े और एक अन्य महिला ने मेरे पैर. फिर उन्होंने मेरी योनि से कुछ काट दिया. मैं दर्द से चिल्लाई और रोना शुरू कर दिया. उन्होंने उस पर कोई काला पाउडर डाल दिया. मेरी पैंट ऊपर खींची और फिर मेरी दादी मुझे घर ले आईं.”

यह 40 साल पुरानी बात है लेकिन मासूमा कहती हैं कि उनके साथ जो हुआ वह उसके सदमे से वो अब भी उबर नहीं बन पाई हैं.

इसलिए इस महीने की शुरुआत में उन्होंने और कुछ अन्य बोहरा महिलाओं ने चेंजडॉटओआरजी नाम की एक वेबसाइट में एक याचिका डाली है जिसमें सरकार से एफ़जीएम पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है.

मासूमा कहती हैं कि इस परंपरा की वजह यह विश्वास है कि “महिला यौनिकता पितृसत्ता के लिए घातक है और महिलाओं को सेक्स का आनंद लेने का कोई अधिकार नहीं है और जिस महिला का खतना हो चुका होगा, वो अपने पति के प्रति अधिक वफ़ादार होगी और घर से बाहर नहीं जाएगी.”

“इसका एकमात्र उद्देश्य महिला की यौन इच्छा को ख़त्म करना और सेक्स को उसके लिए कम आनंददायक बनाना है.”

एफ़जीएम अफ़्रीका के कई हिस्सों और मध्य एशिया में सदियों से जारी है लेकिन भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका में इसके बारे में ज़्यादा सुनने को नहीं मिलता है. यहां सिर्फ़ दाऊदी बोहरा समुदाय में ये परंपरा पाई जाती है.

यमन के शिया मुसलमानों का एक हिस्सा रहे बोहरा 16वीं सदी में भारत आए थे. आज वह मुख्यतः गुजरात और महाराष्ट्र में रहते हैं.

दस लाख से अधिक आबादी वाला यह समुदाय अच्छा-ख़ासा समृद्ध है और दाऊदी बोहरा देश में सबसे पढ़े-लिखे समुदायों में से हैं.

दिसंबर 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें एफ़जीएम को दुनिया भर से ख़त्म करने का संकल्प लिया गया. बहुत से देशों ने इस पर प्रतिबंध भी लगा दिया है.

लेकिन भारत में ऐसा कोई क़ानून नहीं है और बोहरा अब भी इस परंपरा का पालन करते हैं- जिसे यहां खतना या महिला सुन्नत कहते हैं.

भारत में चेंजडॉटओआरजी की राष्ट्रीय प्रमुख प्रीति हरमन ने बीबीसी को बताया, “एफ़जीएम पर ज़्यादातर बातचीत फुसफुसा कर ही की जाती है, कम से कम अब तक.”

“भारत में पहली बार महिलाओं के एक समूह ने इस बारे में बात की है. समूह में शामिल महिलाएं एफएमजी को झेल चुकी हैं. उनका संदेश ऊंचा और साफ़ है- एफ़जीएम पर रोक लगनी चाहिए.”

कला इतिहासकार हबीबा इंसाफ़ भी बोहरा समुदाय से हैं और उन्होंने इस याचिका पर हस्ताक्षर भी किए हैं.वो कहती हैं, “इस परंपरा की क़ुरान में इजाज़त नहीं है. अगर होती तो भारत में सभी मुसलमान इसका पालन करते. हमारे समुदाय में यह इसलिए चल रही है क्योंकि कोई इस पर सवाल नहीं उठाता.”

वो कहती हैं कि एफ़जीएम लंबे समय में हानिकारक प्रभाव छोड़ सकता है- यह मनोवैज्ञानिक और यौनिकता को हानि पहुंचा सकता है.

इंसाफ़ कहती हैं, “इसके अलावा एफ़एमजी प्रशिक्षित लोग भी नहीं करते, इसलिए अकसर इसमें समस्याएं पैदा हो जाती हैं. मैंने ऐसी महिलाओं के बारे में सुना है जो एफ़जीएम के दौरान अत्यधिक खून बहने से मर गईं.”

कुछ साल पहले एक बोहरा महिला ने ऐसी ही याचिका शुरू की थी- जिन्होंने अपना नाम ज़ाहिर करने से इनकार कर दिया.

उन्होंने बोहरा समुदाय के तत्कालीन रूहानी पेशवा (सर्वोच्च धार्मिक नेता) सैय्यदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन से एफ़जीएम पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी.

मासूमा कहती हैं कि यह याचिका ‘कूड़ेदान में फेंक दी गई थी’.

