Thursday, August 25, 2016

अविवाहित और विदेशी लोग सरोगेसी न करा पाएंगे

भारत के कैबिनेट ने किराए पर कोख यानी सरोगैसी पर जिस प्रस्तावित बिल को मंज़ूरी दी है उसके मुताबिक व्यवसायिक सरोगैसी पर प्रतिबंध लगाया जाएगा.
इस प्रस्तावित बिल में सरोगैसी को लेकर नए प्रावधान लाए गए हैं.
विदेशी नागरिकों को भारत में सरोगेसी कराने की अनुमति नहीं होगी.
इसके अनुसार अगर कोई दंपत्ति सरोगेसी से पैदा हुए बच्चे को नहीं अपनाता, तो उन्हें 10 साल तक की जेल या 10 लाख तक का जुर्माना हो सकता है.
सरोगेसी को लेकर भारत में कोई कानून नहीं है. आरोप लगते हैं कि इसके कारण कई गरीब महिलाओं का शोषण होता है.
पत्रकारों से बातचीत में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा, “ये कानून व्यवसायिक सरोगेसी पूरी तरह प्रतिबंधित करने के लिए और परोपकारी सरोगेसी को नियमित करने के लिए लाया जा रहा है.”

किसी महिला को पूरी ज़िंदगी में सिर्फ़ एक बार सरोगेट मां बनने की इजाज़त होगी.
सरोगेसी से हुए बच्चे अपनाने वाले दंपत्ति के लिए महिला की उम्र 23 और 50 वर्ष के बीच और पुरुष की उम्र 26 और 55 वर्ष के बीच होनी चाहिए.
लेकिन क्या ऐसा करने से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे या फिर समलैंगिकों के अधिकारों का हनन नहीं होगा?
सुषमा स्वराज ने कहा, "हम लिव-इन रिलेशनशिप और समलैंगिक रिश्तों को रेकिग्नाइज़ नहीं करते हैं और इसलिए हम उन्हें इसके लिए हक़दार नहीं बनाना चाहते."
सरोगेट महिला बनने के लिए उसका विवाहित होना और एक स्वस्थ्य बच्चे की मां होना ज़रूरी होगा. सरोगेसी क्लीनिक का रजिस्टर्ड होना ज़रूरी होगा. अगर क्लीनिक सरोगेट मां की उपेक्षा करता है या फिर पैदा हुए बच्चे को छोड़ने में हिस्सा लेता है तो क्लीनिक चलाने वालों पर 10 वर्ष की सज़ा और 10 लाख तक का ज़ुर्माना लग सकता है.
सरोगेसी की अनुमति नज़दीकी रिश्तेदार को दी गई है. सरोगेसी से पैदा हुए बच्चे को सभी कानूनी अधिकार होंगे.
सुषमा स्वराज ने कहा, “जो चीज़ ज़रूरत के नाम पर शुरू की गई थी, वो अब शौक़ बन गई है. सेलेब्रिटीज़ के कितने ही ऐसे उदाहरण सामने हैं जिनके अपने दो-दो बच्चे हैं, बेटा और बेटी दोनो हैं, तब भी उन्होंने सरोगेट बच्चा किया है. ये अनुमति ज़रूरत के लिए है, शौक़ के लिए नहीं. और न इसलिए कि पत्नी पीड़ा सहना नहीं चाहती, इसलिए चलो सरोगेट बच्चा कर लेते हैं.”
प्रस्तावित कानून के अनुसार सरोगेसी की अनुमति तभी दी जाएगी जब दंपत्ति में से कोई भी पार्टनर बांझपन का शिकार हो, जिसके कारण दंपत्ति अपना बच्चा पैदा नहीं कर सकते हों.
सरोगेसी के लिए दंपत्ति की शादी को कम से कम पांच साल हो जाने चाहिए. अगर दंपत्ति का कोई अपना बच्चा हो या फिर उन्होंने कोई बच्चा गोद ले रखा हो, तो उन्हें सरोगेसी की इजाज़त नहीं होगी.
हैदराबाद स्थित डॉक्टर पद्मजा फ़र्टिलिटी आईविएफ़ सेंटर के दिवाकर रेड्डी सरोगेसी के मुद्दे पर लग रहे कई तरह के आरोपों को ख़ारिज करते हैं.
वो कहते हैं कि ये आरोप की सरोगेसी में गरीब महिलाओं को लूटा जा रहा है, या फिर उनकी मौत तक हुई है, ग़लत हैं.
इस बिल को संसद के अगले सत्र में पेश किया जाएगा. इसके अंतर्गत एक राष्ट्रीय सरोगेसी बोर्ड बनाया जाएगा और और उसके नीचे केंद्र और राज्यों में बोर्ड होंगे.
राष्ट्रीय सरोगेसी बोर्ड के प्रमुख स्वास्थ्य मंत्री होंगे और तीन महिला सांसद इसकी सदस्य होंगी. दो सांसद लोकसभा से होंगी और एक राज्य सभा से.

Sunday, August 21, 2016

पदक की कीमत...

