Tuesday, October 9, 2018

“मेरा पति मेरा गर्भपात कराना चाहता है ताकि उसे यौन संबंध बनाने में दिक्कत ना हो”

“मैं सरकारी नौकरी करती हूं और मेरी शादी के दस महीने हो गए हैं। हर लड़की की चाहत होती है कि शादी के बाद एक दिन वो भी माँ बने। शादी से पहले मैं भी ऐसा सपना देखती थी, लेकिन मेरे पति ने सारे अरमानों पर पानी फेर दिया। दरअसल उसे कॉन्डम के साथ मज़ा नहीं आता है और इसलिए मैं अकसर गोलियां खाया करती थी। गोलियों से मेरी तबियत खराब हो जाती थी, इसलिए मैंने गोलियां लेनी बंद कर दी। पांच महीने हो चुके हैं मैं गर्भवती हूं और मेरे पति लगातार मुझे गर्भपात के लिए कहते रहते हैं। लेकिन मुझे यह हत्या लगता है, इसलिए मैंने साफ तौर पर मना कर दिया है।

मेरा पति गर्भपात इसलिए करवाना चाहता है ताकि उसे सेक्स करने में कोई परेशानी ना हो। एक तो मैं सुबह से लेकर शाम तक ऑफिस में होती थी और जब घर लौटती थी तब पॉर्न फिल्मों से प्रेरित होकर मेरा पति मेरी जान निकाल देता था।
मैंने कई बार उसे मना किया लेकिन वो सुनने वालों में से कहां था। उसे तो सुबह से लेकर शाम तक बस सेक्स ही चाहिए था। मैंने जब कहा कि मैं गर्भवती हूं तब उसने मुझे बहुत मारा और वो भी पेट पर ताकि मेरा बच्चा मर जाए। क्योंकि उसके लिए हमारा बच्चा तो सेक्स करने में बाधा बन रहा था ना।
अगले दिन जब मुझे काफी ब्लीडिंग हुई तब लगा कि मेरा बच्चा मर चुका होगा। एक दिन फिर जब मैंने मना किया तब उसने चाय बनाने वाली बर्तन से मेरे सर पर तब तक मारा जब तक वो लगभग टूट ना गया और उसका निशाना फिर से मेरे पेट में पल रहा उसका बच्चा था। उसने दो चार लात पेट पर लगा ही दी। मैं तीन महीने में तीन बार अल्ट्रासाउंड करवा चुकी हूं, यह जानने के लिए कि मेरा बच्चा ज़िन्दा है भी या नहीं। यूं तो रोज़ मैं बलात्कार का शिकार होती हूं। इतना डरती हूं कि रात-रात भर जागी रहती हूं, क्या पता वो मुझे सोते हुए कहीं मार ना दें।
लेकिन मां-बाबूजी कहते हैं कि समाज क्या कहेगा, थोड़ा एडजस्ट करो। उन्हें समाज की चिंता है और मुझे उनके मान-सम्मान की। शादी से पहले जब भी मैं कोई रोमांटिक सीन देखती थी तब मुझे अच्छा लगता था, लेकिन आज सेक्स मेरे लिए अत्याचार से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
मेरे सास-ससुर कहते हैं कि मैं औरत हूं और औरतों की ज़िन्दगी ऐसी ही होती है। अगर यह बात सच है तब निःसंदेह मुझे ऐसी ज़िन्दगी नहीं चाहिए। मैं समाज से पूछना चाहती हूं कि क्या मेरे सास की ज़िन्दगी भी ऐसी थी।
वो कहता हैं मैं कोल्ड हूं, मैं ‘टर्न ऑन’ नहीं होती। क्या मैं मशीन हूं जिसे आप जब चाहे बटन दबाकर ‘टर्न ऑन’ कर सकते हैं। मेरा कोई दोस्त नहीं है और खासकर लड़का तो और भी नहीं, क्योंकि मेरे पति को लड़कों से मेरा बात करना पसंद नहीं है। हां, उसकी कोई गर्लफ्रेंड ज़रूर थी जिनसे उसकी आज भी बातचीत होती है। मैं उसके पिछले रिश्ते पर ध्यान नहीं देती क्योंकि मुझे पता है समय के साथ वो खत्म हो जाएगा। अब मैं अपने बच्चे को बचाने में लगी रहती हूं।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि मेरे चोट के निशान के बारे में जब भी ऑफिस की एक महिला साथी पूछती है, तब मैं यहीं कहती हूं कि बाथरूम में गिर गई थी और वो मुस्कुराते हुए कहती हैं कि मैं भी लगभग रोज़ बाथरूम में गिर जाती थी। वो ये कहकर चली जाती है कि जब औरत बाथरूम में गिरने लगे तब समझ लेना उसकी शादी कभी नहीं टूटेगी, जैसे उनकी आज तक नहीं टूटी। मैं यह सुनकर खौफज़दा हो जाती हूं कि क्या समाज का मान रखने के लिए मुझे इसकी आदत लगानी पड़ेगी।
मैं हमेशा सोचती रहती हूं कि आत्महत्या कर लूं, लेकिन गर्भवती होने की वजह से अब तो आत्महत्या भी नहीं कर सकती। पढ़ी लिखी होने के बाद भी अगर मेरे साथ ऐसी चीज़ें हो सकती हैं, फिर उन औरतों का क्या होता होगा जो मेरी तरह नहीं है।
मैं रोज़ मरती हूं लेकिन जीना अब मेरी मजबूरी बन गई है। मृत्यु स्वतंत्रता जैसी लगती है। शादी तोड़ना चाहती हूं, लेकिन क्या यह समाज कभी सोचेगा कि मैं अकेले एक स्वतंत्र महिला के रूप में जीवन जी सकती हूं।
क्या ‘समय’ मेरी आत्मा पर लगे घाव भी भर देगा? वो लातें जो मेरे पेट पर लगी थीं वो असल में पेट नहीं आत्मा पर घाव कर गई थी।मेरे आत्मसम्मान की धज्जियां उड़ गई।
हम सब गर्व करते हैं कि ये महान, वो महान और अंत में कहते हैं कि मेरा भारत महान। जिस महान देश में मेरे जैसी औरतों का ये हाल हो, वैसी महानता किस काम की। मेरा ईश्वर पर से विश्वास उठ गया है क्योंकि मेरा पति परमेश्वर है। भगवानों में श्रेष्ठ! श्रेष्ठ का ही जब हाल ऐसा हो, तब उसके नीचे वाले क्या करते होंगे, सोचकर ही रूह कांप जाती है।
आपके कई लेख यूथ की आवाज़ पर पढ़ने के बाद दिल में एक उम्मीद जगी। आप कुछ कर नहीं सकते, कम-से-कम समझ तो सकते हो। हर कोई मुझे एडजस्ट करने ही कहता है। अब आप बताएं एडजस्मेंट तो ज़िन्दगी से किया जाएगा ना, मृत्यु से कोई कैसे एडजस्ट करे? मैं अपना नाम भी नहीं बता रही क्योंकि मैं पहचान, अस्मिता सब कुछ खो चुकी हूं। मेरा गुमनाम हो जाना ही मेरे अच्छे औरत होने की निशानी है।”