सैय्यदना के एक प्रवक्ता ने सलाह दी थी कि “बोहरा महिलाओं को समझना चाहिए कि उनका धर्म इस प्रक्रिय

समाज में स्त्रियों की स्थ‍िति, अधिकार और कानून

मित्रों कोई भी समाज नारी शक्ति को उपेक्षित कर प्रगति नहीं कर सकता है। जिस समाज में नारियों का सम्मान नहीं होता, वहां खुशहाली और तरक्की का संबंध जीवन से नहीं होता है। बड़ा ही दुख होता है जब महिलाओं के साथ गुंडागर्दी, हिंसा, अपराध की घटनाएं प्रकाश में आती है। महिलाएं घर के बाहर और घ के अंदर अपने संगे संबधियों के बीच, कार्यस्थल, यहां तककि मंदिर में भी सुरक्षित नहीं है। समाज में विकृत एवं बीमार मानसिकता के लोग भरे पड़े हैं। जो नारी अपमान का कोई मौका गंवाना नहीं चाहता है। आप गुंडा तत्व से तो जैसे तैसे निपट सकते हैं। लेकिन बीमारों से कैसे निपटेंगे। इसके लिए ठोस कदम उठाने होंगे। इस समाज को नारी सम्मान और सशक्तिकरण के लिए एकजुट होना पड़ेगा। आज स्त्रियों पर होने वाले अत्याचार, अपराध और अपमान की घटनाओं की वजह से ही केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने कुछ ठोस कदम उठाए और कुछ योजनाए शुरु की। साथ ही कानून में भी कुछ बदलाव किया। जोकि सराहनीय है। लेकिन जानकारी और जागरुकता के अभाव में नारी समाज इसका पूरा लाभ नहीं ले पा रहा है। अत हम चेतना-एक प्रयास संचालक सर्वहित ग्रामोद्योग एवं मानव सेवा समिति ने दस समाज को नारी के प्रति संवेदनशील बनाने का दृढ़ संकल्प लिया है। हमें आशा है कि हमारी छोटी सी यह कोशिश समाज को एक नई दिशा देने में सार्थक सिद्ध होगी।

मित्रों हम महिलाओं के अधिकार, उनके मान-सम्मान और सुरक्षा को लेकर देश के प्रमुख कानूनों के बारे में चर्चा कर रहें हैं। हम वैसी घटनाओं और हरकतों को लेकर कानून के प्रावधानों की चर्चा कर रहे हैं, जिन्हें आमतौर पर महिलाएं चुपचाप सहन कर लेती हैं जबकि इनसे निबटने के लिए कानून और सहायता उपलब्ध हैं। महिलाएं चाहें, तो उनकी मदद ले सकती हैं और शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक उत्पीड़न से खुद को बचा सकती हैं। छेड़छाड़, मेले-ठेले में पुरुषों द्वारा जानबूझ कर की जाने वाली धक्का-मुक्की, अश्लील टिप्पणी और इशारे महिलाओं को आतंकित करने वाली घटनाएं हैं। ऐसी घटनाओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई संभव है। उसी तरह ससुराल में घर के अंदर किये जाने वाले अमानवीय व्यवहार को रोकने की भी कानूनी व्यवस्था है। दहेज उत्पीड़न को लेकर तो कानून और अदालत बेहद संवेदनशील है। इन सब का लाभ लिया जाना चाहिए। हम इन सब की चर्चा कर रहे हैं।

दहेज उत्पीड़न
यह सर्वविदित है कि दहेज एक सामाजिक अभिशाप और कानूनी अपराध है. यह महिला प्रताड़ना और उत्पीड़न का बड़ा कारण है. भारतीय दंड संहिता की धारा 304(बी) तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 के तहत दहेज लेना और देना दोनों अपराध है. ऐसे अपराध की सजा कम-से-कम पांच वर्ष कैद या कम-से-कम पंद्रह हजार रुपये जुर्माना है. दहेज की मांग करने पर छह माह की कैद की सजा और दस हजार रुपये तक का जुर्माना किया जाता है. साथ ही, दहेज के नाम पर किसी भी प्रकार के मानसिक, शारीरिक, मौखिक तथा आर्थिक उत्पीड़न को अपराध के दायरे में रखा गया है.

दहेज हत्या से जुड़े कानूनी प्रावधान
दहेज हत्या को लेकर भारतीय दंड संहिता यानी आइपीसी में स्पष्ट प्रावधान है। इसके लिए संहिता की धारा 304(बी), 302, 306 एवं 498-ए है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 304(बी)
भारतीय दंड संहिता की धारा 304(बी) दहेज हत्या के मामलों में सजा के लिए लागू की जाती है। दहेज हत्या का अर्थ है औरत की जलने या किसी शारीरिक चोट के कारण हुई मौत या शादी के सात साल के अंदर किन्हीं संदेहास्पद कारण से हुई उसकी मृत्यु। दहेज हत्या की सजा सात साल कैद है। इस जुर्म के अभियुक्त को जमानत नहीं मिलती है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 302
संहिता की धारा 302 में दहेज हत्या के मामले में सजा का प्रावधान है. इसके तहत किसी औरत की दहेज हत्या के अभियुक्त का अदालत में अपराध सिद्ध होने पर उसे उम्र कैद या फांसी हो सकती है.