साक्षी मलिक तिरंगे को सलामी दे रही थी और राष्ट्रगान की धुन बज रही थी।गले में ओलम्पिक का कांस्य पदक झूल रहा था और यह सब देख रही थी गांव के नुक्कड़ पर लाला की दुकान के सामने खड़ी कजरी..
हां..गांव की होनहार बेटी कजरी। मुट्ठिया भींचे एकदम सावधान की मुद्रा..जैसे पदक साक्षी ने ना जीतकर कजरी ने जीता हो। कजरी उसका घर का नाम था स्कूल में उसका नाम कोमल वर्मा था। पांच फुट सात इंच लम्बी कजरी गांव की सबसे लम्बी लड़की थी। बचपन में मां जब बापू की रोटियां बांधकर जब खेत तक पहुंचाने की कहती थी तो कजरी उतनी स्पीड से भागकर खेत तक पहुंच जाती थी जितनी स्पीड से मां रोटियां बना भी नही पाती थी। इकलौती बेटी थी कजरी। ना कोई भाई ना कोई बहन..स्कूल के काम से लेकर घर के काम तक हर काम मे अव्वल थी कजरी। गांव वाले भी अकसर कहा करते थे। कजरी एक दिन गांव का नाम जरूर रोशन करेगी। जब भी फुरसत मिलती कजरी खेतों के कच्चे रास्तों पर दौड़ लगाने निकल पड़ती और घंटो दौड़ती रहती और बस दौड़ती ही रहती। जैसे वह पैदा ही दौड़ने के लिए हुई थी लड़कियां तो लड़कियां लड़कों मे भी कोई ऐसा ना था जो कजरी से आधे रास्ते की भी बराबरी कर ले..
आज से पांच बरस पहले ( जब वह दसवीं कक्षा की छात्रा थी ) स्कूल के मास्टर जी ने बताया की..शहर में दौड़ की प्रतियोगिता है तो कजरी बापू को उसमे हिस्सा लेने के लिए कहने लगी तो बापू ने उसे समझाया..."बेटी..वहां महंगे महंगे जूते पहनकर दौड़ने वाली लड़कियां हैं तू उनमें कहां दौड़ पाएगी..पर ना मानी कजरी दो दिन तक उसने खाना नही खाया। थक हारकर बापू ने उसका नाम शहर जाकर उस दौड़ प्रतियोगिता में लिखवा ही दिया..कजरी को आठ दिन मिले थे उस प्रतियोगिता से पहले..उसने उन आठ दिनो में कई महीने जितनी दौड़ लगा दी। आखिर पहला अवसर जो मिला था उसको शहर कि किसी दौड़ प्रतियोगिता मे हिस्सा लेने का..
नियत तारीख पर भोर में ही बस पकड़कर बापू के संग शहर के लिए निकल गई कजरी..सैंकड़ो सपनों मे रंग भरने का अवसर मिला है आज..आज के बाद कजरी..कजरी ना रहेगी कोमल वर्मा के नाम से जानी जाएगी। एक आम लड़की से खास हो जाएगी..और भी न जाने क्या क्या सोच लिया कजरी ने उस दो घण्टे के बस के सफर के दौरान..
बस से उतरकर वो दोनो आटो पकड़कर खेल के मैदान तक आ पहुंचे। खेल शुरू होने से पहले मैडिकल चैकअप हुआ उसके बाद सुबह दस बजे से दौड़ की प्रतियोगिता शुरू हुई..सौ मीटर, दो सौ मीटर, हजार मीटर, पांच हजार मीटर, रिले रेस..एक एक कर कजरी ने सभी दौड़ें बडे अन्तर से जीत ली। चारों तरफ कजरी..कजरी..कजरी बस कजरी की ही गूंज थी..शाम हो चुकी थी। कजरी सभी मैडल गले में डाले अपने बापू के साथ गांव लौटने की तैयारी कर रही थी। तभी खेल सचिव का पी ए उनके पास आया और उनसे कहा की.."आपको साहब बुला रहे हैं दस पांच मिनट की ही बात है वो दोनो उसके साथ खेल सचिव के आफिस तक आ गए। कजरी के साथ बापू जब आफिस के अन्दर जाने लगे तो उन्हे बाहर ही रूकने को कह दिया। कजरी आफिस में दाखिल हुई तो सामने कुर्सी पर लगभग पैंतीस वर्ष का एक शख्स बैठा था। उसने कुर्सी छोड़ते हुए कजरी को वैलकम करते हुए कहा.."आइये आइये कोमल वर्मा जी, भई वाह क्या खूब दौड़ लगाती हैं आप.."कहां छुपी हुई थी आप अभी तक..खेल सचिव ने हाथ पकड़ कर उसे कुर्सी पर बिठाते हुए कहा..कजरी को बड़ा सम्मान महसूस हुआ गांव की एक लड़की के लिए इतने बड़े आदमी से अपनी प्रशंसा में दो शब्द सुनने से बड़ा और क्या सम्मान होगा.."नही नही सर.. ऐसा कुछ नही बस थोड़ा बहुत दौड़ लेते हैं.."अरे आप नही जानती कोमल जी,.. आप क्या हैं..कल जोनल फिर नेशनल और फिर ओलम्पिक आप जल्द ही लेडी उसैन बोल्ट होंगी। शोहरत आपके बहुत करीब है यह कहते कहते खेल सचिव कजरी के ठीक सामने कुर्सी पर आकर बैठ गया। .."लेकिन क्या है कोमल जी आप जानती भी होगी की हर चीज की एक कीमत होती है और इस नाम, इज्जत और शोहरत को पाने के लिए थोड़े समझौते भी करने पड़ते हैं। मैं साहब से कहकर आपको आगे बढने का मौका दिलवा दूंगा बस आप..यह कहते कहते पितृ स्वरूप वह हाथ मर्यादा लांघने लगे। कजरी बेशक गांव की लड़की थी मगर वह इतनी भी अन्जान न थी उसने तुरंत उस उजली सूरत के पीछे छुपे काले विचार वाले दैत्य की असलियत को भांप लिया...
चटाक..एक थप्पड़ रसीद कर दिया कजरी ने उस खेल सचिव के मुह पर.."क्या समझते हो आप अपने आप को.. "आगे बढाने का लालच देकर आप मेरी इज्जत से खिलवाड़ करेंगे, मैं मर जाऊंगी लेकिन समझौता नही करूंगी। यह कहकर उसने आज दौड़ मे जीते हुए सारे पदक उस खेल सचिव के मुह पर फेंक मारे.."थू है आपकी इस घटिया सोच पर..यह कहकर थूक दिया कजरी ने उस सचिव के मुह पर और कमरे से बाहर निकल गई..चलो बापू चलते हैं..?? क्या हुआ बेटा..?? क्या कह रहे थे साहब..?? बापू सवाल पर सवाल पूछे जा रहे थे लेकिन कजरी बस खामोश बापू का हाथ पकड़े खींचे ले जा रही थी खुद को उस दूषित हवा से दूर जहां उसका दम घुटा जा रहा था..
उस घटना को आज पूरे पांच बरस बीत चुके हैं। आज भी जब वह तिरंगे के लहराने पर राष्ट्रगान की धुन सुनती है तो उसके जख्म फिर से हरे हो जाते है। वह जानती है की दुनिया के लिए यह सिर्फ एक पदक है। लेकिन सिर्फ और सिर्फ एक लड़की ही जान सकती है कि रास्ता जितना सीधा और सरल दिखता है उतना है नही। इस पुरूष प्रधान समाज में सिर्फ खेल के मैदान में पसीना बहाकर ही नही पदक नही मिलते बल्कि और भी कीमत चुकानी पड़ती है तिरंगे को सलामी के लिए...