Tuesday, October 2, 2018

पहले बने आदर्श पति और सास फिर मिलेगी आदर्श बह

अगर ससुराल का हर व्यक्ति अपनी भूमिका को आदर्श तरीके से निभाये और आने वाली बहू से स्नेह, सहयोग और सम्मान का व्यवहार करे तो ये लगभग सुनिश्चित है कि बहू भी आदर्श भूमिका निभाने को तैयार रहेगी.
भोपाल का बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय 3 महीने का एक कोर्स शुरू करने जा रहा है, जिसमें लड़कियों को ये सिखाया जाएगा कि कैसे आदर्श बहू बनें. कोर्स की समाप्ति पर सर्टिफिकेट भी मिलेगा. विश्वविद्यालय के उप कुलपति डी सी गुप्ता का कहना है कि सास-बहू के झगड़े को रोकने के इरादे से ये कोर्स शुरू किया जा रहा है. विश्वविद्यालय का यह भी कहना है कि इससे महिला सशक्तिकरण को बल मिलेगा.
आदर्श बहू, भोपाल, मध्य प्रदेशमध्य प्रदेश के भोपाल में एक यूनिवर्सिटी आदर्श बहू बनाने का कोर्स शुरू कर रही है.
दरअसल, भारतीय समाज में विवाह एक ऐसा संस्थान है, जिसके सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पहलू हैं. पश्चिमी समाज की तरह हमारे यहां विवाह दो व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि 2 परिवारों के बीच होता है. शादी होते ही एक लड़की के लिए पत्नी, बहू, भाभी जैसे तमाम रोल तय हो जाते हैं और उससे जुड़ी भूमिकाएं और उम्मीदें भी. अब तो संयुक्त परिवार की परंपरा काफी कम हो गई है लेकिन अभी भी शादी के बाद बहू को पति के अलावा सास-ससुर, देवर और ननद के साथ काफी वक्त बिताना पड़ता है. किसी भी परिवार में सास-बहू के बीच अक्सर विवाद के मामले सामने आते रहते हैं. सास को लगता है कि बहू अपनी जिम्मेदारी को ठीक से नहीं निभा रही तो बहू महसूस करती है कि सास से उसे स्नेह और सहयोग नहीं मिल रहा है, जिससे अक्सर परिवार में तनाव बना रहता है. टीवी पर आने वाले तमाम सीरियल तो इसी विषय पर आधारित होते हैं.
दरअसल सास और बहू दो अलग-अलग पीढियों से आती हैं और अक्सर दोनों एक दूसरे को उनके नजरिये से देखने समझने की शायद कोशिश नहीं करते हैं. लेकिन इस मामले में मैं व्यक्तिगत तौर पर महसूस करता हूं कि सबसे ज्यादा जिम्मेदारी सास या ससुराल पक्ष की होती है. एक लड़की की शादी होकर जब वो अपने ससुराल आती है तो उससे उम्मीद की जाती है कि वो पत्नी, बहू, भाभी जैसी तमाम रिश्तों को बहुत खूबसूरती से और आदर्श तरीके से निभाए. नई दुल्हन के लिए हालात काफी मुश्किल होते हैं. उसके लिए माहौल, घर के लोग, उनका स्वभाव, खान-पान की आदत सब कुछ नया होता है. कई बार जिस माहौल में उसने अपने जीवन के 25-30 साल गुजारे होते हैं वो काफी अलग होता है इसलिये उसे तालमेल बैठाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.
मेरा मानना है कि किसी भी नई दुल्हन को आदर्श बहू बनाने की जिम्मेदारी ससुराल वालों से शुरू होती है. अगर एक अकेली बहू से परिवार के 6-8 लोगों को खुश रखने की उम्मीद की जा सकती है वो भी एक नए माहौल में तो पति और सास सहित परिवार के 6-8 लोग मिलकर एक नई बहू को प्यार और सम्मान देकर खुश क्यों नहीं रख सकते? उम्र में बड़े और जीवन का ज्यादा अनुभव रखने वाले सास और ससुर क्या बहू से आदर्श व्यवहार की उम्मीद रखने से पहले खुद आदर्श सास-ससुर बनने को तैयार हैं. क्या सास ने अपने लड़के की परवरिश इस तरह की है कि वो एक आदर्श पति की भूमिका निभा सके? अगर ससुराल का हर व्यक्ति अपनी भूमिका को आदर्श तरीके से निभाये और आने वाली बहू से स्नेह, सहयोग और सम्मान का व्यवहार करे तो ये लगभग सुनिश्चित है कि बहू भी आदर्श भूमिका निभाने को तैयार रहेगी, और ऐसे किसी कोर्स की जरूरत नहीं होगी, अन्यथा आदर्श बहू के साथ आदर्श सास और आदर्श पति के कोर्स भी चलाने चाहिए.

Adultery Law: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साइड इफेक्ट आने लगे है

ऐसी बहुत सी महिलाएं हैं जो व्यभिचारी पति से तलाक नहीं लेना चाहतीं. तलाक भी वही ले सकती हैं जो सक्षम हैं, पढ़ी-लिखी हैं, आत्मनिर्भर हैं या फिर मायके वालों का पूरा सपोर्ट है. लेकिन जिनके पास ऐसा कुछ भी नहीं वो क्या करें?

जिस दिन सुप्रीम कोर्ट ने एडल्टरी लॉ पर फैसला सुनाया, ये बात उसी दिन पक्की हो गई थी कि आने वाला समय जो दिखाने वाला है उसके लिए हम सबको तैयार रहना चाहिए. हमारी या आपकी जिंदगियों पर सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला असल भले ही नहीं डालता हो लेकिन Adultery Law को खत्म करके उन लोगों की आंखों में चमक जरूर आ गई थी जो विवाहेतर संबंधों में लिप्त थे.
इस फैसले के साइड इफेक्ट तो होंगे पर इतनी जल्दी सामने आएंगे ये सोचा नहीं था. चेन्नई में एक 24 साल की महिला ने आत्महत्या कर ली. वजह ये कि जब महिला को पति के किसी दूसरी औरत के साथ संबंधों का पता चला तो उसने पति को उससे दूरी बनाने के लिए कहा और धमकाया भी कि वो पुलिस में शिकायत करेगी. लेकिन पति जिसे अब कोई डर नहीं था उसने कहा कि चूंकि सुप्रीमकोर्ट ने कहा है कि व्यभिचार अपराध नहीं है इसलिए तुम मुझे किसी और महिला के साथ संबंध रखने के लिए रोक नहीं सकतीं. महिला क्या करती, उसने फांसी लगा ली. अपने सुसाइड नोट में उसने आत्महत्या का कारण भी यही लिखा है. इन दोनों ने दो साल पहले परिवार के खिलाफ जाकर लव मैरिज की थी, एक बच्चा भी है. लेकिन पत्नी को टीबी हो गई जिसकी वजह से पति उससे दूर रहने लगा था. पति सिक्योरिटी गार्ड है. अब चूंकि सुसाइड नोट में कारण एडलटरी है, इसलिए पति पर आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा चलेगा.
adultery lawपत्नी जब अपने पति को रोक नहीं सकी तो आत्महत्या कर ली
पर अवैध संबंध अगर वैध करार दिए गए तो क्या इसका मतलब ये हुआ कि ये संबंध गर्व की बात है? इस फैसले से अवैध संबंधों की वजह से अब तक समाज से डर रहे लोग निडर हो गए, और इसीलिए खुलकर अपने संबंध स्वीकार करने लगे. लेकिन हमारा समाज इस लायक ही नहीं कि उसे भारी भरकम चीजें कानून के दायरे में रहकर समझाई जाएं. समाज के कुछ लोगों ने इस फैसले को अपना हक समझ लिया और विवाहेतर संबंधों को इस तरह लेने लगे जैसे वो संबंध सही हों.
सुप्रीम कोर्ट ने उन महिलाओं के हित में ये फैसला दिया था जो अपने व्यभिचारी पति के खिलाफ शिकायत नहीं कर सकती थीं. और इस बात को आधार बनाकर तलाक नहीं ले सकती थीं. लेकिन एडलटरी को असंवैधानिक कहने वाले सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से कुछ महिलाओं का तो अहित ही हुआ.
चेन्नई के इस मामले में वो महिला जो परिवार के खिलाफ जाकर शादी करती है. उसके एक बच्चा भी है, बीमारी की वजह से पति भी किसी दूसरी औरत के पास चला गया. ऐसी महिलाओं के पास सिवाए आत्महत्या के और चारा ही क्या बचता है. वो वापस मायके नहीं जा सकती, पति पर निर्भर है, पति को तलाक नहीं दे सकती, बच्चे को छोड़कर बाहर नौकरी नहीं कर सकती. ऐसी बहुत सी महिलाएं हैं जो तलाक नहीं लेना चाहतीं. तलाक भी वही ले सकती हैं जो सक्षम हैं, पढ़ी-लिखी हैं, आत्मनिर्भर हैं या फिर जिन्हें मायके वालों का पूरा सपोर्ट है. लेकिन जिनके पास ऐसा कुछ भी नहीं वो क्या करें?
कानून कहता है कि हिंदू धर्म में दो शादियां करना अवैध है, लेकिन पति कितने भी संबंध रख सकता है- वो वैध है. ये किस तरह का कानून है? मतलब पति अगर व्यभिचारी है तो पत्नी या तो पति को तलाक दे दे, या फिर खुद किसी के साथ संबंध बना ले या फिर आत्महत्या कर ले. यही बात अब पतियों पर भी लागू होती है.  
चेन्नई की ये घटना सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का वो परिणाम था, जो अच्छा नहीं था. और न जाने कितने मामले हम आने वाले समय में देखें. लेकिन एक बात तो है कि अब दो लोगों के बीच जन्मों का बंधन जिसे शादी कहा जाता है, उसकी कीमत और भी कम हो जाएगी. जाहिर है जब तलाक के मामले बढ़ेंगे तो शादियों की अहमियत खुद ब खुद घट जाएगी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर समाज खुद सोचे कि अवैध संबंधों को वैध करार देने से व्यभिचार नैतिक रूप से स्वीकार्य नहीं हो जाता. जिस बात पर शर्म आती थी उसे कम से कम बेशर्मी न बनाया जाए.