भारतीय दंड संहिता की धारा 306
अगर ससुराल वाले किसी औरत को दहेज के लिए मानसिक या भावनात्मक रूप से हिंसा का शिकार बनाते हैं और इस कारण वह आत्महत्या कर लेती है, तो वहां भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत उसे सजा मिलती है. इसके तहत दोष साबित होने पर अभियुक्त को महिला द्वारा आत्महत्या के लिए मजबूर करने के अपराध के लिए जुर्माना और 10 साल तक की सजा सुनायी जा सकती है.

भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए
पति या रिश्तेदारों द्वारा दहेज के लालच में महिला के साथ क्रूरता और हिंसा का व्यवहार करने पर संहिता की धारा-498ए के तहत कठोर दंड का प्रावधान है. यहां क्रूरता के मायने हैं- औरत को आत्महत्या के लिए मजबूर करना, उसकी जिंदगी के लिए खतरा पैदा करना व दहेज के लिए सताना व हिंसा।

यौन अपराध/ बलात्कार सम्बंधित कानून

नए कानून में महिलाओं को हिम्मत मिलने की उम्मीद जताई गई है, इस कानून के अनुसार महिलाओं के साथ बलात्कार के मुकद्दमों की सुनवाई सिर्फ महिला जजों से कराने का प्रावधान है। इससे एक अच्छी, असरदार और मानवीय न्याय प्रणाली चलाने में मदद मिलेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बलात्कार के मामलों में चिकित्सा सबूत अपर्याप्त भी हैं, तो भी महिला का ब्यान ही काफी समझा जाना चाहिए। देश में बलात्कार के लगभग 80 प्रतिशत मामलों में सबूतों के अभाव, धीमी पुलिस जाँच में अभियुक्तों को सज़ा नहीं मिल पाती है। बहुत-सी महिलाएँ ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट भी कराने से कतराती हैं। भारतीय महिलाओं में इस तरह की घटनाओं को छुपाने की प्रवृति होती है क्योंकि इससे उनका और उनके परिवार का सम्मान जुड़ा होता है।

अभी तक ऐसा होता था कि पुरुष वकील बलात्कार की शिकार किसी महिला को डराने और धमकाने में कामयाब हो जाते थे, अब महिला जज सहानुभूति वाला माहौल बनाने में मदद करेंगी। बलात्कार की शिकार कोई महिला अदालत में जिरह के दौरान अपने वकील को अपने साथ रख सकेगी। अभी तक ऐसा कैमरे के सामने होता था जिसमें असहजता होती थी।

बलात्कार की शिकार महिला को महिला वकील देने का प्रावधान किया जा रहा है क्योंकि सिर्फ महिला ही एक महिला को सही तरह से समझ सकती है। अगर कोई महिला चाहे तो अपनी पसंद का वकील चुन सकती है। अभी तक सिर्फ सरकारी वकील ही ऐसे मामलों में जिरह करते थे। साथ ही ऐसे मामलों में गवाहों के ब्य़ान पुलिस के सामने देने की प्रथा भी बंद करने का प्रस्ताव किया गया है।

बलात्कार पर कानून
(धारा 375, 376, 376क, 376ख, 376ग, 376घ भारतीय दंड संहिता)

धारा 375 भारतीय दंड संहिता:- जब कोई पुरुष किसी स्त्री के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध सम्भोग करता है तो उसे बलात्कार कहते हैं। सम्भोग का अर्थ – पुरुष के लिंग का स्त्री की योनि में प्रवेश होना ही सम्भोग है। किसी भी कारण से सम्भोग क्रिया पूरी हुई हो या नहीं वह बलात्कार ही कहलायेगा। बलात्कार तब माना जाता है यदि कोई पुरुष किसी स्त्री साथ निम्नलिखित परिस्थितियों में से किसी भी परिस्थिति में मैथुन करता है वह पुरुष बलात्कार करता है, यह कहा जाता है-
-उसकी इच्छा के विरुद्ध
-उसकी सहमति के बिना
-उसकी सहमति डरा धमकाकर ली गई हो
-उसकी सहमति नकली पति बनकर ली गई हो जबकि वह उसका पति नहीं है
-उसकी सहमति तब ली गई हो जब वह दिमागी रूप से कमजोर या पागल हो
-उसकी सहमति तब ली गई हो जब वह शराब या अन्य नशीले पदार्थ के कारण होश में नहीं हो
-यदि वह 16 वर्ष से कम उम्र की है, चाहे उसकी सहमति से हो या बिना सहमति के
-15 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ पति द्वारा किया गया सम्भोग भी बलात्कार है