Saturday, August 13, 2016

Plz must be read all girls and specially boys

Please let your wife know about this, this is a serious caution from medical practioners ( LUTH ) to all female beings be it infant, baby, girl, ladies, mothers; cancer of the Vagina is all over, please avoid washing your Vagina with soap, wash with only water, there is is a particular chemical in soap generally that is very dangerous and Possibly causes cancer of the Vagina.

Cases of cancer of the Vagina is all over most of the general hospitals so be aware of this important message. If you have feelings for others. Kindly pass this message to others that are important to you.

* 56 girls died because of using whisper, stayfree etc.

* Don't use one single pad for the whole day because of the chemical used in ultra napkins. Which converts liquid into gel......it causes cancer in bladder and uterus. So please try to use cotton made Pads and if you are using ultra pads, please change it within 5hours, per day, at least. If the time is prolonged the blood becomes green and fungus formed gets inside the uterus and body.

* Please don't feel shy to forward this message to all girls and even boys so that they can share with their wives. And friends, whom they care for.

AIMS
Kick off “Breast Cancer”

* Nurse your baby.

* Wash your bra daily.

* Avoid black bra in summer.

* Do not wear a bra while sleeping.

* Do not wear an under wire bra very often.

* Always cover your chest completely by your dupatta or scarf when you are under the sun.

* Use a deodrant not an anti perspirant.

* This is a public service message from Tata cancer hspital.

* Pass it to all the ladies you care for without. Hesitating.

* Awareness is important.

* I ,Lucky, care for you all.

* Please don't hesitate to inform other females, forward to every girls on your List!!...

* Now am starting with you, my friends on facebook, especially the ladies, kindly share it to all of your friends or every girls on your bbm, whatssapp, facebook etc. Thanks.

Friday, August 12, 2016

मातृत्व लाभ (संशोधन) विधेयक, 2016 पेश किया, जिसका उद्देश्य कामकाजी महिलाओं के मातृत्व अवकाश को 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह करना है।

केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री ने राज्य सभा में मातृत्व लाभ (संशोधन) विधेयक, 2016 पेश किया, जिसका उद्देश्य कामकाजी महिलाओं के मातृत्व अवकाश को 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह करना है।
इस संबंध में मेटरनिटी बैनिफेट एक्ट में संशोधन आज राज्यसभा में पास हो गया।- 

खास बातें

–गर्भावती महिलाओं को 26 हफ्ते की छुट्टी मिलेगी
–कंपनियों, संस्थाओं में बच्चों के लिए क्रेच बनाना भी अनिवार्य
–अब लोक सभा में पेश किया जाएगा बिल

नई दिल्ली: राज्यसभा ने मातृत्व अवकाश संशोधन बिल को लंबी चर्चा के बाद मंजूरी दे दी है. यह कामकाजी महिलाओं की बराबरी की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. इसके तहत निजी कंपनियों में भी गर्भावस्था में महिलाओं को 26  हफ्ते की छुट्टी मिलेगी. कंपनियों और संस्थाओं में बच्चों के लिए क्रेच बनाना भी अनिवार्य हो जाएगा. इस कानून के अभाव में अब तक महिलाएं निजी कंपनियों की मनमानी झेलने को मजबूर थीं.