पति-पत्नी का प्रेम-👈 🤔 ✍ एक सत्य घटना, नैतिकता की पराकाष्ठा


एक सेठ जी थे उनके घर में एक गरीब आदमी काम करता था, जिसका नाम था रामलाल.
जैसे ही राम लाल के फ़ोन की घंटी बजी रामलाल डर गया. तब सेठ जी ने उससे पूछ ही लिया ??
"रामलाल तुम अपनी बीबी से इतना क्यों डरते हो?"
"मैं डरता नहीं सर, बस उसकी कद्र करता हूँ, उसका सम्मान करता हूँ." उसने जबाव दिया.
मैं हँसा और बोला- "ऐसा क्या है उसमें? ना सूरत अच्छी है और ना ही पढ़ी लिखी है."
जबाव मिला- "कोई फर्क नहीं पड़ता सर कि वह कैसी है पर मुझे सबसे प्यारा रिश्ता उसी का लगता है."
"जोरू का गुलाम।"  मेरे मुँह से निकला।"
"क्या और सारे रिश्ते कोई मायने नहीं रखते तेरे लिये?" मैंने पूछा.
उसने बहुत इत्मिनान से जबाव दिया-
"सर् जी माँ बाप रिश्तेदार नहीं होते वह तो भगवान होते हैं. उनसे रिश्ता नहीं निभाते उनकी पूजा करते हैं.
भाई बहन के रिश्ते जन्मजात होते हैं, दोस्ती का रिश्ता भी मतलब का ही होता है.
आपका मेरा रिश्ता भी जरूरत और पैसे का है पर पत्नी बिना किसी करीबी रिश्ते के होते हुए भी हमेशा के लिये हमारी हो जाती है, अपने माता-पिता के परिवार के सारे रिश्तों को पीछे छोड़ कर हमारे हर सुख दुख की सहभागी बन जाती है, आखिरी साँसो तक."
मैं अचरज से उसकी बातें सुन रहा था.
वह आगे बोला-"सर जी, पत्नी अकेला रिश्ता नहीं है, बल्कि वह तो पूरी की पूरी रिश्तों का भण्डार है.
जब वह हमारी सेवा करती है, हमारी देख भाल करती है, हमसे दुलार करती है तब वह एक माँ जैसी होती है.
जब वह हमें जमाने के उतार चढ़ाव से आगाह करती है, और जब मैं अपनी सारी कमाई उसके हाथ पर रख देता हूँ क्योंकि जानता हूँ कि वह हर हाल में मेरे घर का भला करेगी तब वह पिता जैसी होती है.
जब हमारा ख्याल रखती है, हमसे लाड़ करती है, हमारी गलती पर डाँटती है, हमारे लिये खरीदारी करती है तब वह बहन जैसी होती है.
जब हमसे नयी नयी फरमाईशें करती है, नखरे करती है, रूठती है, अपनी बात मनवाने की जिद करती है तब वह बेटी जैसी होती है.
जब हमसे सलाह करती है, मशवरा देती है ,परिवार चलाने के लिये नसीहतें देती है, झगडे़ करती है तब वह एक दोस्त जैसी होती है.
जब वह सारे घर का लेन देन, खरीददारी, घर चलाने की जिम्मेदारी उठाती है तो वह एक मालकिन जैसी होती है. और जब वही सारी दुनिमा को यहाँ तक कि अपने बच्चों को भी छोड़ कर हमारी बाहों में आती है
तब वह पत्नी, प्रेमिका, प्रेयसी, अर्धांगिनी, हमारी प्राण और आत्मा होती है जो अपना सब कुछ सिर्फ हम पर न्योछावर करती है."
मैं उसकी इज्जत करता हूँ तो क्या गलत करता हूँ? सर." उसकी बातें सुनकर सेठ जी के आखों में पानी आ गया.

इसे कहते है "पति-पत्नी" का प्रेम. 