धारा 376 भारतीय दंड संहिता:-
धारा 376 बलात्संग के लिए दण्ड का प्रावधान बताती है। इसके अन्तर्गत बताया गया है कि (1) द्वारा उपबन्धित मामलों के सिवाय बलात्संग करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिनकी अवधि सात वर्ष से कम नहीं होगी, किन्तु जो आजीवन के लिए दस वर्ष के लिए हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा, किंन्तु यदि वह स्त्री जिससे बलात्संग किया गया है, उसकी पत्नी है और बारह वर्ष से कम आयु की नहीं है तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी अथवा वह जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जाएगा। परंतु न्यायालय ऐसे पर्याप्त और विशेष कारणों से जो निर्णय में उल्लिखित किए जाएंगे, सात वर्ष से कम की अवधि के कारावास का दण्ड दे सकेगा।

बलात्कार केस जिनमें अपराध साबित करने की जिम्मेदारी दोषी पर हो न कि पीडि़त स्त्री पर। यानि वे केस जिनमें दोषी व्यक्ति होने को अपने निर्दोष होने का सबूत देना हो।

उपधारा (2) के अन्तर्गत बताया गया है कि जो कोई
-पुलिस अधिकारी होते हुए- उस पुलिस थाने की सीमाओं के भीतर जिसमें वह नियक्त है, बलात्संग करेगा, या किसी थाने के परिसर में चाहे वह ऐसे पुलिस थाने में, जिसमें वह नियुक्त है, स्थित है या नहीं, बलात्संग करेगा या अपनी अभिरक्षा में या अपने अधीनस्थ किसी पुलिस अधिकारी की अभिरक्षा में किसी स्त्री से बलात्संग करेगा, या

– लोक सेवक होते हुए, अपनी शासकीय स्थिति का फायदा उठाकर किसी ऐसी स्त्री से, जो ऐसे लोक सेवक के रूप में उसकी अभिरक्षा में या उसकी अधीनस्थ किसी लोक सेवक की अभिरक्षा में है, बलात्संग करेगा, या

– तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा यह उसके अधी स्थापित किसी जेल, प्रतिप्रेषण गृह या अभिरक्षा के अन्य स्थान के या स्त्रियों या बालकों की किसी संस्था के प्रबंध या कर्मचारीवृंद में होते हुए अपनी शासकीय स्थिति का फायदा उठाकर ऐसी जेल, प्रतिपे्रषण गृह स्थान या संस्था के किसी निवासी से बलात्संग करेगा, या

– किसी अस्पताल के प्रबंध या कर्मचारीवृंद में होते हुए अपनी शासकीय स्थिति का लाभ उठाकर उस अस्पताल में किसी स्त्री से बलात्संग करेगा,या(ड.)किसी स्त्री से, यह जानते हुए कि वह गर्भवती है, बलात्संग करेगा या
– किसी स्त्री से, जो बारह वर्ष से कम आयु की है, बलात्संग करेगा या
– सामूहिक बलात्संग करेगा।
– जब गर्भवती महिला के साथ बलात्संग किया गया हो

वह कठोर कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष से कम नहीं होगी, किन्तु जो आजीवन हो सकेगी दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। परंतु न्यायालय ऐसे पर्याप्त और विशेष कारणों से, जो निर्णय में उल्लिखित किये जाऐंगे, दोनों में से किसी भांति के कारावास को, जिसकी अवधि दस वर्ष से कम की हो सकेगी दण्ड दे सकेगा।

धारा 376 (क) भारतीय दंड संहिता :-
पृथक रहने के दौरान किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ सम्भोग करने की दशा में वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।

धारा 376 (ख) भारतीय दंड संहिता :-
लोक सेवक द्वारा अपनी अभिरक्षा में किसी स्त्री के साथ सम्भोग करने की दशा में जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की ही हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

धारा 376 ग भारतीय दंड संहिता :-
जेल, प्रतिप्रेषण गृह आदि के अधीक्षक द्वारा सम्भोग की स्थिति में वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

धारा 376 घ भारतीय दंड संहिता :- अस्पताल के प्रबंधक या कर्मचारीवृन्द आदि के किसी सदस्य द्वारा उस अस्पताल में किसी स्त्री के साथ सम्भोग करेगा तो वह दोनों में किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