भेदभाव खत्म करने के तरीकों पर गहन चर्चा के बाद आया बिल
यह बिल पिछले कई साल से स्टेकहोल्डरों के साथ सलाह-मशविरा के बाद लाया गया है. इस दौरान वर्कप्लेस पर कामकाजी महिलाओं के खिलाफ हो रहे भेदभाव को खत्म करने के तरीकों पर गहन चर्चा की गई. गुरुवार को राज्यसभा ने मातृत्व अवकाश संशोधन बिल पास कर दिया है. अब इसे लोक सभा में पेश किया जाएगा.

बच्चे गोद लेने वाली मांओं को 12 हफ्ते की छुट्टी
नए प्रस्तावित कानून में निजी कंपनियों के लिए अब मातृत्व अवकाश 12 हफ्ते की जगह 26 हफ्ते देना जरूरी होगा. 10 से ज्यादा कर्मचारियों वाली सभी कंपनियों और संस्थाओं पर यह प्रस्तावित कानून लागू होगा. जहां-जहां 50 से ज्यादा कर्मचारी हैं, वहां कामकाजी महिलाओं के बच्चों के लिए क्रेच की व्यवस्था मुहैया कराना जरूरी होगा. साथ ही गोद लेने वाली मांओं को भी 12 हफ्ते की छुट्टी मिलेगी.

मेनका गांधी ने कहा, कानून के होंगे दूरगामी परिणाम
महिला और बाल कल्याण मंत्री मेनका गांधी ने बिल पारित होने के बाद कहा, "यूनिसेफ के मुताबिक जन्म होने के सात महीने तक मां का बच्चे की देखभाल करना बेहद जरूरी होता है. इस कानून के दूरगामी परिणाम होंगे. बच्चे के लिए भी और मां के लिए भी."

कानून का उल्लंघन करने वालों के सजा
सवाल है कि इस कानून पर अमल न करने वालों पर क्या कार्रवाई होगी? एनडीटीवी से बात करते हुए श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने कहा "जो लोग नए नियमों का उल्लंघन करेंगे उन्हें तीन महीने से लेकर एक साल तक की सजा का प्रावधान बिल में शामिल किया गया है. उन पर फाइन भी लगाने का प्रावधान शामिल किया गया है."

सात रीजनल कॉन्फ्रेंस आयोजित करेगा श्रम मंत्रालय
अब श्रम मंत्रालय देश भर में सात रीजनल कांफ्रेंस आयोजित करने की तैयारी कर रहा है जिनमें सभी राज्यों के श्रम मंत्रियों और श्रम सचिवों को बुलाकर उनसे इस प्रस्तावित कानून को सही तरीके से लागू करने को कहा जाएगा. यानी अब अगली चुनौती प्रस्तावित कानून को जमीन पर कारगर तरीके से लागू करने की होगी.
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संशोधन में महिलाओं के मातृत्व अवकाश (मैटरनिटी लीव) को 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह किया गया है। इसे बाद में लोकसभा में रखा जाएगा जहां सरकार के पास पूर्ण बहुमत है। ऐसे में साफ है कि यह प्रस्ताव जल्द ही कानून की शक्ल अख्तियार कर लेगा।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट ने मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 में संसद में मातृत्व लाभ (संशोधन) विधेयक, 2016 पेश करके किये जाने वाले संशोधनों को पिछली तिथि से मंजूरी दे दी।
=>क्या विशेष है इसमें :-
★ मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 महिलाओं को उनके प्रसूति के समय रोजगार का संरक्षण करता है और वह उसे उसके बच्चे की देखभाल के लिए कार्य से अनुपस्थिति के लिए पूरे भुगतान का हकदार बनाता है।
★ यह 10 या इससे अधिक कर्मचारियों को काम पर रखने वाले सभी प्रतिष्ठानों पर लागू होगा। इससे संगठित क्षेत्र में 18 लाख महिला कर्मचारी लाभान्‍वित होंगी।
★ इन संशोधनों में दो जीवित बच्चों के लिए मातृत्व अवकाश 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह करना और दो बच्चों से अधिक के लिए 12 सप्ताह, कमीशनिंग मां और गोद लेने वाली मां के लिए 12 सप्ताह का अवकाश और 50 से अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों के लिए क्रेच का अनिवार्य प्रावधान शामिल है।
★ नौकरी पेशा महिलाओं के लिए ये काफी बड़ा बदलाव होगा। खास बात ये है‌ कि ये प्रस्ताव पास होता है तो सरकारी के साथ साथ निजी क्षेत्र में काम करने वाली महिला कर्मचारियों को भी इसका लाभ मिल सकेगा ।

★सरकार और उनका मंत्रालय पिछले डेढ़ साल से इस प्रस्ताव के लिए प्रयास कर रहा था। काफी प्रयासों के बाद यह प्रस्ताव सदन के पटल तक पहुंचा। हालांकि इस प्रस्ताव को श्रम मंत्रालय की ओर से पेश किया गया।
★ सरकार यह मानती है कि नवजात बच्चे को जन्‍म के बाद कम से कम छह माह तक मां का दूध जरूर मिलना चाहिए। ऐसे में जो महिलाएं नौकरीपेशा हैं उनके लिए जरूरी है कि उन्हें पर्याप्त अवकाश दिया जाए।