Wednesday, May 23, 2018

तनाव का सदुपयोग करें

तनाव मनुष्य का एक ज़रूरी गुण है। आप शायद चोक गए होंगे या समझ रहे होंगे कि यहाँ कोई मिसप्रिंट हुआ है। नहीं प्रिय पाठकों आपने सही पढ़ा है कि तनाव या चिंता हम मनुष्यों का एक आवश्यक गुण है। मैं तो यह भी कहता हूँ कि तनाव के बिना मानव जाति कब की विलुप्त हो चुकी होती। तनाव तब अवगुण या घातक हो जाता है जब आपको इससे निपटना न आए या आप इससे हार मानने लगें। तनाव जब हमारे मन, मस्तिष्क और आत्मा पर हावी होने लगता है तब यह समस्या उत्पन्न करता है, जानलेवा समस्याएं। अच्छा आप मुझे यह बताइये कि कौन सांप से ज्यादा डरेगा- वह व्यक्ति जिसे सिर्फ सांप के विष के जानलेवा गुण बताए गए हैं या वह व्यक्ति जिसे सांप से बचना, विषैले और विषहिन में फर्क करना और सांप के विष की प्राथमिक चिकित्सा सिखाई गई हो? निश्चित ही वह व्यक्ति ज्यादा डरेगा जिसे डराया तो बहुत गया लेकिन उससे निपटना नहीं सिखाया गया। तनाव के बारे में भी यही होता है कि हमें सब डराते हैं लेकिन लड़ना या उससे निपटना नहीं सिखाते। आग से कोई व्यक्ति जल सकता है और कोई उससे खाना पका लेगा, जिसे आग को नियंत्रित करना आता है। तो समस्या आग नहीं है समस्या है उसे नियंत्रण नहीं कर पाने की हमारी असमर्थता। चाकू से एक व्यक्ति अपना हाथ काट सकता है लेकिन सावधानी से वही व्यक्ति कई सारे सृजनात्मक कार्य भी कर सकता है। यहाँ भी समस्या चाकू नहीं है समस्या तो उसके उपयोग में की गई लापरवाही है।
मानव विकास यात्रा में तनाव ने ही इंसानों को विकास या परिवर्तन करना सिखाया है। तनाव और भय ने ही उसे गुफा में रहना सिखाया, भोजन की फिक्र ने उसे शिकार करना सिखाया और फिर कृषि और पशुपालन करने के लिए प्रेरित किया। बीमारियों से डर और उससे उत्पन्न तनाव ने उसे जड़ी बूटियों से लेकर सर्जरी तक करना सिखाया। यह तनाव ही है जो हमसे हमारा बेहतर करवाता है... तनाव के बिना तो हमारा जीवन एक ही ढर्रे पर चलता रहता और हम इंसान 'सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट' के सिद्धांत के अनुसार नष्ट या विलुप्त हो गए होते। हमने कई बार लोगों को कहते सुना होगा कि " मैं प्रेशर में ही अपना बेस्ट दे पाता हूँ।" याद कीजिए अपने परीक्षा के दिनों को जब हमारी याद करने की क्षमता आम दिनों से कई गुना अधिक बढ़ जाती थी, क्यों क्योंकि हमारा तनाव हम से हमारा सर्वश्रेष्ठ करवा रहा था। तो तनाव यहाँ पर हमारे लिए लाभदायक सिद्ध हो रहा है। आप रेकॉर्ड उठा कर देख लीजिए कि खिलाड़ियों ने अपना सर्वश्रेष्ठ ओलंपिक खेलों या किसी अन्य बड़ी प्रतियोगिता में ही दिया है। जितनी बड़ी प्रतियोगिता उतना बड़ा तनाव और उतना ही बेहतरीन प्रदर्शन। और याद रखिए कोयला पृथ्वी के गर्भ में दबाव के कारण ही हीरे में बदलता है।
तनाव हमारी उम्र, सेहत, आर्थिक स्थिति, शिक्षा, प्रशिक्षण, सामाजिक स्थिति, सामाजिक माहौल, परिवार के सदस्यों की संख्या आदि सेकड़ो कारकों पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए हम सांप को देखकर हमारे बच्चें तनाव से भर जाएंगे जबकि सपेरे के बच्चों को कोई तनाव नही होगा, कई भाइयों वाला व्यक्ति बिना भाई वाले व्यक्ति से ज्यादा असुरक्षित महसूस करेगा। एक रिसर्च में पाया गया कि वे नर्स कम तनाव और ज्यादा खुश थी जो कि तनावपूर्ण आई सी यु में ड्यूटी करती थी बनिस्बत उनके जो कम तनावपूर्ण अन्य वार्डों में ड्यूटी करती थी। वकीलों के समूहों पर भी ऐसा ही परिणाम प्राप्त हुआ अर्थात वह वकील ज्यादा खुश रहते हैं जो ज्यादा जटिल और तनावपूर्ण केसेस लड़ते हैं। यह भी देखा गया है कि अधिक तनावपूर्ण कार्य करने वाले प्रोफेशनल जीवन मे ज्यादा खुश और ज्यादा सेहतमंद होते हैं जैसे डॉक्टर, पायलट, सैनिक, नर्स, खोजी पत्रकार, वकील आदि।
हम महान भी उन्हीं लोगों को मानते हैं जो तनाव में अच्छा प्रदर्शन करते हैं, आखिर आप ही बताइए कि हम विराट कोहली को इतना क्यों चाहने लगे हैं? हाँ, इसीलिए न कि वह दबाव में अच्छा खेलते हैं और अपनी टीम को मैच जीता देते हैं।
एक सिनेमा हॉल में अचानक से सांप आ जाए और फ़िल्म देखने वाले सभी आम लोग हो तो क्या होगा? हाँ, भगदड़ मच जाएगी और सांप के ज़हर से ज्यादा जानें भगदड़ ले लेगी। अब आप इमेजिन करिये कि उस सिनेमा हॉल में सभी सपेरे बैठें हो और सांप आए तो क्या होगा? क्या सारा परिदृश्य बदल नहीं जाएगा? अब वे सपेरे सांप को पकड़ने के लिए दौड़ पड़ेंगे। तो समस्या सांप नहीं थी, समस्या तो सांप को नियंत्रित न कर पाने अक्षमता की थी। यदि उन आम लोगों को भी सांप को नियंत्रित करने का प्रशिक्षण दिया जाता तो वे भगदड़ कभी न मचाते। वैसे ही समस्या तनाव नहीं है समस्या है तनाव को मैनेज न कर पाना। क्योंकि हमने उसे मैनेज करना सीखा ही नहीं। वैसे ही एक आम अप्रशिक्षित व्यक्ति गहरे समुद्र में डूब जाएगा और वहीं एक पेशेवर गौताखोर उस गहराई से मोती निकालकर ले आएगा। यहाँ भी समस्या समुद्र नहीं है व्यक्ति का अप्रशिक्षित होना है।
तनाव से युद्ध कैसे करें-
1. तनाव का कारण पता करें-
हम हमेशा हड़बड़ी में रहते हैं, हम जल्दी में हैं, क्यों? पता नहीं। हम परेशान हैं, हम चिंतित हैं, हम अवसाद में हैं, हम चिढ़चिढ़े हो गए हैं, हम क्रोधित छवि बना चुके हैं, हम बहुत अधिक तनावग्रस्त हैं....क्यों? क्योंकि हम खुद से कभी नहीं पूछते कि 'आखिर क्यों’।
मेरे पास आने वाले मानसिक समस्या से पीढ़ित रोगी से मैं पहली सीटिंग या पहले परामर्श सेशन में पूछता हूँ कि आप आखिर रोगी क्यों बने ? क्यों आप चितिंत हैं या क्यों आप डिप्रेशन से घिर गये या क्यों आप अपना जीवन समाप्त करना चाहता है या क्यों आप उन लोगों पर क्रोधित होने लगे हैं जो आपसे प्रेम करते हैं या क्यों आप डरने लगे हैं उनसे भी जिनसे कोई नहीं डरता... आदि। मैं हैरान हो जाता हूँ कि अधिकांश को पता ही नहीं होता कि वे क्यों परेशान हैं और कई तो ऐसे भी होते हैं जो केवल इसलिए परेशान होते हैं कि कुछ साल पहले एक परिस्थिति आई थी जिसमें वे तनावग्रस्त हुए थे और इसीलिए वे आज भी हैं तनाव से लबरेज़ जबकि वे खुद जानते हैं कि अब परिस्थिति बिल्कुल बदल चुकी है।
अधिकांश रोगी कभी खुद से यह सवाल नहीं पूछते कि क्यों मैं इन सब में उलझ रहा हूँ? क्या उसे इतना उलझने की आवश्यकता है? आप भी किसी चिंता से परेशान हैं तो खुद से सवाल करें कि आखिर मैं क्यों चिंतित हूँ? क्यों मुझे चिंतित होने की आवश्यकता हैं? क्या इसका हल नहीं हैं? याद रखें आपको जवाब तभी मिलता है जब आप सवाल पूछते हैं। बिना सवाल के जवाब का अस्तित्व नहीं है। प्रश्न की उपस्थिति उत्तर के अस्तित्व के लिये नितांत आवश्यक हैं। और याद रखें कि सवाल समाधान की पहली सीढ़ी है, सवाल के बिना समाधान नहीं हो सकता।