धारा 377 भारतीय दंड संहिता:- प्रकृति विरुद्ध अपराध के बारे में है जो यह बताती है कि जो कोई किसी पुरुष, स्त्री या जीव वस्तु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध स्वेच्छया इन्द्रिय-भोग करेगा, वह आजीवन कारावास से या दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

बलात्कार से पीडि़त स्त्री को कौन सी सावधानियां बरतनी चाहिए ताकि वो न्याय प्राप्त कर सकें :-
– अपने परिवार वालों या दोस्तों को बतायें
-नहाए नहीं
-वह कपड़े जिनमें बलात्कार हुआ है, उन्हें धोए नहीं। यह सब करने से शरीर या कपड़ों पर होने वाले महत्वपूर्ण सबूत मिट जाएँगे।
-बलात्कारी का हुलिया याद रखने की कोशिश करें।
-तुरंत पुलिस में प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफ.आई.आर.) लिखवाएं। एफ.आई.आर. लिखवाते वक्त परिवार वालों को साथ ले जाएँ। घटना की जानकारी विस्तार से रिपोर्ट में लिखवाएँ।
-एफ.आई.आर. में यह बात जरुर लिखवाएँ कि जबरदस्ती(बलात्कार) सम्भोग हुआ है।
-यदि बलात्कारी का नाम जानती है, तो पुलिस को अवश्य बताएं।
-यह उस स्त्री का अधिकार है कि एफ.आई.आर. की एक कापी उसे मुफ्त दी जाए।
-यह पुलिस का कर्तव्य है कि वह स्त्री की डॉक्टरी जांच कराए।
-डॉक्टरी जांच की रिपोर्ट की कापी जरुर लें।

-पुलिस जांच के लिए स्त्री के कपड़े लेगी, जिस पर बलात्कारी पुरुष के वीर्य, खून, बाल इत्यादि हो सकते हैं। पुलिस स्त्री के सामने उन कपड़ों को सील-बंद करेगी। उन सील बंद कपड़ों की रसीद जरुर लें।
-कोर्ट में बलात्कार का केस बंद कमरे में चलता है यानि कोर्ट में केवल केस से संबंधित व्यक्ति ही उपस्थित रह सकते हैं।
-पीडि़त स्त्री की पहचान को प्रकाश में लाना अपराध है।
-पीडि़त स्त्री का पूर्व व्यवहार नहीं देखा जाना चाहिए।

अगर पुलिस एफ.आई.आर. लिखने से मना कर दे, तो आप निम्न जगहों पर शिकायत कर सकते हैं :-
-कलेक्टर
-स्थानीय या राष्ट्रीय समाचार पत्र
-राष्ट्रीय महिला आयोग
कानून बलात्कार से पीडि़त महिला को क्रिमिनल इज्यूरीस कंपन्सेशन बोर्ड के द्वारा आर्थिक मुआवजा भी दिलवाता है।
अन्य यौन अपराध से सम्बंधित कानून
धारा 354 भारतीय दंड संहिता (स्त्री की मर्यादा को क्षति पहुंचाने के लिए हमले या जबरदस्ती का इस्तेमाल)

यदि कोई व्यक्ति किसी महिला की मर्यादा को भंग करने के लिए उस पर हमला या जबरदस्ती करता है, तो उसे दो साल तक की कैद या जुर्माना या दोनों की सजा होगी।

अपहरण पर कानून (धारा 363 क भारतीय दंड संहिता)
अपहरणः किसी नाबालिग लड़के, जिसकी उम्र सोलह साल से कम है या नाबालिग लड़की, जिसकी उम्र अट्ठारह साल से कम है, को उसके सरंक्षक की आज्ञा के बिना कहीं ले जाना अपहरण का अपराध है तथा इसके लिए अपराधी को सात साल की कैद और जुर्माना हो सकता है। अगर कोई बहला फुसला कर भी बच्चों को ले जाए तो कहने को तो बच्चा अपनी मर्जी से गया, लेकिन कानून में वह अपराध होगा।
व्यपहरण पर कानून
(धारा 362, 364, 364क, 365, 366, 367, 369 भारतीय दंड संहिता)

व्यपहरणः- किसी बालिग व्यक्ति को जोर जबरदस्ती से या बहला फुसला कर किसी कारण से कहीं ले जाया जाए तो यह व्यपहरण का अपराध है। यह कारण निम्नलिखित हो सकते है। जैसेः- फिरौती की रकम के लिए, उसे गलत तरीके से कैद रखने के लिए, उसे गंभीर चोट पहुँचाने के लिए, उसे गुलाम बनाने के लिए इत्यादि।