Saturday, August 6, 2016

#सोसाइटी_इज_साइलेंट_रेपिस्ट_हैंग_इट_फर्स्ट‬

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आपको क्या लगता है- रेप का मतलब क्या सिर्फ जबरजस्ती सेक्सुअली असाल्ट कर देना है?
अगर आप ऐसा ही सोचते है तो बुरा मत मानियेगा ~ आपके अंदर भी एक संभावित रेपिस्ट बैठा हुआ. रेप केवल बलपूर्वक यौन भंग करना नही है. ये तो रेप का एक हिस्सा भर है. जिसमे एक व्यक्ति एक विक्टिम के साथ फिजिकली इनवॉल्व होता है. अगर रेप का मतलब सिर्फ इतना ही होता, तो विक्टिम का इस हादसे से निकलना उतना मुश्किल भी नही होता. लेकिन ऐसा होता नही है. रेप तो इससे भी broader-tragedy है. रेप दरअसल एक ऐसा सामजिक हादसा है, जो विक्टिम का जीना तक मुहाल कर देती है.विक्टिम के साथ फिजिकली इनवॉल्व व्यक्ति इस भयानक हादसे का एक हिस्सा भर होता है. देर सबेर कम ज्यादा सजा तो उसे मिल ही जाती है. लेकिन सोचने वाली बात है कि
-- क्या उस पूरे समाज को दंड मिलता है, जो रेप विक्टिम को इस नजर से देखने लगता है, जैसे उसका असाल्ट जबरजस्ती नही; बल्कि उसकी इच्छा से हुआ है?
-- क्या समाज रेप पीड़िता को गंदी और जहालत की नजर से नही देखता?
-- क्या रेप विक्टिम को लेकर एक गंदी सोच नही बन जाती? मुकरीएगा मत... क्या आप विक्टिम को देखकर मजा नही लेते?
-- क्या आप विक्टिम को सहज रूप में स्वीकार लेते है? कितने लोग ऐसे है, जो विक्टिम के साथ एक सामान्य व्यवहार रख पाते है?
-- मुझे लगता है कि ऐसे लोगो कि संख्या अंगुली पर गिनने भर होगी. यहाँ तक कि लोग फब्तियां कसते है. कुछ तो सहानुभूति रखने के बहाने भी उस विक्टिम को जलील करने की वजह खोजते रहते है.
जब ये बात सच है, तो रेप का दोषी (रेपिस्ट) तो इस पूरे हादसे का एक छोटा हिस्सा भर है, उससे बड़ा रेपिस्ट तो ये समाज और खुद घर परिवार के लोग है. जो पल पल विक्टिम को दोषी महसूस कराकर जिंदा लाश में बदल देते है.
सच तो ये है कि रेप के दोषी से बड़ा रेपिस्ट वह समाज है, जो यौन भंग को जीवन मरण का मसला बना देता है. जिस दृष्टिकोण से में ये बात लिख रही हूँ, उस हिसाब से क्या समाज रेपिस्ट नही है???
हो सकता है कि रेपिस्ट किसी मनोविकार के वशीभूत रेप किया हो. लेकिन ये समाज... ये समाज तो सोच समझकर कर रेप करता है. रेपिस्ट तो एक बार रेप करता है. समाज तो हर रोज हर पल रेप करता है. आंखो के इशारो, भद्दी टिप्पणियॉ और कभी कभी सहानुभूति के द्वारा भी हम विक्टिम का रेप कर रहे होते है. रेपिस्ट तो सजा पा जायेगा. लेकिन उस समाज को आप कब फांसी पर लटकाओगे, जो रोज ही रेप करेगा...
जानती हूँ आप इस बात से मुकरेगे. शौक से मुकरीये. लेकिन सोचियेगा अगर ऐसा नही होता तो विक्टिम और उसकी फैमिली को इलाका बदलने की बात ही क्यो आती? तो इस समाज को साइलेंट रेपिस्ट क्यो नही कहा जाये? उसकी भी सजा क्यो ना मुकर्रर हो? लेकिन आप आखिर समझेंगे भी तो कैसे? आखिर आप भी तो उस समाज के हिस्से हैं. दो व्यस्क प्रेमी के मिलन को तो आप सहजता से लेते नही, रेप विक्टिम को क्या खाक सहज ढंग से लेंगे....
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Thursday, August 4, 2016

क्या अपने यहाँ लिंगभेद कभी समाप्त होगा ?