बहरहाल हम तनाव की वजह को जाने समझे कि आखिर हम क्यों तनाव महसूस कर रहे हैं। तनाव के लक्षण आपको कब महसूस हो रहे हैं, समय, तारीख़ और स्थान तथा किसी से मुलाक़ात के बाद या पहले...इससे आपको तनाव की वजह पता करने में मदद मिलेगी। जैसे यदि तनाव सोमवार को ऑफिस जाने से पहले हो रहा है और उस रात आपको नींद भी नहीं आती तो आप समझ सकते हैं कि आप काम का तनाव ले रहे हैं या बॉस से डर रहे हैं। यदि महीने के अंत में तनाव महसूस कर रहे हैं तो आपका तनाव खर्च को लेकर है। यदि तनाव आपको सुबह है, बच्चों के स्कूल जाते समय, तो तनाव यह है कि आप बच्चों को भेजने में अक़्सर लेट हो जाती हैं इसलिए यह आपको परेशान कर रहा है।
2. प्रार्थना करें और सब कार्यों को ईश्वर के सुपुर्द करें जो उसके हैं। अक़्सर लोग इसलिए तनावपूर्ण होते हैं क्योंकि वे ईश्वर के काम भी खुद करना चाहते हैं। मैंने पाया है कि यदि तनावग्रस्त व्यक्ति को यह समझा दिया जाए कि ईश्वर के क्या काम है और हम इंसानों के क्या हैं और उसे सिर्फ उसके कार्यों पर ध्यान देना चाहिए ईश्वर के कार्यों के लिए निश्चिंत रहना चाहिए तो वह व्यक्ति तनावमुक्त हो जाता है।
मेरे केरियर के शुरुआती दौर में मुझे सरकारी चिकित्सक की नौकरी करना पड़ी और गाँव के गरीब परिवार से होने के कारण सभी का दबाव था कि मैं वह नौकरी जॉइन करूँ और उसी में अपना जीवन लगा दूं ताकि ज़िन्दगी गुज़ारने की परेशानी न रहे। मैंने उसे अनमने मन से जॉइन किया। मैं उससे बिल्कुल संतुष्ट नहीं था। मैं कशमकश में और परेशानी में था कि इसे कैसे छोडू और वह करूँ जो मेरा दिल चाह रहा है। एक बार मेरी मुलाकात मेरे दोस्त से हुई जो मुझसे उम्र में काफी बड़े थे लेकिन हम दोनों एक दूसरे को अच्छे से समझते थे (मेरे अधिकांश दोस्त मुझसे उम्र में बड़े ही हैं)। उन्होंने मेरे परेशान चेहरे की वजह पूछी। मैंने उन्हें बताया कि मैं सरकारी नौकरी नहीं करना चाहता, अपनी खुद की क्लीनिक और राइटिंग का काम करना चाहता हूँ लेकिन सब कह रहे हैं कि सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद अगर प्राइवेट प्रैक्टिस नही चली तो फिर कहीं के नहीं रहोगे। उन्होंने मुझे बताया कि इंसानों के डर, परेशानी, चिंता और तनाव के मूल 3 कारण हैं- 1. रिज़्क़ (पोषण एवं जीवनुपयोगी वस्तु का इंतज़ाम) 2. बीमारी और 3. मौत, और ताज्जुब की बात है कि यह तीनों ही बातें खुदा के कब्ज़े में हैं (इस्लाम की मूल शिक्षा के अनुसार उन्होंने मुझे बताया था कि रिज़्क़, मौत और बीमारी सिर्फ ईश्वर के आदेश के अधीन है)। उनकी यह बात मेरे लिए एक सुकून का महाडोज़ साबित हुई और मैं भविष्य की चिन्ताओं से उबरकर निर्णय ले पाया, मैंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया ...और मेरा निर्णय बिल्कुल सही साबित हुआ (अभी तक तो और ईश्वर से उम्मीद है कि वह आगे भी मेरे लिए बेहतर ही करेगा)।
हमारी उस बातचीत के बाद मैं बिल्कुल नया हो गया एक नया इंसान जैसे पहले एक अलग अबरार मुल्तानी था और उनकी बातों को सुनने के बाद एक अलग अबरार मुल्तानी...और मुझे अपनी प्रैक्टिस में डर और चिन्ताओं में डूबे रोगियों को यह बात बताकर ठीक करने में बहुत मदद मिली। मुझे ताज्जुब होता है कि मुझे मानसिक रोगों (तनाव आदि) के उपचार की यह विधि मेरे एक दोस्त ने बताई जो कि मेडिकल का जानकार नहीं था और मेरे मेडिकल कॉलेज में इस बारे में एक भी कक्षा नहीं लगी...पता नहीं यह विज्ञान कब मन की चिकित्सा करना सीखेगा और फिर सिखाएगा...तो आप भी तनाव, चिंता और डर से निजात पाना चाहते हैं तो ईश्वर का काम ईश्वर को करने दें और आप केवल अपने काम पर ध्यान दें...
3. दोस्तों के साथ रहें, दोस्तों से अपने मन की बात बताएं। उनसे अपनी समस्या का समाधान करने के लिए विचार विमर्श करे। मेरा मानना है कि अगर हम सच्चे दोस्त नहीं बनाएँगें तो फिर इंतजार करें दवाइयां आपकी दोस्त बन जाएगी, जो कि बिलकुल भी शुभ संकेत नहीं है।
4. प्रकृति की शरण में आजाइये- प्रकृति से जुड़ने के साथ हमारे अंदर एक सकारात्मकता उत्पन्न होती है। आप हरे झाड़, मुलायम और शीतल घांस, झील की हिलोरे मारती लहरे, भीगो कर फिर भाग जाने वाली समुद्र की लहरें, धुंध में ढकी पहाड़ियों की चोटियां आपको सुकून से भरदेंगी। झरने देखकर आपका तनाव भरभराकर झड़ जाएगा।
5. ज़िन्दगी को आसान बनाए- खालिद हुसैनी की विश्व प्रसिद्ध किताब 'काइट रनर' का पात्र अपने घर के नौकर के हमउम्र बच्चे को अपनी लिखी एक कहानी सुनाता है कि, "एक आदमी को एक जादुई प्याला मिल जाता है, उस प्याले में जब भी उसके आँसू गिरते तो वे मोतियों में बदल जाते। लेकिन वह आदमी बड़ा खुश मिजाज़ था। मोती पाने के लिए वह उदास रहने लगा और रोकर आंसुओं से मोती बनाने लगा। हर वक्त गमगीन होने के बहाने ढूंढने लगा। लालच बढ़ता गया। आखिर में वह अपने आंसुओं से निर्मित मोतियों के ढेर पर बैठा रो रहा था, उसके हाथ में चाकू था और पास में उसकी बीवी की कटी हुई लाश पड़ी थी।"
कहानी सुनाकर वह उस गरीब बच्चे से पूछता है कि, "कैसी लगी कहानी?" तो वह बच्चा कहता है कि, "कहानी तो अच्छी थी लेकिन आंसुओं को लाने के लिए उस आदमी को क्या प्याज़ नहीं मिल सकती थी...गमगीन होने और बीवी को कत्ल करने की क्या ज़रूरत थी?
हम भी ऐसे ही हैं ज़िन्दगी के आसान कामों को करने के लिए जटिल रास्ता अपना लेते हैं, प्याज़ की जगह चाकू का प्रयोग करने लगते हैं।
6. पालतू जानवर का साथ भी आपको तनावमुक्त रखेगा।
7. किसी प्रोफेशनल कॉउंसलर से कॉउंसलिंग भी आपकी बहुत मदद करेगी।
8. नकारात्मक लोगों और खबरों से दूरी बना ले।
9. खुद से बात करें। खुद को बताएं कि स्थिति उतनी खराब नहीं है, खुद से कहें कि आप मे वह शक्ति है ऐसी स्थिति से निकलने की या निपटने की, खुद को याद दिलाएं कि पहले भी आप इससे ज्यादा परेशान स्थिति से निकल चुके हैं।
10. कसरत या वर्कऑउट करें। कसरत वह औषधि है जो हमारे शरीर को थका कर मन को शांत कर देती हैं। आपने देखा होगा कि आम लोगों की तुलना में पहलवानों में तनाव कम होता है, वजह है उनकी कसरत।
11. सबसे बड़ी बात कि खुद को बदलने के लिए तैयार रहें। स्थिति को भी बदलने का सामर्थ्य पैदा करें। स्थिति के अनुसार न बदले बल्कि स्थिति को बदलने की शक्ति उत्पन्न करें... और आप कर सकते हैं।
12. सब्र से काम ले क्योंकि हमारी अधिकांश समस्या समय के साथ स्वतः नष्ट हो जाती है।
13.कुछ आयुर्वेद दवाई भी आपकी काफी मदद कर सकती हैं जो किसी योग्य चिकित्सक की देख रेख में ले, जैसे- तगर, ब्राह्मी, अश्वगंधा, सर्पगंधा, शंखपुष्पी आदि।
~डॉ अबरार मुल्तानी
लेखक- सोचिये और स्वस्थ रहिये, बीमार होना भूल जाइए, बीमारियां हारेंगी, ज़िन्दगी इतनी सस्ती क्यों? (बेस्ट सेलर)
◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