धारा 366 भारतीय दंड संहिता :- धारा के अन्तर्गत विवाह आदि के करने को विवश करने के लिए किसी स्त्री को अपहृत करना या उत्प्रेरक करने के बारे में बताया गया है। इसमें बताया गया है कि जो कोई किसी स्त्री का अपहरण या व्यपहरण उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी व्यक्ति से विवाह करने के लिए उस स्त्री को विवश करने के आशय से या यह विवश की जायेगी, यह सम्भाव्य जानते हुए अथवा आयुक्त सम्भोग करने के लिए उस स्त्री को विवश, यह विलुब्ध करने के लिए, यह सम्भाव्य जानते हुए करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिनकी अवधि दस वर्ष तक से भी दण्डनीय होगी

अनैतिक व्यापार पर कानून
(धारा 366 क, 366ख, 372, 373 भारतीय दंड संहिता)

अनैतिक व्यापार :- यदि कोई व्यक्ति किसी भी लड़की को वेश्यावृति के लिए खरीदता या बेचता है तो उसे दस साल तक की कैद और जुर्माना की सजा होगी।

अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम, 1956
यदि कोई व्यक्ति वेश्यावृति के लिए किसी व्यक्ति को खरीदता बेचता, बहलाता फुसलाता या उपलब्ध करवाता है तो उसे तीन से चौदह साल तक की कैद और जुर्माने की सजा होगी।

धारा 366 क भारतीय दंड संहिता :- धारा 366 क के अन्तर्गत अप्राप्त लड़की को उपादान के बारे में बताया गया है। इसके अन्तर्गत कहा गया है कि जो कोई अठारह वर्ष से कम आयु की अप्राप्तवय लड़की को, अन्य व्यक्ति से आयुक्त संभोग करने के लिए विवश या विलुब्ध करने के आशय से या तद्द्वारा विवश या विलब्ध किया जाएगा, यह सम्भाव्य जानते हुए ऐसी लड़की को किसी स्थान से जाने को कोई कार्य करने को, किसी भी साधन द्वारा उत्प्रेरित करेगा, वह कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेञ्गी दण्डित किया जाएगा और जुर्माना से भी दण्डनीय होगा।

धारा 366 ख भारतीय दंड संहिता :- धारा 366 (ख) के अन्तर्गत विदेश से लड़की को आयात करने के बारे में बताया गया है कम आयु की किसी लड़की का भारत के बाहर उसके किसी देश से या जम्मू-कश्मीर से आयात उसे किसी अन्य व्यक्ति से आयुक्त संभोग करने के लिए विवश या विलुब्ध करने के आशय से या तद्द्वारा विवश या विलुब्ध की जाएगी, यह सम्भाव्य जानते हुए करेगा, वह कारवास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

धारा 372 भारतीय दंड संहिता :- वेश्यावृत्ति आदि के प्रयोजन के लिए अप्राप्तवय को बेचने के बारे में प्रावधान करती है। इसके अंतर्गत बताया गया है कि जो कोई 18 वर्ष से कम आयु के किसी व्यक्ति को इस आशय से कि ऐसा व्यक्ति से आयुक्त संभोग करने के लिए या किसी विधि विरुद्ध या दुराचारिक प्रयोजन के लिए कम में लाया या उपयोग किया जाए या यह सम्भाव्य जानते हुए कि ऐसा व्यक्ति किसी आयु में भी ऐसे किसी प्रयोजन के लिए काम में लाया जाएगा, या उपभोग किया जाएगा, बेचेगा, भाड़े पर देगा या अन्यथा व्ययनित करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

(6 धारा के अन्तर्गत 2 स्पष्टीकरण दिये गये हैं।स्पष्टीकरण 1 के अन्तर्गत बताया गया है कि जबकि अठारह वर्ष से कम आयु की नारी किसी वेश्या को, या किसी अन्य व्यक्ति को, जो वेश्यागृह चलाता हो या उसका प्रबंध करता हो, बेची जाए, भाड़े पर दी जाए या अन्यथा व्ययनित की जाए, तब इस प्रकार ऐसी नारी को व्ययनित करने वाले व्यक्ति के बारे में,जब तक कि तत्प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए, यह उपधारणा की जाएगी कि उसने उसको इस आशय से व्ययनित किया है कि वह वेश्यावृत्ति के उपभोग में लाई जाएगी। स्पष्टीकरण -2 के अन्तर्गत आयुक्त सम्भोग से इस धारा के प्रयोजनों के लिए ऐसे व्यक्तियों में मैथुन अभिप्रेत है जो विवाह से संयुक्त नहीं है, या ऐसे किसी सम्भोग या बंधन से संयुक्त नहीं कि जो यद्यपि विवाह की कोटि में तो नहीं आता तथापि इस समुदाय की, जिसके वे हैं या यदि वे भिन्न समुदायों के हैं, जो ऐसे दोनों समुदायों की स्वीय विधि या रूञ्ढि़ द्वारा उनके बीच में विवाह सदृश्य सम्बन्ध अभिसात किया जाता है।