एक सीधा सा सवाल "क्या अपने यहाँ लिंगभेद कभी समाप्त होगा ? नहीँ...क्यों ?
क्योंकि यहाँ की व्यवस्था के जर्रे-जर्रे पर पुरुषवाद की छांह पड़ी है. कहीँ प्रत्यक्ष तो कहीँ अप्रत्यक्ष लेकिन हर जगह हर बार स्त्रियों को द्वितीयक प्राणी के अस्तित्व का दर्जा ही प्राप्त है.
कुछ घरों की महिलाएँ कहती दिखायी देती हैं कि "हमारे साथ कोई दुर्व्यवहार नहीँ हुआ, हमारे पैरेन्ट्स ने कभी भाइयों को हमपर हावी नहीँ होने दिया क्योंकि वो कहते थे कि पता नहीँ अगले घर में हमें ये प्यार मिले न मिले". उनकी बातें जानकर हँसी,गुस्सा और दया तीनों भाव मन में आते हैं कि बेवकूफ महिलाएँ दयादृष्टि से दी गई भीख को प्यार समझ बैठी हैं. ये छद्म है, दिखावा है, प्रेम नहीँ छलावा है जिसमें भ्रमित होकर ये गौरव से इतरा रही हैं.इतना ही उनके प्रेम पर भरोसा है तो जैसे इनके भाई लोग मोहल्ले की कितनी ही लड़कियों से इश्कबाजी करते हैं और माँ-बाप चुप तो एकाध से ये भी करके देख लेंवे. किसी लौंडे का हाथ पकड़कर ज़रा मोहल्ले में घूम भर आयें टेस्ट हो जायेगा कि कितनी समानता है भाई और बहनों में या फ़िर बाहर से आकर जैसे भाई इनसे अपने अफेयर्स की बातें बताता है ज़रा ये भी बताकर देख लें तो कुछ बात हो...
और आगे यही कहना है कि ये "अगला घर" क्या होता है ? जहाँ जन्म लिया वहाँ से तो ये बिन पेंदी के लोटे की तरह निकाल दी जायेंगी/जाती हैं. वह घर इनके माँ-बाप के बाद इनके भाइयों का होगा और "अगला घर" तो पहले से पतिदेव और उसके घरवालों के लिये रिजर्व है तो "इनका घर किधर है...?" वाकई इनकी बातें जानकर महसूस होताहै कि मूर्खता की सीमा नहीँ है.
भाई अक्सर रात को अपने दोस्तों के यहाँ रुक जाता है.एक कॉल कर ख़बर भर दे देता है और घर के सभी लोग निश्चिंत...ये भी कभी किसी सहेली के घर रुककर कॉल कर ज़रा देख लें कि घरवाले कितने निश्चिंत हो पाते हैं.
उन्हें प्रेम का लालीपॉप देकर घर की मान मर्यादा के नाम पर इतना कसकर रखा जाता है कि उसके दूसरे पहलू को न देख सकें न समझ सकें और स्वीकार करने का तो खैर सवाल ही पैदा न हो...
लिंगभेद की नीति का ज़बर्दस्त हथियार है प्रेम के नाम पर 'ब्रेनवॉशिंग'.ये वह तरीका है जिससे विरोध की गुंजाइश काफ़ी हद तक कम की जा सकती है.ये एक तरह से पुरुषतंत्र के बचाव में सेफ्टी वाल्व का काम करता है.सिर्फ़ इसमें ज़रा कुशलता की ज़रूरत होती है ताकि जिसपर आजमा रहे हों वह भांप न जाये.प्रेम और दुलार के नाम पर पूर्ण कब्जा इसकी ज़बर्दस्त विशेषता होती है.
स्पष्टतया ये पूरा का पूरा ब्रेनवाशिंग का मामला ही है. यहाँ पढ़ी-लिखी,खूबसूरत और उच्च शिक्षित महिलाओं की संकल्पना है जो आचरण से दिखावापसंद हो और दिमागी तौर पर पुरुष वर्चस्व की घोर समर्थक. इनकी डोर किसी मर्द के हाथों में होना चाहिये जिनकी दया से मिली ढील को ये अपनी स्वतंत्रता,अपने अधिकार समझें. यही स्त्री का विकास है. अब तक इतनी ही आजादी पाई है हमने. इन ढकोसले और दिखावी से चिढ़ होती है और..ये ब्रेनवाश्ड महिलाएँ झूठे ही गौरवान्वित होकर खुशी के मारे पगलायी जा रही हैं.
लिंगभेद की नीति तब ख़त्म होनी समझी जायेगी जब कर्म और कुकर्म करने में दोनों को समान अधिकार प्राप्त होंगे. जो स्त्री के लिये सही है वह पुरुष के लिये भी सही हो और जो स्त्री के लिये ग़लत है वह पुरुष के लिये भी ग़लत घोषित होना चाहिये. शारीरिक भिन्नता या विषमता कहीँ से भी जीवन के अधिकारों पर अविभावी नहीँ हो सकती है. स्त्री और पुरुष दोनों मानव हैं तो दोनों के मानवाधिकार समान हैं जिनके वितरण में पक्षपात कहीँ से भी क्षम्य नहीँ है. आगे यदि जिन्हें छलावे को प्रेम और आजादी समझनी है उन्हें वह प्रेम और आजादी मुबारक हो... ऐसे प्रेम का प्रसाद बांटनेवाले की जय और प्रसाद पानेवाले की जय.

Tuesday, August 2, 2016

'लौट आई, पर मैं अब एक गंदी औरत थी..'