Saturday, May 12, 2018

ईश्वर की मर्जी.........पूरी कहानी जरूर पढ़ें,



लड़कियों के स्कूल में आने वाली नई टीचर ख़ूबसूरत और शैक्षणिक तौर पर भी मज़बूत थी लेकिन उसने अभी तक शादी नहीं की थी..

सब लड़कियां उसके इर्द-गिर्द जमा हो गईं और मज़ाक़ करने लगीं कि मैडम आपने अभी तक शादी क्यों नहीं की..?

मैडम ने दास्तान कुछ यूं शुरू की_एक महिला की पांच बेटियां थीं, पति ने उसको धमकी दी कि अगर इस बार भी बेटी हुई तो उस बेटी को बाहर किसी सड़क या चौक पर फेंक आऊंगा,

ईश्वर की मर्जी वो ही जाने कि छटी बार भी बेटी पैदा हुई और पति ने बेटी को उठाया और रात के अंधेरे में शहर के बीचों-बीच चौक पर रख आया, मां पूरी रात उस नन्ही सी जान के लिए दुआ करती रही और बेटी को ईश्वर के सुपुर्द कर दिया।

दूसरे दिन सुबह पिता जब चौक से गुज़रा तो देखा कि कोई बच्ची को ले नहीं गया बाप बेटी को वापस घर लाया लेकिन दूसरी रात फिर बेटी को चौक पर रख आया लेकिन रोज यही होता रहा हर बार पिता बाहर रख आया और जब कोई लेना जाता तो मजबूरन वापस उठा लाता,

यहां तक कि उसका पिता थक गया और ईश्वर की मर्जी पर राज़ी हो गया। फिर ईश्वर ने कुछ ऐसा किया कि एक साल बाद मां फिर पेट से हो गई ...और इसबार उनको बेटा हुआ, लेकिन कुछ ही दिन बाद बेटियों में से एक की मौत हो गई यहां तक कि माँ पांच बार पेट से हुई और पांच बेटे हुए लेकिन हर बार उसकी बेटियों में से एक इस दुनियां से चली जाती ।

सिर्फ एक ही बेटी ज़िंदा बची ...और वो वही बेटी थी जिससे बाप जान छुड़ाना चाह रहा था, मां भी इस दुनियां से चली गई ..!

इधर पांच बेटे और एक बेटी सब बड़े हो गए टीचर ने कहा पता है वो बेटी जो ज़िंदा रही कौन है.? "वो मैं हूं" और मैंने अभी तक शादी इसलिए नहीं की कि मेरे पिता इतने बूढ़े हो गए हैं कि अपने हाथ से खाना भी नहीं खा सकते और कोई दूसरा नहीं जो उनकी सेवा करें। 
बस मैं ही उनकी खिदमत किया करती हूं और वो पांच बेटे कभी कभी आकर पिता का हालचाल पूछ जाते हैं ।
पिता हमेशा शर्मिंदगी के साथ रो रो कर मुझ से कहा करते हैं, मेरी प्यारी बेटी जो कुछ मैंने बचपन में तेरे साथ किया उस पर मुझे माफ करना, 
मैंने कहीं बेटी की बाप से मुहब्बत के बारे मैं एक प्यारा सा किस्सा पढा था कि ...एक पिता बेटे के साथ फुटबॉल खेल रहा था। और बेटे की हौसला बढ़ाने के लिए जान बूझ कर हार रहा था। दूर बैठी बेटी बाप की हार बर्दाश्त ना कर सकी और बाप के साथ लिपट के रोते हुए बोली बाबा आप मेरे साथ खेलें, ताकि मैं आपकी जीत के लिए हार सकूँ ।

सच ही कहा जाता है कि बेटी तो बाप के लिए रहमत होती है..!!!

Tuesday, March 6, 2018

International Women's Day: भारतीय महिलाओं की सुरक्षा के लिए ढाल बने ये कानून

law for women in india

1909 में शुरू हुआ अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस कारवां आज इस मुकाम पर पहुंच चुका है दुनिया के सभी देशों की महिला हर फील्ड में बुलंदियों को छू रही हैं। इसी लंबे कालखंड में महिलाओं की सुरक्षा के लिए भारत समेत दुनिया के तमाम देशों ऐसे कानून बने हैं जो न सिर्फ उनकी सुरक्षा के लिए ढाल बने बल्कि उन्हें एक सम्मान की जिंदगी देने का जरिया भी बनें। जानें ऐसे भारतीय कानूनों के बारे में जो भारतीय महिलाओं के लिए सुरक्षा की ढाल का काम कर रहे हैं-

संवैधानिक मौलिक अधिकार :
भारतीय संविधान के प्रावधान के अनुसार पुरुषो की तरह सभी क्षेत्रो मे महिलाओ को बराबर अधिकार देने के लिए कानूनी स्थिति है। भारत मे बच्चो और महिलाओ के उचित विकास
हेतु इस क्षेत्र मे महिला और बाल-विकास अच्छे से कार्य कर रहा है ।
संविधान के अनुच्छेद-14 मे कानूनी समानता, अनुच्छेद-15 (3) मे जाति, धर्म, लिंग एवं जन्म स्थान आदि के आधार पर भेदभाव न करना।
अनुच्छेद-16 (1) मे लोक सेवाओ मे बिना भेदभाव के अवसर की समानता। अनुच्छेद-19 (1) मे समान रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
अनुच्छेद-21 मे स्त्री एवं पुरुषो दोनो को प्राण एवं दैहिक स्वाधीनता से वंचित न करना।
अनुच्छेद-23-24 मे स्त्री एवं पुरुष दोनो को ही शोषण के विरूद्घ अधिकार समान रूप से प्राप्त।
अनुच्छेद-25-28 मे धार्मिक स्वतंत्रता दोनो को समान रूप से प्राप्त।
अनुच्छेद-29-30 मे शिक्षा एवं संस्कृति का अधिकार।
अनुच्छेद-32 मे संवैधानिक उपचारो का अधिकार।
अनुच्छेद-39(घ) मे पुरुषो एवं स्त्रियो दोनो को समान कार्य के लिए समान वेतन का अधिकार।
अनुच्छेद-42 महिलाओ हेतु प्रसुति सहायता प्राप्ति की व्यवस्था।

लिंग जांच के खिलाफ कड़ा कानून-
गर्भावस्था मे ही मादा भ्रूण हत्या करने के उद्देश्य से लिंग परीक्षण को रोकने हेतु पूर्व निदान तकनीक अधिनियम 1994 निर्मित किया गया।इसका पालन न करने वालो को 10-15
हजार रुपए का जुर्माना तथा 3-5 साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है। दहेज जैसे सामाजिक अभिशाप से महिला को बचाने के लिए 1961 मे ‘दहेज निषेध अधिनियम’
बनाया गया। 1986 मे इसे भी संशोधित कर समयानुकूल बनाया गया।
दहेज के खिलाफ कानून
दहेज हत्या से जुड़े कानूनी प्रावधान- दहेज हत्या को लेकर भारतीय दंड संहिता(आई.पी.सी.) मे स्पष्ट प्रावधान है। इसके अंतर्गत धारा-304(बी),302,306 एवं 498-ए आती है। दहेज
हत्या का अर्थ है, औरत की जलने या किसी शारिरिक चोट के कारण हुई मौत या शादी के 7 साल के अंदर किन्ही सन्देहजनक कारण से हुई मृत्यु। इसके सम्बन्ध मे धारा-304 (बी)
मे सजा दी जाती है, जो कि सात साल कैद है। इस जुर्म के अभियुक्त को जमानत नही मिलती।
इच्छा के विरुद्ध संबंध बनाने पर बलात्कार का केस
आई.पी.सी की धारा-375 के तहत जब कोई पुरुष किसी स्त्री के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध सम्भोग करता है, तो उसे बलात्कार कहते है।
बलात्कार तब माना जाता है-
यदि कोई पुरुष स्त्री के साथ
-उसकी इच्छा के विरुद्ध।
-उसकी सहमति के बिना।
-उसकी सहमति डरा धमका कर ली गई हो।
-उसकी सहमति नकली पति बना कर ली गई हो, जबकि वह उसका पति नही हो।
-उसकी सहमति तब ली गई हो जब वह दिमागी रूप से कमजोर या पागल हो।
-उसकी सहमति तब ली गई हो जब वह शराब या अन्य नशीले पदार्थ के कारण होश मे नही हो।
-यदि वह 16 वर्ष से कम उम्र की है, चाहे उसकी सहमति से हो या बिना सहमति के।
-15 वर्ष से कम उम्र की पत्नि के साथ।

छेड़खानी के खिलाफ सख्त कानून –
धारा-509,294 आई.पी.सी के अनुसार कोई भी शब्द, इशारा या मुद्रा जिससे महिला की मर्यादा का अपमान हो। धारा-354 आई.पी.सी मे कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी
महिला की मर्यादा को भंग करने के लिए उस पर हमला या जबरदस्ती करता है तो उसे दो वर्ष तक की कैद या जुर्माना या दोनो की सजा हो सकती है।
और भी हैं प्रभावी कानून
1- मेडिकल टर्मिनेशन आफ प्रेग्नेंसी एक्ट 1987
2- लिंग परीक्षण तकनीक एक्ट 1994
3- बाल विवाह रोकथाम एक्ट 2006
5-कार्यस्थल पर महिलाओ का यौन शोषण एक्ट 2013