धारा 373 भारतीय दंड संहिता :-
वेश्यावृत्ति के प्रयोजन के लिए अप्राप्वय का खरीदना आदि के बारे में हैं जो कोई अठारह वर्ष में कम आयु के किसी व्यक्ति को इस आशय के बारे में है कि ऐसा व्यक्ति किसी आयु में भी वेश्यावृत्ति या किसी व्यक्ति से आयुक्त सम्भोग करने के लिए या किसी विधि विरुद्ध दुराचारिक प्रयोजन के लिए काम में लाया या उपयोग किया जाए या यह सम्भाव्य जानते हुए कि ऐसा व्यक्ति किसी आयु में भी ऐसे किसी प्रयोजन के लिए काम में लाया जाएगा या उपभोग किया जाएगा, खरीदेगा, भाड़े पर लेगा या अन्यथा उसका कब्जा अभिप्रेत करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। इस धारा के स्पष्टीकरण के अन्तर्गत बताया गया है कि अठारह वर्ष से कम आयु की नारी को खरीदने वाला, भाड़े पर लेने वाला या अन्यथा उसका कब्जा करने वाले तत्प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए, यह उपधारणा की जाएगी कि ऐसी नारी का कब्जा उसने इस आशय से अभिप्रेत किया है कि वह वेश्यावृत्ति के प्रयोजनों के लिए उपभोग में लायी जाएगी।
छेड़खानी पर कानून
(धारा 509,294, भारतीय दंड संहिता)

शब्द, इशारा या मुद्रा जिससे महिला की मर्यादा का अपमान हो- यदि कोई व्यक्ति किसी स्त्री की मर्यादा का अपमान करने की नीयत से किसी शब्द का उच्चारण करता है या कोई ध्वनि निकालता है या कोई इशारा करता है या किसी वस्तु का प्रदर्शन करता है, तो उसे एक साल तक की कैद या जुर्माना या दोनों की सजा होगी।

अश्लील मुद्रा, इशारे या गाने
यदि कोई व्यक्ति दूसरों को परेशान करते हुए सार्वजनिक स्थान पर या उसके आस-पास कोई अश्लील हरकत करता है या अश्लील गाने गाता, पढ़ता या बोलता है, तो उसे तीन महीने कैद या जुर्माना या दोनों की सजा होगी।

स्त्री के अभद्र रूप से प्रदर्शन पर कानून
(स्त्री अशिष्ट् रूप (प्रतिशेध) अधिनियम 1986)

स्त्री का अभद्र रूप या चित्रांकनः यदि कोई व्यक्ति विज्ञापनों, प्रकाशनों, लेखों, तस्वीरों, आकृतियों द्वारा या किसी अन्य तरीके से स्त्री का अभद्र रूपण या प्रदर्शन करता है तो उसे दो से सात साल की कैद और जुर्माने की सजा होगी।
कार्यस्थल पर यौन शोषण पर कानून
(उच्चतम न्यायालय का विशाखा निर्णय, 1997)

-कार्यस्थल पर किसी भी तरह के यौन शोषण जैसे शारीरिक छेड़छाड़, यौन संबंध की माँग या अनुरोध, यौन उत्तेजक कथनों का प्रयोग, अश्लील तस्वीर का प्रदर्शन या किसी भी अन्य प्रकार का अनचाहा शारीरिक, शाब्दिक, अमौखिक आचरण जो अश्लील प्रकृति का हो, की मनाही है।
-यह कानून उन सभी औरतों पर लागू होता है, जो सरकारी, गैर सरकारी, पब्लिक, सार्वजनिक या निजी क्षेत्र में कार्य करती हैं।
-पीडि़त महिला को न्याय दिलाने के लिए हर संस्था/दफ्तर में एक यौन शोषण शिकायत समिति का गठन होना आवश्यक है। इस समिति की अध्यक्ष एक महिला होनी चाहिए। इसकी पचास प्रतिशत सदस्य महिलाएं होनी चाहिए तथा इसमें कम से कम एक बाहरी व्यक्ति को सदस्य होना चाहिए।

महिलाओं को भी है पुरुषों के बराबर अधिकार

महिलाएं अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल नहीं कर पातीं है, अदालत जाना तो दूर की बात है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि महिलाएं खुद को इतना स्वतंत्र नहीं समझतीं कि इतना बड़ा कदम उठा सकें। जो किसी मजबूरी में (या साहस के चलते) अदालत जा भी पहुंचती हैं, उनके लिए कानून की पेंचीदा गलियों में भटकना आसान नहीं होता।