पूरे भारत में हर साल लाखों औरते कभी नौकरी के झूठे वायदे में फांसकर तो कभी अपने ही पति के झांसे का शिकार होकर देह व्यापार में धकेली जाती हैं.
एक बार कोठे में फंस जाने के बाद अगर वो बाहर निकल भी आएं तो गांव कस्बे में लौटकर इज़्ज़त से गुज़र-बसर कर पाना बड़ी चुनौती होती है.
कोलकाता में एक समाजसेवी संस्था ऐसी औरतों को अपना बिसनेस लगाने के लिए पैसे दे रही है. लेकिन कितनी बदली है उनकी ज़िंदगी?
पढ़ें- मानव तस्करी और देह व्यापार से बचकर निकली एक औरत की कहानी, उन्हीं की ज़बानी-
"मैं सेक्स-वर्क नहीं करना चाहती थी, इसलिए कभी थप्पड़, कभी लकड़ी, रॉड या बेल्ट से, वो मुझे बहुत मारते थे.

मेरे पैर और कमर पर अभी तक दाग हैं. मैं बीमार भी पड़ गई. अस्पताल तक ले जाना पड़ा.
पर फिर मुझे मानना ही पड़ा. बहुत रोती थी, दुखी रहती थी.
आखिर में एक रात एसिड और मिर्ची को खिड़की की ग्रिल पर लगाकर उसे पिघलाया और मैं और दो लड़कियां वहां से भाग गईं.
गांव लौटी तो लोगों ने मुझसे बात करना बंद कर दिया. उनकी नज़र में मैं गंदी लड़की हो गई थी.
मैं बहुत रोती, और सोचती थी कि मैं मर जाऊं. ज़िंदगी से मन उचाट हो गया था.

ट्रैफ़िकिंग से पहले मैं स्कूल में पढ़ाई के साथ स्टार आनंदो नाम के चैनल में थोड़ा बहुत काम कर रही थी.
वो सब छूट गया. 16 साल की उम्र में जब पढ़ाई पूरी कर मैं अपनी ज़ंदगी में कुछ बन सकती थी, तब ये सब हो गया.
अब क्या सपने देखती? क्या नौकरी करती?
फिर एक समाजसेवी संस्था ने मुझे दुकान लगाने की ट्रेनिंग दी, पैसा दिया.

वहां दीदी थीं जो हमसे बात करती थीं. तभी दिल हल्का हुआ, जो सब अंदर जम गया था, बाहर निकल आया.
दुकान के ज़रिए ही गांववालों से भी बातचीत शुरू हुई. जब वो कुछ लेने आते तो बात तो करनी पड़ती थी. और पैसे भी कमाने लगी.
इस बीच मेरे स्कूल के एक लड़के के दोस्त को मैं पसंद आ गई. वो मुझसे प्यार करने लगा.
मैं ना मानती तो हाथ जला लेता, नस काट लेता. पर मैंने भी उसे कहा मैं झूठ के सहारे ये रिश्ता नहीं बनाऊंगी.

मेरे बारे में सब जानकर फिर मुझे पसंद करो, तब प्यार करूंगी. उसने सब सुना और रो पड़ा.
फिर हमने शादी की. पर उसके घर में हमने ये सच आज तक किसी को नहीं बताया है.
अब मेरी डेढ़ साल की बेटी है. मैं उसे बहुत हिम्मती बनाना चाहती हूं.

मेरे पति और मेरा यही सपना है कि उसे ठीक से पढ़ाएं, अपने पैरों पर खड़े होने के काबिल बनाएं ताकि उसकी ज़िंदगी उसके हाथ में हो."
(दिव्या आर्य ने इस महिला से कोलकाता में बात की थी. उनके अनुरोध पर उनकी पहचान ज़ाहिर नहीं की गई है.)