Friday, February 9, 2018

आज भी कई महिलाएं साड़ी को जांघों में दबाकर रोकती हैं पीरियड्स का खून

सैनेटरी नैपकिन पर टैक्स का लगातार विरोध देखने को मिल रहा है। कुछ समय पहले सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर ‘लहू का लगान’ नाम से एक कैंपन भी चला। कारण साफ है, जहां हमारी सरकार को सैनेटरी नैपकीन की सस्ती उपलब्धता के लिए योजना बनाने की ज़रूरत है, वहां ठीक इसके उलट हमारी सरकार आम लोगों को उसकी पहुंच से दूर करने की साजिश रचती हुई दिख रही।

बहरहाल, आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं पीरिड्स के दौरान कपड़े का इस्तेमाल करती हैं। इसके दो कारण है, पहला सैनेटरी नैपकिन खरीदने की असमर्थता, दूसरा जानकारी की कमी।

बिहार सरकार के पूर्व प्रोजेक्ट “महिला सामख्या” की राज्य कार्यक्रम निदेशक रह चुकी कीर्ति का कहना है कि बिहार के कई ग्रामीण इलाकों में जब किशोरी लड़कियों और महिलाओं को सैनेटरी नैपकीन दिखाया गया तो उनका जवाब था कि यह तो डस्टर है। उन्होंने उसके पहले कभी सैनेटरी नैपकीन देखा तक नहीं था। कीर्ति का कहना है कि महिलाओं में पीरियड्स को लेकर जागरूकता की भारी कमी है, जिसका खामियाज़ा उन्हें इंफेक्शन के रूप में सहना पड़ता है।

लेकिन, इससे भी ज़्यादा चौंकाने वाली बात तो ये है कि कई इलाकों में महिलाएं पीरियड्स के दौरान कपड़े तक का इस्तेमाल नहीं करती। कीर्ति बताती हैं कि शुरुआत में हमने देखा कि औरतें बिलकुल भी जागरूक नहीं है। कई जगहों पर तो कपड़े तक का इस्तेमाल नहीं किया जाता। माहवारी के दौरान महिलाएं घर से निकलती तक नहीं, पहने हुए कपड़े में जब खून लग जाता तो उसे धो देती हैं और वापस से वही कपड़ा पहन लेती हैं। कुछ जगहों में महिलाएं साड़ी के प्लेट को दोनों जांघों के बीच में दबा लेती हैं।

सैनेटरी नैपकिन की जानकारी की कमी और लोगों तक उसकी पहुंच नहीं होने की वजह से कई ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में लड़कियों की हाजिरी में भी कमी देखी जाती है। पीरियड्स में लड़कियां स्कूल ही जाना छोड़ देती हैं।

आज कई निजी संस्थाएं इस ओर जागरूकता के लिए काम कर रही हैं। यहां तक की कुछ सरकार भी इस दिशा में काम करती हुई दिख रही। बिहार सरकार की ही बात करें तो महिलाओं के लिए चलाए गए पूर्व प्रोजेक्ट “महिला सामख्या” के तहत महिलाओं को सैनेटरी नैपकिन बनाने की ट्रेनिंग दी गई। इससे महिलाओं को दो फायदा हुआ। पहला महिलाओं को रोज़़गार मिला साथ ही महिलाएं कपड़े की जगह सैनेटरी नैपकिन इस्तेमाल करने लगीं।

छत्तीसगढ़ में एक सुचिता योजना के तहत इन दिनों किशोरी लड़कियों को वेंडिंग मशीन से सैनेटरी नैपकिन उपलब्ध करवाया जा रहा। मशीन में पैसे डालते ही एक नैपकिन बाहर आ जाता है। यहां इस्तेमाल किए गए नैपकिन को बर्न करने की भी सुविधा है। इस मशीन के लगने से वहां के स्कूलों में लड़कियों के अटेंडेंस में भी वृद्धि हुई है।

महावारी के दौरान साफ सफाई पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी होता है। डॉक्टर्स की मानें तो हमें हर 6 से 7 घंटे में पैड या कपड़े बदलने चाहिए, वरना इंफेक्शन का खतरा बना रहता है। महिला हो या पुरुष उनके प्राइवेट पार्ट्स की सफाई बहुत ज़रूरी है। महिलाओं में प्राइवेट पार्ट्स में इन्फेक्शन से कई बीमारियों का खतरा बना रहता है। बार्थोलिन सिस्ट, यूरिन इन्फेक्शन जैसी कई भयावह बीमारियां झेलनी पड़ सकती हैं। बात जब पीरियड्स के दिनों की हो तो इन्फेक्शन का खतरा और भी बढ़ जाता है।

ग्रामीण ही नहीं बल्कि शहरी इलाकों में भी देखा जाता है कि महिलाएं एक ही कपड़ो का कई बार इस्तेमाल करती हैं। वो यूज कपड़ो को धोकर वापस से इस्तेमाल करती हैं। सबसे ज़्यादा चिंता की बात तो यह है कि उन कपड़ो को सही से सुखाया नहीं जाता।

जाहिर सी बात है, जिस समाज में महिलाओं के अंडरगार्मेंट्स को खुले में सुखाने की इजाजत ना हो वहां पीरियड्स के कपड़ो को खुले में सुखाना तो एक बड़ा अपराध ही माना जाएगा। धूप ना लगने पर कपड़े के किटाणु उसमें ही रह जाते हैं। यहाँ तक कि उन कपड़ों को धोने तक के लिए भी प्राइवेसी नहीं मिलती। कई बार तो महिलाएं गीले कपड़ो का ही इस्तेमाल कर लेती हैं।

सेक्शुअल हेल्थ पर काम करते समय गुड़गांव के मुल्लाहेड़ा गांव की कुछ औरतों से बात करने पर पता चला कि उनके पास पीरियड्स के कपड़े धूप में सुखाने का कोई विकल्प ही नहीं है। उन औरतों का कहना था कि हम चाह कर भी पीरियड्स के कपड़ो को धूप में सुखा नहीं सकते और पैड खरीदने के लिए हमारे पास पैसे नहीं है।

किसी आपदा के समय शायद ही किसी का ध्यान इस ओर जाता होगा कि जो महिलाएं पीरियड्स में हैं उन्हें कपड़े या नैपकिन कैसे मिल रहे होंगे। बीबीसी की पत्रकार सीटू तिवारी बताती हैं कि एक वर्कशाप में जब मुझसे यह पूछा गया कि बाढ़ की स्थिति में वह क्या कवर करेंगी तो उनका जवाब था कि मैं उस वक्त पीरियड हुई महिलाओं की स्टोरी कवर करूंगी। उन महिलाओं को पैड या कपड़ा मिल रहा है या नहीं, अगर कपड़ा इस्तेमाल कर रही तो उसे सुखाने का कैसा इंतज़ाम है, वे अपनी साफ-सफाई का कितना ख्याल रख पा रही है।

पीरियड्स पर बात करना और इस दिशा में जागरूकता किस कदर ज़रूरी है इस बात का अंदाज़ा शायद इन बातों से लगाया जा सकता है। सरकार अगर इस दिशा में कुछ योजनाएं लाए तो बड़े स्तर पर महिलाओं को इंफेक्शन से बचाया जा सकता है।

Posted by Iti Sharan in #IAmNotDown

‘सर्वाइवर लिखें विक्टिम नहीं’, ऐसे ही 8 नियम जो यौन हिंसा पर लिखते समय याद रखने चाहिए

हममें से जो भी इसे पढ़ रहे हैं, वो एक चीज़ तो मानेंगे कि अब विचार करने का वक्त आ गया है कि यौन हिंसा पर कैसे बात की जानी चाहिए।

एक राइटर के तौर पर यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि यौन हिंसा की घटनाओं पर हम समाज का ध्यान खीचे। लेकिन ऐसा करते हुए हमें अक्सर इसका ध्यान नहीं रहता कि हमारे लिखने का तरीका भी कई बार परेशानियों को घटाने के बजाए और बढ़ा देता है।

टेक्सस असोसिएशन अगेन्स्ट सेक्शुअल असॉल्ट (TAASA) के लिए तैयार किए गए अपने एक प्रेज़ेंटेशन में टोनिया कनिंघम और हाले कोचरन ने लिखा है “भाषा उत्पीड़न का सबसे बड़ा पोषक है।” मतलब यह कि किसी घटना पर किस तरह से लिखा और पढ़ा जा रहा है उससे भी प्रभावित वर्ग का उत्पीड़न होता है। इसी समस्या को सुलझाने के लिए हमने उन चीज़ों की एक लिस्ट बनाई है जिन्हें इस मुद्दे पर लिखते वक्त ध्यान में रखा जाना चाहिए।