दूसरे, इसमें उन्हें किसी का सहारा या समर्थन भी नहीं मिलता। इसके कारण उन्हें घर से लेकर बाहर तक विरोध के ऐसे बवंडर का सामना करना पड़ता है, जिसका सामना अकेले करना उनके लिए कठिन हो जाता है।

इस नकारात्मक वातावरण का सामना करने के बजाए वे अन्याय सहते रहना बेहतर समझती हैं। कानून होते हुए भी वे उसकी मदद नहीं ले पाती हैं। आमतौर पर लोग आज भी औरतों को दोयम दर्जे का नागरिक ही मानते हैं। कारण चाहे सामाजिक रहे हों या आर्थिक, परिणाम हमारे सामने हैं। आज भी दहेज के लिए हमारे देश में हजारों लड़कियाँ जलाई जा रही हैं। रोज न जाने कितनी ही लड़कियों को यौन शोषण की शारीरिक और मानसिक यातना से गुजरना पड़ता है। कितनी ही महिलाएँ अपनी संपत्ति से बेदखल होकर दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

महिलाएँ अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल नहीं कर पातीं, अदालत जाना तो दूर की बात है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि महिलाएँ खुद को इतना स्वतंत्र नहीं समझतीं कि इतना बड़ा कदम उठा सकें।
महिला श्रमिकों का गाँव से लेकर शहरों तक आर्थिक व दैहिक शोषण होना आम बात है। अगर इन अपराधों की सूची तैयार की जाए तो न जाने कितने पन्ने भर जाएँगे। ऐसा नहीं है कि सरकार को इन अत्याचारों की जानकारी नहीं है या फिर इनसे सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं है। जानकारी भी है और कानून भी हैं, मगर महत्वपूर्ण यह है कि इन कानूनों के बारे में आम महिलाएँ कितनी जागरूक हैं? वे अपने हक के लिए इन कानूनों का कितना उपयोग कर पाती हैं?

सब यह जानते हैं कि संविधान ने महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि कानून के सामने स्त्री और पुरुष दोनों बराबर हैं। अनुच्छेद 15 के अंतर्गत महिलाओं को भेदभाव के विरुद्ध न्याय का अधिकार प्राप्त है। संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों के अलावा भी समय-समय पर महिलाओं की अस्मिता और मान-सम्मान की रक्षा के लिए कानून बनाए गए हैं, मगर क्या महिलाएँ अपने प्रति हो रहे अन्याय के खिलाफ न्यायालय के द्वार पर दस्तक दे पाती हैं?

साक्षरता और जागरूकता के अभाव में महिलाएँ अपने खिलाफ होने वाले अन्याय के विरुद्ध आवाज ही नहीं उठा पातीं। शायद यही सच भी है। भारत में साक्षर महिलाओं का प्रतिशत 54 के आसपास है और गाँवों में तो यह प्रतिशत और भी कम है। तिस पर जो साक्षर हैं, वे जागरूक भी हों, यह भी कोई जरूरी नहीं है। पुराने संस्कारों मेंजकड़ी महिलाएँ अन्याय और अत्याचार को ही अपनी नियति मान लेती हैं और इसीलिए कानूनी मामलों में कम ही रुचि लेती हैं।

हमारी न्यायिक प्रक्रिया इतनी जटिल, लंबी और खर्चीली है कि आम आदमी इससे बचना चाहता है। अगर कोई महिला हिम्मत करके कानूनी कार्रवाई के लिए आगे आती भी है, तो थोड़े ही दिनों में कानूनी  प्रक्रिया की जटिलता के चलते उसका सारा उत्साह खत्म हो जाता है। अगर तह में जाकर देखें तो इस समस्या के कारण हमारे सामाजिक ढाँचे में भी नजर आते हैं। महिलाएँ लोक-लाज के डर से अपने दैहिक शोषण के मामले कम ही दर्ज करवाती हैं। संपत्ति से जुड़े हुए मामलों में महिलाएँ भावनात्मक होकर सोचती हैं।

वे अपने परिवार वालों के खिलाफ जाने से बचना चाहती हैं, इसीलिए अपने अधिकारों के लिए दावा नहीं करतीं। लेकिन एक बात जान लें कि जो अपनी मदद खुद नहीं करता, उसकी मदद ईश्वर भी नहीं करता अर्थात अपने साथ होने वाले अन्याय, अत्याचार से छुटकारा पाने के लिए खुद महिलाओं को ही आगे आना होगा। उन्हें इस अत्याचार, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठानी होगी।

साथ ही समाज को भी महिलाओं के प्रति अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाना होगा। वे भी एक इंसान हैं और एक इंसान के साथ जैसा व्यवहार होना चाहिए वैसा ही उनके साथ भी किया जाए तो फिर शायद वे न्यायपूर्ण और सम्मानजनक जीवन जी सकेंगी।