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IAS Websites for UPSC Exam Preparation
1. http://mrunal.org
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2. Gaurav Agrawal, IAS 2013 Topper
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5. Riju Bafna, IAS 2013
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6. Prince Dhawan, IAS 2011 3RD Rank
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3. IGNOU Books
http://egyankosh.ac.in
4. YOJANA & KRUKSHETRA Magazine (Current Affairs)
http://yojana.gov.in
5. Official Website of UPSC
http://upsc.gov.in
6. Press Information Bureau website for Government Updates
http://pib.nic.in
7. PRS websites for Tracking Bills in Parliament(Polity)
http://www.prsindia.org
8. IDSA website for Defence & Foreign Relations
http://idsa.in
9. Indian Council on Global Relations
  http://www.gatewayhouse.in
10. Ministry of Environmental & Forests 
http://evfor.nic.in
11. Ministry of External Affairs(International Relations)
http://www.mea.gov.in
12. Union Budget & Economic Survey 
http://indiabudget.nic.in
13. Press Trust of India
http://ptinews.com
14. Pratiyogita Darpan Magazine
http://www.pdgroup.upkar.in
15. India Brand Equity Foundation for Business & Economy
http://www.ibef.org
16. Knowledge Initiative by InDG
http://vikaspedia.in
17. Make In India initiative for Manufacturing related Info
http://www.makeinindia.com
18. Amnesty International for Annual Reports(Social Issues)
https://www.amnesty.org
19. UNESCAP for Population Policy (Socio-Economic Issues)
http://www.unescap.org
20. NASSCOM (Science & Tech)
http://www.nasscom.in
21. Down To Earth (Science & Tech) 
http://www.downtoearth.org.in
22. Science Magazine (Science & Tech)
  http://www.sciencemag.org
23. Ministry Of Home Affairs for Annual Reports & News (Governance, Security & Polity)
http://www.mha.nic.in
24. Ministry of Law & Justice (Polity)
  http://www.lawmin.nic.in
25. Ministry of Social Justice & Empowerment for Annual Reports & News (Social Issues)
http://www.socialjustice.nic.in
26. Ministry of Culture (Culture)
http://www.indiaculture.nic.in
27. Constitution of India for Constitution Supreme Court Judgement (Polity)
http://www.indiacode.nic.in
28. Planning Commission for 12th FYP, Reports & Policies (Economy)
http://www.planningcommission.nic.in
29. National Stats for Statistical Data (Economy)
http://www.nationmaster.com
30. World Atlas (Geography)
http://www.worldatlas.com
31. Project Tiger (Geography)
http://www.projecttiger.nic.in
32. Arc Reports (Governance, Ethics)
  http://www.arc.gov.in
33. Indian Mirror (Social, Culture, Arts) 
http://www.indianmirror.com
34. THE HINDU (Current Affairs)
  http://www.thehindu.com
35. The Indian EXPRESS (Current Affairs)
  http://indianexpress.com
36. THE TIMES OF INDIA (Current Affairs)
  http://timesofindia.indiatimes.com
37. All India Radio News
http://newsonair.nic.in
38. Institute of Peace & Conflicts Studies for Issues of International Importance
  http://www.ipcs.org
39. Indian Council of World Affairs for International Relations
http://www.icwa.in
40. Best Practices for Governance & Administration
http://www.indiagovernance.gov.in
41. Economic & Political WEEKLY
http://www.epw.in
42. Indian Art & Culture (Culture)
http://culturopedia.com
43. National Institute of Disaster Management
http://nidm.gov.in
44. Centre for Cultural Resources & Training (Culture)
http://ccrtindia.gov.in
45. World Affairs
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46. Rajya Sabha News
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48. Special Economic Zones in India
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49. WTO & Related Issues
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50. Commission for Scientific & Technical Terminology
http://www.cstt.nic.in
51. Ministry of Finance
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52. New Scientist (Science & Tech)
  https://www.newscientist.com
53. Centre for Science & Environment (Science & Tech)
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54. National Portal of India
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55. Government of India Directory
http://goidirectory.nic.in
56. Ministry of Commerce & Industry 

Saturday, July 30, 2016

मानो ना मानो! यह सच है..!

[शायद नारियाँ इस बात को सहजता से स्वीकार नहीं करेंगी]

नारी पर दिनोदिन हो रहे अत्याचारो में,
नारी भी किसी ना किसी तरह से बराबर की गुनहगार है।

शायद कुछ नारियाँ इस बात को सहजता से स्वीकार नहीं करेंगी। जानती हूँ कि हर इंसान अपनी गलतियों को नहीं मानकर दूसरों में ही खामियाँ निकालने की कोशिश करता है।

जैसा कि हम देखते हैं ‪#‎भ्रूण_हत्या‬ के मामले किस कदर बढ़ते ही जा रहे हैं।

""इन मामलो में या तो किसी प्रकार की ‪#‎नाजायज़_संतान‬ की भ्रूण हत्या की जाती है, या फिर अनचाहे संतान की भ्रूण हत्या की जाती है।"

इस मामले में महिलाओं की भागीदारी से सब भलीभांति वाकिफ हैं।

""अगर आज की लड़कियाँ ‪#‎नाजायज_सम्बन्ध‬ ना बनाये तो नाजायज संतान की भ्रूण हत्या करने के मामले सामने ही नहीं आयेंगे।""

और अनचाहे संतान के मामलों में भी नारी बराबर की दोषी होती है। क्यूंकि वह एक नारी होते हुए भी यह नहीं चाहती कि उसकी जन्म लेने वाली संतान ‪#‎लड़की‬ पैदा हो।

इस डर से नारी भ्रूण जांच करवाती हैं और लड़की होने का पता लगते ही भ्रूण हत्या करवा देती हैं।

""अगर वो चाहे तो किसी की क्या मजाल कि कोई उसे भ्रूण हत्या के लिए बाध्य कर दे।।""

आजकल रोज ही हम समाज में देखते हैं या खबरों में सुनते हैं या पढ़ते हैं कि बलात्कार की घटनाओ को किस प्रकार अंजाम दिया जाता है।

""अगर इन मामलो की सत्यता देखी जाये तो अधिकतर मामलो में लडकियाँ भी कुछ हद तक बराबर की गुनहगार होती हैं।""

""अगर लडकियाँ ऐसी घटनाओं का विरोध करें या ऐसे गुनाह करने वालों को सबक सिखा दें, तो लोग गुनाह करने से पहले 💯 बार सोचने पर मजबूर हो जायेगें।""

पर ना जाने क्यों ज्यादातर लडकियाँ ऐसे मामलों का विरोध नहीं करती हैं जिससे गुनहगार की हिम्मत बढ़ जाती है और आये दिन ऐसी घटनाएं समाज में घटित होती हैँ।

मैं जानती हूँ कि जो लोग सच्चाई का सामना नहीं कर सकते हैं वोह मेरी इस पोस्ट पर कोई टिप्पणी ( Comments ) भी नहीं करेंगे फिर चाहे वो लड़की, हो या लड़के।