1. पीड़ित नहीं, सर्वाइवर।

किसी इंसान के साथ पीड़ित शब्द जोड़कर हम उसकी पूरी पहचान को एक घटना तक सीमित कर देते हैं। ऐसा करके हम उन्हें हिम्मत देने के बजाए असहाय बना रहे होते हैं। और इन सबका नतीजा होता है एक सदमा, मानसिक स्वास्थ्य पर असर, आत्मविश्वास में कमी और कानून व्यवस्था से भरोसा उठना। तो अागे से पीड़ित शब्द को सर्वाइवर से बदल दें।

2. हमेशा एक्टिव वॉय्स का इस्तेमाल करें।

“उस लड़की पर हमला किया गया।”

अमेरिकी विचारक जैकसन काट्ज़ ने इसकी व्याख्या की है कि उपर दिए गए उदाहरण की तरह पैसिव वॉय्स में लिखते हुए हमेशा सिर्फ एक इंसान की पहचान ही ज़ाहिर की जाती है, जिसे महज़ बेचारे और पीड़ित की तरह पेश किया जाता है और कहीं से भी हमलावर या किसी घटना को अंजाम देने वालों का कोई ज़िक्र नहीं होता। इससे बचने के लिए ऐसे वाक्यों का प्रयोग किया जा सकता है जिसमें हमलावर का भी ज़िक्र हो। “जैसे उस लड़की पर उस लड़के ने हमला किया।”

इसी तरह TAASA के प्रेज़ेंटेशन में यह बात कही गई है कि ‘उस लड़के ने जबरन उस लड़की के चेहरे को छुआ’ लिखना ‘उस लड़के ने उस लड़की को किस किया’ लिखने से काफी बेहतर और प्रभाव डालने वाला है। इस तरह से लिखना हमलावर के हिंसक चरित्र को भी दर्शाता है।

पैसिव वॉय्स का इस्तेमाल करने से ऐसा लगता है कि अपराध में सर्वाइवर ने भी साथ दिया है, मतलब ताली एक हाथ से नहीं बजती वाली थ्योरी। लेकिन जैसा कि हम सभी जानते हैं कि यौन हिंसा वाले अपराधों में ऐसा बिल्कुल नहीं होता।

3. ‘ये तो होना ही था’

आपकी रिपोर्ट में कहीं से भी ऐसा नहीं लिखा होना चाहिए कि सर्वाइवर के साथ ऐसा होना तो तय ही था या उसने जानबूझकर मुसीबत मोल ली। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वक्त क्या था, सर्वाइवर ने कैसे कपड़े पहने थे, क्या खाया या पीया गया था या सर्वाइवर की सेक्शुअल हिस्ट्री क्या है। भारत में 90%  ऐसे अपराध को सर्वाइवर के जान पहचान वाले ही अंजाम देते हैं, लेकिन ध्यान रखिए कि उनके रिश्ते की घनिष्ठता से कोई फर्क नहीं पड़ता। जो बात मायने रखती है वो यह है कि वो घटना सर्वाइवर की सहमती से हुई या नहीं।

4. सर्वाइवर की पहचान की सुरक्षा

कभी भी सर्वाइवर के नाम, पता या वर्तमान पते का ज़िक्र ना करें। Do not reveal the survivor’s name, address, or current whereabouts. सुज़ेट जॉर्डन ने खुलकर अपने अनुभव साझा किए थे, लेकिन इसका चुनाव उनके हाथ में है, हमारे या आपके नहीं। आपकी रिपोर्ट में जिन लोगों के बारे में लिखा जा रहा है उनकी सुरक्षा और निजता का पूरा सम्मान होना चाहिए।

5. ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’

दिसंबर 2012 दिल्ली गैंगरेप मामले को बहुत लोगों ने ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मानते हुए मौत की सज़ा को जायज़ ठहराया। ध्यान रहे, यौन हिंसा की किसी भी घटना में इस तरह की हायरैरकी बनाने से बचें। याद रहे कि सभी तरह की यौन हिंसा की घटनाएं एक समान निंदनीय है और सभी मामलो में तुरंत न्याय होना चाहिए।

6. लोगों के बयान लिखते हुए सावधानी बरतें

घटना का निष्पक्ष नज़रिया बताने के लिए चश्मदीदों, परिवारजनों, पुलिस वालों और अन्य लोगों के बयानों के ज़रिए स्टोरी में बहुत सारे एंगल को जगह देना अच्छी बात है, लेकिन TAASA के प्रेंज़ेंटेशन के हिसाब से ये बहुत संभलकर और  शिष्टाचार से करना चाहिए।

“वो हमेशा लड़के लेकर आती थी।” ”उसने बहुत छोटे और भड़काऊ कपड़े पहने थे।” ” वो अक्सर शराब पीती थी।” “वो अपराधी के साथ रिलेशनशिप में थी।” ऐसे बयान या ऐसी बातें चरित्र हनन और विक्टिम ब्लेमिंग के अलावा और कुछ नहीं है। हमें अक्सर रिपोर्टिंग के दौरान ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं। फरवरी 2017 में एक नागालैंड की महिला के ऊपर रिपोर्ट करते हुए टाइम्स ऑफ इंडिया ने बहुत बड़ी चूक की थी।

7. रिपोर्ट लिखते हुए जेंडर का रखे खयाल

यौन हिंसा किसे कहते हैं? इस सवाल का जवाब ढूंढने में कानून और मीडिया का रोल एक दूसरे के पूरक का ही रहा है।उदाहरण के तौर पर IPC की धारा 375 व्याख्या करती है कि एक पुरुष को किन-किन आधारों पर बलात्कार का दोषी माना जा सकता है। और 6 अलग अलग आधार दिए गए हैं और हर जगह लिखा गया है कि पुरुष कब-कब बलात्कारी कहलाता है। यौन हिंसा पर जेंडर न्यूट्रल कानूनोंके अभाव में मीडिया भी सिर्फ और सिर्फ इसी आइडिया के साथ काम करता है कि पुरुष दोषी हैं और महिलाएं पीड़ित। हो सकता है कि यह अधिकतर मामलों में सही हो लेकिन सभी मामलों में सही हो ऐसा नहीं है। स्त्री और बाल कल्याण मंत्रालय की 2007 की एक रिपोर्ट के अनुसार52.94% (प्रयास और सेव द चिल्ड्रेन संस्था के द्वारा किया गया सर्वे) नाबालिग पुरुषों का यौन हिंसा का निजी अनुभव रहा है।

वक्त आ चुका है कि अब इस सोच को तोड़ा जाए और लिखते हुए ट्रांस, गे पुरुष या खुद को पुरुष की तरह पहचानने वाले लोगों को बराबर का महत्व दिया जाए। शायद यही एक बड़ी वजह है कि ट्रांस लोगों के साथ होने वाली हिंसा या समान लिंग में होने वाली हिंसा की घटनाएं इतनी कम रिपोर्ट की जाती हैं।

8. ‘पुरुषों का भी होता है बलात्कार’

पुरुषों के साथ होने वाली हिंसा पर रिपोर्ट करें। लेकिन ‘भी होता’ है लिखना बंद करिए। अक्सर ऐसे मुहावरे का इस्तेमाल महिलाओं के दमन को गलत बताने के लिए किया जाता है। ये कहना कि “पुरुषों के साथ भी इतना ही बुरा होता है” पूरी तरह से पितृसत्ता और पुरुषों को मिलने वाली सहूलियतों को नज़रअंदाज़ करने जैसा है।

अगली बारी जब आप लिखने बैठें तो इन 8 प्वाइंट्स को याद रखें। और ऐसा करने से आपकी रिपोर्ट संवेदनशील और भेदभाव रहित बनेगी। तो आज से खयाल रखें कि हमारे लेख बस पुराने स्टिरियोटाइप्स को बढ़ावा देने या यौन हिंसा के सर्वाइवर्स को कमज़ोर करने के लिए ना हो।